Tuesday, January 3, 2017

Will to Survive


[picture borrowed from Ms Babita Asthana's Facebook Wall]
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1
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Life torn into pieces
Flood Full of furies and frames
Nature 
Testing their appetite to survive
Will to survive at any cost
Keeps their eyes occupied
Permutations and combinations
Possibilities and hope
Determination and drive
Scanning their brain waves

Sense of togetherness 
Energising them
Sense of expectation
Forcing them
Sense of existence
Reminding them

Thorns on the way
To better tomorrow
Shall surely lead them
To tackle
Atrocities
Complexities and 
Uncertainties
Shall surely assure them
Survival 

Learning
Living and 
Leading Life.

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2
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Water they say
Gives life
Water they say
Saves life

But we see
Water
Taking lives
Destroying age old
Held beliefs
And
Redefining
Relationship
Between Water and Life.

Sunday, September 11, 2016

आ जाओ


[चित्र प्रो0 विद्यानंद झा जी की फेसबुक वाल से साभार]

सब छोड़ देते हैं साथ
अपने भी

फिर भी 
लोगों की नज़र 
पड़ ही जाती है

पराये-अपने के भेद से परे

कितनी ख़ूबसूरत थी 
ये दुनिया 
जब तुम्हारा साथ था

हम दोनों कितनो का 
सहारा थे
बरसात में
कड़ी धूप में

अब क्या है 
मेरा अस्तित्व 
तुम्हारे बिना

और तुम्हारा 
मेरे बिना

तुम अब 
उड़ रही होगी 
बिना किसी की
मुट्ठी में बंधे 

आ जाओ

 मैं कष्ट में हूँ
तुम्हारे साथ न होने पर
मुझे ठोकरें पड़ रही हैं
हाथ से सीधे पैरों में आ गिरी हूँ
मुझे अब
ज्ञात हो रहा है
तुम्हारे साथ का महत्व


आ जाओ 
चलो 
फिर से हम खा लेते है 
कसमें साथ मरने-जीने की

आ जाओ


मेरी वेदना पर
कुछ तो तरस खाओ

आ जाओ

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Wednesday, July 27, 2016

कोई वीरानी से वीरानी है



[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]

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कोई वीरानी से वीरानी है
उनको अपनी व्यथा सुनानी है 
उड़ गए साथ छोड़ सब फिर भी 
मुझमे बाकी अभी कहानी है 

मौसमों की अजीब आदत है 
बसन्त के बाद शीत आनी है 
सूखना अंत हो नहीं सकता 
कोपलों में अभी भी पानी है 

ऐसी वीरानी भी जरुरी है 
असलियत है नहीं बेमानी है 
अँधेरा-रोशनी रहें मिलजुलकर 
जिन्दगी की यही कहानी है 

मेरा जीवन तो एक मिथ्या है 
सत्य है मृत्यु जोकि आनी है 
भागते दौड़ते रहें हम सब 
पतंग सपनों की जो उड़ानी है 

कोई वीरानी से वीरानी है 
मुझमे बाकी अभी कहानी है

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Tuesday, April 26, 2016

तीस्ता

तीस्ता के सहारे
चले जा रहे हैं,
दायें-बाहें, ऊँचे-नीचे,
पहाड़ों पर।

















तीस्ता नहीं छोड़ती है साथ,
अपनी गति, गन्तव्य व गहनता को
पोटली में बांधे
समय, काल व परिस्थिति के साथ
करते समझौता,
मानव छेड़खानी से जूझते,
बांधों से टकराते,
अपना रास्ता स्वयं बनाते,
तीस्ता चली जा रही है।

पत्थरों के साथ लुड़कती,
देश-देशान्तर की
परिकल्पना के विरुद्ध,
तीस्ता चली जा रही है।

कटाव, रिसाव, व झुकाव से
जन्म लेते विकास की गति को
अपने कन्धों पर ढोते
तीस्ता चली जा रही है।

