Sunday, March 31, 2013

सवेरा


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वे जहाँ तक देखते हैं 
बस अँधेरा दीखता है
पर मुझे फिर भी सुखद 
कोमल सवेरा दीखता है
रात रोशन दिन दिवाली 
दीप आशा फूल माली
सोच सकता हूँ मैं इतना 
क्यों कृषक हल खींचता है 


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Tuesday, March 26, 2013

होली २०१३

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ये फागुन की हवाएँ कह रहीं हैं देख मुझको सुन
ये खिलते फूल सरगम साज मे है ख़ुशबुओं की धुन
कहीं होली के रंगों से कोई आँचल बचा है क्या
बस इतना सोचता हूँ अवगुणों मे भी कहीं है गुण

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सभी रंग जिस्म पर चढ़कर सफेदी छोड़ देते हैं
कि जैसे पूर्वजो के पिंड हथेली छोड़ देते है
ये जीवन रंग जमकर इंद्रधनुषों को सजाते हैं
बस इतना सोच सकता हूँ सभी को जोड़ देते हैं

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Thursday, March 21, 2013

रिश्ते


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मुझे गीता बताती है नहीं कुछ साथ जाता है
मगर फिर क्यों मुझे केवल स्व परिवार भाता है
मेरी पूंजी मेरे रिश्ते तेरे रिश्ते तेरी पूंजी
मैं इतना सोच सकता हूँ तेरा मेरा रुलाता है

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Thursday, March 14, 2013

आस



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ओस की बूँदें कहानी लिख रही हैं प्यास पर
ज्यों नहाकर धूप की किरने बुलाएँ घास पर
आँख की बारिश ह्रदय को शुष्क करती जा रही है
सोच सकता हूँ मैं इतना चल रहा हूँ आस पर

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Thursday, March 7, 2013

गन्तव्य


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एक वो हैं और एक हूँ मैं एक पथ है और एक वाहन है
एक होना अनेक होना है क्योंकि उपलब्ध आज साधन है
दूरियाँ बढ रहीं हैं नदियों सी सबका गन्तव्य एक होकर भी
सोच सकता हूँ बस यही अब मैं डूबकर ही शरीर पावन है
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