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Thursday, May 21, 2020

एक नई शुरुआत

मन में विचार आ रहा है
सब कुछ कहाँ जा रहा है

कहाँ से कहाँ आ गए हम
वहाँ से यहाँ आ गए हम
यहाँ से कहाँ जा रहे हैं हम

चार चूड़ी वाली कार को देखता हूँ
जिस पर कुत्ते बैठ रहे हैं
कुत्ते सड़क के शेर हो गए हैं
और हम बन गए हैं घर घुस्सू कुत्ते बिल्ली

घर से बाहर निकलता हूँ
तो पहले मुखौटा लगाता हूँ
एक के ऊपर एक और
मुखौटों को घर पर बनाया जा रहा है
रंग - आकार - प्रकार के अनुसार

बंद हैं, मंदिर - मस्जिद 
मगर शराब की दुकानों के बाहर
बेशुमार भीड़ है
सरकार भी कुछ ऐसा ही चाहती दिखती है

क़ैदी छोड़े जा रहे हैं जेलों से
और नए प्रकार के जेल बनाए जा रहे हैं
पुलिसवाले सड़कों पर खाना बाँट रहे हैं
अर्धसैनिक बल शराबियों को
सीधी लाइन में 
सफेद गोले के भीतर रखने में व्यस्त हैं
और तो और
वे इस प्रक्रिया में संकृमित होकर
अस्पतालों में भरती होने पर विवश हो रहे हैं
कहीं-कहीं पुलिस वाले ताली बजा रहे हैं

डॉक्टर अस्पताल से घर की जगह
होटल में जा रहे हैं
डॉक्टर अस्पतालों में भर्ती भी हो रहे हैं
अस्पताल कर्मी माँ अपने बच्चे से मिल नहीं पा रही है

सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता
कुछ कुछ एक सा बोल रहे हैं
नेता जनता को इकट्ठा होने से मना कर रहे हैं

मज़दूर अपने घर, अपने देस, अपने गाँव लौट रहे हैं
जान की परवाह किए बग़ैर
पैदल, साइकिल पर, रिक्शे पर, ठेले पर, टेम्पो से, टैंकर में भरकर
हर क़ीमत पर, किसी भी तरह
वे घर, अपनों के बीच जाने को आतुर हैं
जान की परवाह किए बगैर
उनकी इस व्याकुलता के समक्ष
भूख ने भी घुटने टेक दिए लगते हैं

अनाज, फल, साग-सब्जी
सब गाँव से आता है
मज़दूर भी
और इन मजदूरों के कंधों पर लदा कोरोना
शहर से गाँव जा रहा है

हम सब भी
कभी ना कभी
किसी न किसी गाँव से क़स्बे में
क़स्बे से नगर और फिर महानगर में
आए थे

पार्क. बाज़ार, सड़क,
स्कूल, कालिज, पुस्तकालय
सभी सार्वजनिक स्थानों पर
पसरा है सन्नाटा
और घरों में रह रही है रौनक़

यह कैसी बेमौसम बरसात है
उल्टी गंगा बह रही है
सूरज पूरव से उगकर
पश्चिम के रास्ते
फिर पूरव की ओर आ रहा है

मन में विचार आ रहा है
सब कुछ कहाँ जा रहा है

नीला आकाश दिखाई दे रहा है
पर्वत चोटियाँ साफ लग रही हैं
नई-नई दिखने वाली
विलुप्त होती दुर्लभ चिड़ियाँ दिखाई दे रही हैं
जानवर शहरों में प्रवेश कर रहे हैं

चीन मे बने मोबाइल फ़ोन से
चीन की बुराई हो रही है
विश्वशक्ति माना जाने वाला अमरीका
पूर्णतः त्रस्त है
उसके परमाणु यंत्र आज बेकार पड़े हैं
एक अदृश्य दुश्मन ने
सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया है

छुआछूत का नियमतः पालन हो रहा है
हम आगे जा रहे हैं या पीछे

एक विचार है मन में
कहाँ से कहाँ आ गए हम
यहाँ से कहाँ जा रहे हैं हम

किसान अपनी फसलें जला रहा है, बहा रहा है
मेरा देश कहाँ जा रहा है
केवल एक विचार आ रहा है
कहीं यह संकेत तो नहीं है एक युगांत का
एक युग का दुखद अंत
मुझे क्यों ऐसा लग रहा है
कि यह सब संकेत हो सकते हैं
एक नूतन सुबह के
एक सुखद कल के
एक सुदृढ़ भविष्य के

कहीं पढ़ा था
जो चीज आप को चैलेंज करती है
वही आपको चेंज करती है

श्रमिक अपने घर आ रहा है
एक नई शुरुआत करने
यही सुना था
घर से ही होती है
नई शुरुआत
और बड़ी कष्टदायक व हृदयविदारक
होती है यह प्रक्रिया