सड़क के चौड़ा होने से
अवरुद्ध अवश्य होती है
उसकी गति,
परंतु
अपने सेवा भाव में सराबोर
उसका व्यक्तित्व
सब कुछ सहने को
तैयार दीखता है,
परंतु कब तक।

कब तक,
आखिर कब तक
हम अपने हितों के लिए
उसकी गति को
अवरुद्ध करते रहेंगे,
बनाते रहेंगे
बाँध व सड़कें,
चकाचौंध करने वाली
रोशनी के लिए।













कब तक,
आखिर कब तक
अल्पकालिक रोशनी के लिए 
संजोते रहेंगे
दीर्घकालिक अँधेरे को।
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[सिलीगुड़ी से गंगटोक के रास्ते पर तीस्ता के भिन्न रूपों को देख कर निकली यह पंक्तियाँ, 26 अप्रैल 2016, Mayfair hotel n resort, Gangtok, 6:50 pm, room #523]

Saturday, April 2, 2016

फूल


[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]
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देखो
ध्यान से देखो
किस प्रकार तुमने 
टुकड़े कर दिए
हमारे परिवार के

हमारी शोभा हमारे अलग रहने में भी है 

हममे 
अभी भी सुगंध का वास है
अभी भी 
हम सक्षम हैं 
तुम्हारा ध्यानाकर्षण करने में 

तुमने 
हमारा त्याग तो किया
परंतु भूल गए 
कि हमारा जीवन 
त्याग से ही प्रारम्भ होता है
हम अपने लिए कभी नहीं जीते 
समर्पण ही तो हमारा जीवन है 

हम मंदिर की शोभा का कारण भी हैं
और 
अंतिम यात्रा में तुम्हारे सहयात्री भी

देखो
हमको 
इन चार कन्धों पर 
जा रहे निर्जीव पथिक के ऊपर 
समर्पित किया गया 
हम अपनी यात्रा को विराम नहीं देना चाहते थे  
सो हमने ज़मीन पर रहना 
बेहतर समझा

सड़क पर हमें 
कुचले जाने का भय तो है
परंतु अपने परिवार से 
जुड़ने का अवसर भी तो 
यहीं है

हम कब तक 
  रह सकते हैं दूर काँटों से

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Monday, March 7, 2016

चप्पलें

[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]
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कहाँ चले गए हो तुम
हमें छोड़कर अकेला
इन सूखे पत्तों के बीच 
हम दोनों एक दूसरे से बात कर तो रहे हैं
परन्तु
तुम्हारे बिना हम अधूरे हैं
अधूरा है
हमारा अस्तित्व
तुमसे ही तो है
हमारा जीवन
तुम्हीने तो हमें दी है दिशा

मोमबत्ती की भांति
हम जल रहे हैं
घिस रहे हैं 
परन्तु फिर भी
हममे तुम्हे मंजिल पर पहुँचाने की
क्षमता है
साहस है

तुम्हे हमारी क्षमता पर
विश्वास नहीं है क्या
या तुम
परिवर्तन की इस लहर में बह रहे हो
क्या तुम पर बाज़ार हावी हो रहा है
ओर तुम तलाश में निकल गए हो
विकल्पों की

विश्वास करो 
हममे तुम्हे मंजिल पर पहुँचाने की
क्षमता व साहस दोनों है
हाँ बाज़ार से लड़ने की क्षमता
अवश्य क्षीण हो गयी है अब

यों तो हम पर तुम्हारा पूरा बजन है
लेकिन हम फिर भी थके नहीं हैं
हमारा अस्तित्व 
इसी से तो है
तुम्हे किसी भी प्रकार की आत्मग्लानि
करने की कोई आव्यश्यकता नहीं है

हमारे जीवन का लक्ष्य भी तो यही है
सबकुछ सहकर तुमको दिशा देना
एक ममतामयी माँ की भांति

