Tuesday, November 14, 2017

Life


[PC: https://www.linkedin.com/pulse/journey-life-lucy-rose/]
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Full of ups and downs
Day after night and night after day
Sun, moon and stars
Fall, Autumn and Spring
Summer, rains and winters

Pain and pleasure
Grief and happiness
Hope and expectations
Trials and tribulations
Failures and successes

Trust me,
my name is Life.
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Tuesday, October 3, 2017

Time


Stoicism at play
Beyond complacency and calculations
Divinity in domination
Nothingness non-existing
Flow beyond measure
Constant in speed and space
Consistently moving 
Forward or backward nobody knows
Efforts all in action
Results all monitored

Mind it, 
My name is Time.

Wednesday, September 13, 2017

सोच

कान कहते हैं आंख सुनती है
उनकी नज़रों की राह बुनती है
कृत्य पदचिन्ह छोड़ बढ़तेे हैं
उंगलियां छोड़ हाथ लड़ते हैं
उनके पलकों से रेत उड़ती है
और कंधों पे सेज सजती है
रीढ़ का दर्द मुझसे कहता है
'इतना क्यों मुझको यार सहता है'

रात के बाद सुबह होनी है
मुझको यह सोच आज बोनी है

Saturday, May 13, 2017

हमारे पूर्वज


हमने बनाया घर 

जंगलों में
उनके घर मे घुसकर
आक्रमण से
अपने सुंदर भविष्य हेतु

आज जब 
वे, हमारे पूर्वज माने जाने वाले
अपने घर मे प्रवेश 
करने का कर रहे हैं प्रयास
तो निषेधाज्ञा लगाई जा रही है

पहिया चल रहा है
खेल जारी है
अभी कई अध्याय लिखे जाने हैं

हम उनके घर में हैं
या
वे हमारे घर मे

We All Travel

We are all travellers
We all travel 
Distances, places and spaces

We travel through 
Air, river and road

We all travel through
Experiences, expectations and expansions

We travel through 
Outsmarting others 
and 
at times get outsmarted

We travel through 
output and outcomes


Students travel through learning
Workers travel through work
Leaders travel through leading

Health enthusiasts travel through treadmill
Covering invisible distance

We are all travelers 
And we all need shadow
However shallow our interests be

Shadow We Need

Scenic, picturesque and serene
Coconut trees, grazing cattle

Well orchestrated dividers
Black top roads absorbing the sun
Presence of vernacular all around

Shadow we need
However shallow our interests be.

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Pale, parsimonious and pampered
Ponds, plains and peels

Reassuring oneness 
Mosques, temples and churches

Shadow we need
However shallow our interests be

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Bricks, bridges and beliefs
Sun, salt and sundry

Serving one taste
North, east and south

Shadow we need 
However shallow our interests be

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Mango laden trees
Plantains in bloom

Smiling watermelons as if enjoying 
the sleep in the sun
Glassy constructions 
telling tales of modernity

Shadow we need
However shallow our interests be

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Beaches, breaches and beacons
Sand, saplings and sundae

Free from French
Fermenting flavors

Shadow we need 
However shallow our interests be

Tuesday, January 3, 2017

Will to Survive


[picture borrowed from Ms Babita Asthana's Facebook Wall]
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1
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Life torn into pieces
Flood Full of furies and frames
Nature 
Testing their appetite to survive
Will to survive at any cost
Keeps their eyes occupied
Permutations and combinations
Possibilities and hope
Determination and drive
Scanning their brain waves

Sense of togetherness 
Energising them
Sense of expectation
Forcing them
Sense of existence
Reminding them

Thorns on the way
To better tomorrow
Shall surely lead them
To tackle
Atrocities
Complexities and 
Uncertainties
Shall surely assure them
Survival 

Learning
Living and 
Leading Life.

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2
==
Water they say
Gives life
Water they say
Saves life

But we see
Water
Taking lives
Destroying age old
Held beliefs
And
Redefining
Relationship
Between Water and Life.