Thursday, November 12, 2015

बदलाव

बदल जाती है भाषा
बदल जाती है आशा
बदलती हैं परिभाषाएं
बदलती हैं अभिलाषाएं
बदल जाते हैं रूप व स्वरुप
बदलता है भाव व स्वभाव
बदल जाते हैं सम्बन्ध व अनुबंध
बदल जाते हैं कारण व निवारण
बदल जाते हैं विधान व परिधान

बदलते ही स्थान
बदलते ही भूगोल

नहीं बदलता है तो बस 
इतिहास
वर्तमान से परे हुआ इतिहास
नहीं बदलता है
भूत का अनुभव
नहीं बदलते हैं
भूत के मूल्य
भूत के सम्बन्ध

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11 अगस्त 2015/मेट्रो ट्रेन/दिल्ली

Tuesday, April 19, 2011

कभी ना भूख बदले

रंग बदले रूप बदले,
हर कदम स्वरुप बदले
बोझ कन्धों पर लिए 
हर कष्ट हर सपना वही था 
द्रष्टि, अंतर्ध्वनि, दिशा, 
रुकना कभी सीखा नहीं था
रीड़ का सौदा करूँ क्यों
प्रस्तरों का भय नहीं था
अस्मिता कैसी दया क्यों
वीर यदि शमशीर बदले
प्रश्न यह है हित अहित कर
क्यों ह्रदय का पीर बदले
मात्र यह प्रयास हर पल
अब कभी ना भूख बदले
हर कदम स्वरुप बदले
रंग बदले रूप बदले
पर कभी ना भूख बदले

Wednesday, August 25, 2010

Can we resolve, Can we solve...


Running Pillar to Post,
Farm to Fork,
Shimla to Shillong,
defying definite demonstrations
and defining dualism,
reaching out for 
serendipity,
with an expression 
of a jingoist,
can we resolve
can we solve
without a thought of thee or we,
without a thought of 
my beloved university.

Having sybaritic sensibilities
in the times of austerity,
looks like condominium
in legally established frames 
and fabian,
showing 
unity in bio-diversity,
carrying the gravamen 
with an intent of hiatus,
can we resolve
can we solve
without a thought of thee or we,
without a thought of 
my beloved university.

Shuttling the shuttle 
to show power 
on a non-living entity,
poor feathered entity.
Shouting slogans of 
corruption,
unscrupulous, undisciplined,
spineless opportunists,
defining and redefining,
shifting and drifting,
loyalties,
commencing a state of Leviathan  
and behaving like a Philistine,
can we resolve
can we solve
without a thought of thee or we,
without a thought of 
my beloved university.



Ignoring trumped up platitudes, 
demonstrating bewildered behavior
with calculated loyalties and 
miscalculated outcomes.
Polarization in
my beloved association,
my beloved university
flimsy 
and at times
obdurate behavior
shall not take us anywhere. 

It is not mine,
it is ours,
a temple of learning
for me.
Let us all pray
for 
recrudescence, 
revival and restrain,
if we can,
yes we can.

(I am thankful to all those who used many of the words used in the poem in the eConversations in NEHUTA googlegroup in last few days, had it not happened, this poem would not have got its birth....thanx a lot for inspiring me)

Wednesday, May 19, 2010

शब्द या अर्थ

शब्द, वही हैं
मात्र अर्थ बदल रहे हैं
या
अर्थ वही हैं
लेकिन शब्द बदल रहे हैं
लेकिन बदल अवश्य रहे हैं
शब्द या अर्थ...
(२६ अगस्त, १९९२, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)

Monday, May 17, 2010

परिवर्तन 2

परिवर्तन,
कहाँ है,
नहीं जानता,
परन्तु है अवश्य,
किसमे
यह भी नहीं मालूम,
परन्तु है अवश्य,
आखिर इसकी आवश्यकता क्या है.

संतुष्टि किसी को नहीं है,
शायद यही हमारी विवशता है,
फिर भी नैतिकता शब्दकोष मे है,
इसको ढूँढ पाना
कोई कठिन नहीं,
है परन्तु
कुछ के लिए,
जो परिवर्तन को परिवर्तित
करते रहते हैं.

सीमा - इसको मैं नहीं जानता,
संतोष - आँखों से बहुत दूर है,
विश्वास - इतिहास की पुस्तकों मे है,
धैर्य - कभी मित्र था,
म्रदुल - आता जाता था,
शोभा - पता नहीं आजकल कहाँ है,

समय, काल व परिस्थिति,
शब्दों की परिभाषाएं
परिवर्तित हो चुकी हैं,
ना जाने कितनी पीड़ियाँ
समर्पित हों चुकी हैं
बिना अर्चना के,
कभी-कभी मस्तिष्ट
प्रश्नों के प्रकाश में,
कुछ सोचने का प्रयत्न करता है
परन्तु प्रयत्न
मात्र प्रयत्न ही रहेगा
मैं जानता हूँ,
निरर्थक होंगे सारे प्रयास
फिर कहाँ होगा विकास...