क्या तुम
पास के तालाब में
अपनी प्यास बुझाने चले गए हो
हमारी प्यास की चिंता किये बिना
जैसा अक्सर बच्चे किया करते हैं
अपने मातापिता की वृद्धावस्था में  

हमको कोई भी शिकायत नहीं है तुमसे
आजाओ

अभी
अभी-अभी 
इस वृक्ष से गिरे
एक पत्ते से
तुम्हारे स्पर्श की
खुशबू आ रही है
लगता है 
तुम अपनी भूख मिटा रहे हो 
इस वृक्ष पर ही

फिर क्यों
तुम्हारे पास होने का एहसास
हमें नहीं हो रहा है

इस पत्ते को
नहीं पता है हमारे-तुम्हारे
रिश्ते की घनिष्टता
के बारे में
वह तुम्हारे स्पर्श से उत्पन्न
स्फूर्ति का वर्णन
बड़ी आतुरता के साथ कर रहा है
अपने मित्रों से

यदि तुम्हारी भूख-प्यास मिट गई हो
तो आजाओ
अभी बहुत दूर तक चलना है हमको
साथ-साथ
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Monday, February 22, 2016

लेखनी

क्यों,
आखिर क्यों,
तुम मुझसे बना रही हो दूरी,
उड़ती जा रही हो व्योम पार,
चली जा रही हो,
नदी के उस छोर पार,
(तुम भलीभांति जानती हो,
मुझे तैरना नहीं आता),

क्यों,
आखिर क्यों,
होती जा रही हो पत्थर,
शीत ने तुम्हारी स्याही भी जमा दी है,
(ग्रीष्म तुमको तरल भी नहीं कर पायेगी),
तुम चल भी नहीं रही हो,
फिर भी थकीथकी सी हो,

क्यों,
आखिर क्यों,
तुम हो गई हो,
मेरे स्पर्श से परे।

Monday, February 15, 2016

जड़

ज़मीन ज़रूर उसकी कई एकड़ों में थी,
गिनती भी उसकी वैसे कई हेकड़ों में थी,
जीने का सलीका, न शराफत से दोस्ती,
जो खोट थी वो उसकी हिलती जड़ों में थी।
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Sunday, January 3, 2016

नया वर्ष २०१६

जीवन की भागा-दौड़ी में
कुछ लोग मिले कुछ बिछड़ गए
कुछ अनुभव खट्टे-मीठे से
क्यों लगे ठगे से पिछड़ गए

सपनो की आँख-मिचौनी में
कुछ भूल गए कुछ याद रहा
सिक्कों की आधी-पौनी में
बस आशय पथ ही साथ रहा
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Wednesday, December 9, 2015

Mirror

Dust settled for ages
even when dressed in
best of the best clothes
in the makeup of
expectations and expressions
gems-jewels
all in perfect place, shape and size
usually
they forget to see the mirror
and at times
they stand infront of that dusty mirror
where dirt has made its haven.

They put efforts
just to carry
makeup-jewels-gems
and make
no efforts for
little dusting of the mirror.

They come
just do nothing
take off dust and dirt
show you your own mirror
your own precious possessions
and you see
your own face
which looks much different
from its earlier avtar of being haven
from its earlier reflections.

Does one really need
someone to come and
clear the mirror off dust and dirt
someone to
tell us
in which attire we look best
in which pose we look better?

Unfortunately
we depend on someone
to come our way
and let us know that.

We need to stand up
move out
get a mirror
and carry it with us
every time
religiously
and keep looking at it
periodically
keep observing
how do I look better
can we change
that person in the mirror.

Everything depends
on how often we use mirror
how often we wipe it
(if we see the dust settling there)
how often we put efforts
to not allow any kind of dust
to get settled there.

Everything starts
with the man in the mirror
Everything improves
through the efforts
to see the mirror often
and
at times may be to allow others
to show us mirror.

They come and do nothing
Except showing us mirror
so lets carry it through
and start
with
the man in the mirror.