Sunday, September 11, 2016

आ जाओ


[चित्र प्रो0 विद्यानंद झा जी की फेसबुक वाल से साभार]

सब छोड़ देते हैं साथ
अपने भी

फिर भी 
लोगों की नज़र 
पड़ ही जाती है

पराये-अपने के भेद से परे

कितनी ख़ूबसूरत थी 
ये दुनिया 
जब तुम्हारा साथ था

हम दोनों कितनो का 
सहारा थे
बरसात में
कड़ी धूप में

अब क्या है 
मेरा अस्तित्व 
तुम्हारे बिना

और तुम्हारा 
मेरे बिना

तुम अब 
उड़ रही होगी 
बिना किसी की
मुट्ठी में बंधे 

आ जाओ

 मैं कष्ट में हूँ
तुम्हारे साथ न होने पर
मुझे ठोकरें पड़ रही हैं
हाथ से सीधे पैरों में आ गिरी हूँ
मुझे अब
ज्ञात हो रहा है
तुम्हारे साथ का महत्व


आ जाओ 
चलो 
फिर से हम खा लेते है 
कसमें साथ मरने-जीने की

आ जाओ


मेरी वेदना पर
कुछ तो तरस खाओ

आ जाओ

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Wednesday, July 27, 2016

कोई वीरानी से वीरानी है



[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]

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कोई वीरानी से वीरानी है
उनको अपनी व्यथा सुनानी है 
उड़ गए साथ छोड़ सब फिर भी 
मुझमे बाकी अभी कहानी है 

मौसमों की अजीब आदत है 
बसन्त के बाद शीत आनी है 
सूखना अंत हो नहीं सकता 
कोपलों में अभी भी पानी है 

ऐसी वीरानी भी जरुरी है 
असलियत है नहीं बेमानी है 
अँधेरा-रोशनी रहें मिलजुलकर 
जिन्दगी की यही कहानी है 

मेरा जीवन तो एक मिथ्या है 
सत्य है मृत्यु जोकि आनी है 
भागते दौड़ते रहें हम सब 
पतंग सपनों की जो उड़ानी है 

कोई वीरानी से वीरानी है 
मुझमे बाकी अभी कहानी है

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Tuesday, April 26, 2016

तीस्ता

तीस्ता के सहारे
चले जा रहे हैं,
दायें-बाहें, ऊँचे-नीचे,
पहाड़ों पर।

















तीस्ता नहीं छोड़ती है साथ,
अपनी गति, गन्तव्य व गहनता को
पोटली में बांधे
समय, काल व परिस्थिति के साथ
करते समझौता,
मानव छेड़खानी से जूझते,
बांधों से टकराते,
अपना रास्ता स्वयं बनाते,
तीस्ता चली जा रही है।

पत्थरों के साथ लुड़कती,
देश-देशान्तर की
परिकल्पना के विरुद्ध,
तीस्ता चली जा रही है।

कटाव, रिसाव, व झुकाव से
जन्म लेते विकास की गति को
अपने कन्धों पर ढोते
तीस्ता चली जा रही है।

सड़क के चौड़ा होने से
अवरुद्ध अवश्य होती है
उसकी गति,
परंतु
अपने सेवा भाव में सराबोर
उसका व्यक्तित्व
सब कुछ सहने को
तैयार दीखता है,
परंतु कब तक।

कब तक,
आखिर कब तक
हम अपने हितों के लिए
उसकी गति को
अवरुद्ध करते रहेंगे,
बनाते रहेंगे
बाँध व सड़कें,
चकाचौंध करने वाली
रोशनी के लिए।













कब तक,
आखिर कब तक
अल्पकालिक रोशनी के लिए 
संजोते रहेंगे
दीर्घकालिक अँधेरे को।
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[सिलीगुड़ी से गंगटोक के रास्ते पर तीस्ता के भिन्न रूपों को देख कर निकली यह पंक्तियाँ, 26 अप्रैल 2016, Mayfair hotel n resort, Gangtok, 6:50 pm, room #523]