(११ अक्टूबर, १९९१, ७:१५ बजे संध्या, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड)

परिवर्तन 1

द्वेष, घ्रणा, छल, कपट, असत्य, फरेब,
आदि, इत्यादि,
शब्दों ने
किया है बसेरा मेरे शहर मे,
भाषा में,
चालढाल में,
रंग-ढंग में,
कारण, पता नहीं,
शायद,
वे अधिक फलते फूलते हैं,
शायद,
उन्हें दर्शन होते हैं
परमपिता परमेश्वर के,
शायद,
वे अधिक सम्रद्धवान होते हैं,
शायद,
उन्हे अधिक आदर मिलता है,
समाज से,
राष्ट्र से,
या फिर
उनकी पूँछ होती है,
उनकी पहुँच होती है,
परन्तु
यह निश्चित है कि
वो चोर हैं,
समान के नहीं,
सम्मान के,
हथियार के नहीं,
सत्कार के,
धन के नहीं,
मन के,
मकान के नहीं,
श्य्म्शान के,
यह ऐसी चोरी है,
जिसकी रपट
थानेदार नहीं लिखता,
इसको
प्रकाशित भी नहीं किया जा सकता,
कुछ लोग इसको
वकवास कहते हैं.
इसकी जांच पड़ताल
नहीं की जा सकती,
जासूसों द्वारा
क्योंकि
वे स्वयं जासूस हैं,
कंफुउस हैं,
मनहूस हैं,
डिफुउस हैं,
रिफुउस हैं,
समाज से, परिवार से,
जहां से,
जहाँ वो शरणार्थी हैं.

इसकी रपट लिखी
जा रही है,
इसकी जांच-पड़ताल
भी चल रही है,
उससे संभंधित कार्य
प्रगति पर है,
उनका भविष्य
अंधकार मे नहीं है,
उनके अनुसार,
वो जानता है
उसका परिणाम,
उसकी पीड़ियाँ
भुगतेंगी,
पश्चाताप,
उनकी पीड़ियाँ करेंगी,
उसको डर नहीं है,
बद्दुआओं का,
पीडाओं का,
पीड़ियों की.

परन्तु मैं सोचता हूँ,
क्यों ना अपना शहर बदल लूं,
या फिर
खत्म कर दूं,
इन सबको.
शायद बेहतर
यही होगा,
क्योंकि
यदि मैने शहर बदला,
तो उस शहर मे केवल
उन्ही की आवादी होगी,
परिवार नियोजन से
मुक्त होंगे
वे परिवार,
घर से शहर,
शहर से प्रदेश,
प्रदेश से देश,
देश से परदेश.

अब इन शब्दों का बसेरा
कहीं नहीं होगा
यदि
हम, आप और सब जागें,
देर है
अंधेर नहीं
परिवर्तन होगा
अवश्य
शब्दों में
प्रेम से
सत्य से......

(३० अगस्त, १९९१, ११:१५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश - उत्तराखंड)

पश्चाताप

मेरी चौखट पर
किसी नामर्द की आहट,
मस्तिष्ट विचारता है,
समस्त भूत की पुस्तकें;
कुछ जानी पहचानी सी प्रतीत होती है,
यह दस्तक;
शायद -
पुनः मेरे स्पर्श की कल्पना
उन्हे हो,
परन्तु, बल्कि...
अब मात्र
निष्प्राण, मानव समान
किसी भाषा के प्रयोग
को दर्शाते हैं;
अरे वो .......?
नहीं हों सकता,
मुझे विश्वास नहीं है,
और
हों भी क्यों;
आखिर..........!
खैर...

परिवर्तन,
वक़्त की,
समय की मांग है,
परन्तु -
पुनः स्वयं के प्रयोग को
बाध्य करता है,
शायद
वो भी बिवश है,
किसी को क्या मालूम
सत्य क्या है...
संभवतः
मै भी नहीं जानता,
शायद वह भी नहीं,
फिर भी
कुछ है अवश्य,
यदि नहीं
तो यह आहट
आखिर
जानी, पहचानी
क्यों लगती है,
यदि सत्य,
वास्तव मे सत्य है,
तो करना ही पड़ेगा
पश्चाताप,
मात्र आहट को नहीं,
स्वयं मुझे भी
संतोष
किसे और क्यों...

(२९ अगस्त १९९१, १०:३५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश (उत्तराखंड))