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Friday, August 8, 2014

कर्मबल

कर्मवीरों अब उठो देखो खिली सी धूप
ह्रदय खोलो प्रेम की धारा धवल हो रूप
बाजुओं की वीरता का अंत होता काल
ज्ञान के झर बीज पूर्वज बो गए अब ढाल

अब नहीं विश्राम चाहे बीतें शत प्रहर
अब दिशा पकड़ो भुलाकर ऊर्जा का ज्वर
काम का अम्बार पथ से ना करे भ्रमित
प्रण विनय परिश्रम प्रणय प्रतिमूर्ति अमित

कौन बैठा किस भवन किस डाल किस तरुवर
तुम तुम्हारी दृष्टि तुम्हारे तीर तुम्हारे कर
तुम उजाला बन करोगे रौशनी हर घर
याद रखना शाम का ढलना नहीं पथ पर

धूप ओझल हो भला तुम कर्मबल देखो
शाम ढल जाए प्रकृति का रूप कल देखो
चील कौए कीट कीड़े सब प्रकृति के जीव
एक मानव ही जुटा है अभिग्रहण निर्जीव

(प्रो० एस के मिश्र द्वारा निम्न कविता मिली___ उसके उत्तर में उपरोक्त पंक्तियाँ भेजी)

शाम सहसा ढल गयी है 

धूप ओझल हो गयी है । 

जो जहाँ हैं, लौटने को हो रहे तैयार 
काम  का वैसे पड़ा है सामने अंबार 
अब करेंगे, अब करेंगे, हो गयी दुपहर 
सोचने में और गुजरा एक अन्य प्रहर । 

डूबने को जा रहा मसि-सिंधु में संसार  
मच्छरों की फ़ौज़ है उन खिड़कियों के  पार 
हैं वहीं  टकरा रहे चमगादड़ों के पर 
गूँजते हैँ हर तरफ बस झींगुरों के स्वर । 


ऊँघते उल्लू जमे हैँ शाख पर हर ओर 
उस तरफ से आ रहा है शावकों का शोर 
दूर तक दिखता नहीं है रौशनी  का श्रोत 
कर सकेंगे राह रौशन ये निरे खद्योत ?

शाम सहसा ढल गयी है । 

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सुधाँशु

Monday, February 10, 2014

बंद

बंद कर दिए जाते हैं
कल-कारखाने
कार्यालय
कार्य करने के सभी
स्थान व संस्थान
अवरुद्ध किये जाते हैं
सब मार्ग
बंद कर दी जाती हैं
सड़के व वाहन
रोक दी जाती है
गति

बंद नहीं होती है
भूख
फिर क्यों
बंद कर दिए जाते हैं
भूख मिटाने के संसाधन

हाथ
कुछ करने के लिए.
पैर
कुछ दूर चलने के लिए
आँखे
देखने के लिए
कान, नाक, जिव्याह
सभी बने हैं
प्राकृतिक रूप से
कुछ न कुछ करने के लिए
आखिर
क्यों बंद कर दिया जाता है
इनका प्रयोग

शरीर के
इन सभी अंगो को
निर्देशित करता है
मस्तिष्ट
कार्य करने के लिए

नहीं बंद होती है
पेट की भूख
फिर भी
बंद कर दिए जाते है
भूख मिटाने के
साधन व संसाधन

संभवतः
काम करना बंद कर देता है
उनका मस्तिष्ट
जो अनभिज्ञ हैं
इस सत्य से
कि
कुछ भी हो
नहीं बंद होती है
पेट की भूख

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21 Dec 2013 in train 12435...gty bly rajdhani...8 30 am just crossed bongaigaon....
(२० दिसम्बर को असम बंद था, और हम लोग गुवाहाटी जा रहे थे शिलांग से.... पिछले कुछ महीनो से मेघालय में बंद काफी आम हो गया है, इनर लाइन परमिट को लेकर... इस कविता का जन्म इन बन्दों के कारण प्रभावित दिहाड़ी कमाने वाले मजदूरों की व्यथा से हुआ)

Thursday, September 12, 2013

दौड़

सूरज की
प्रथम किरण के साथ ही
हो जाती है प्रारंभ
दौड़,
चाहे आप चीता हों
अथवा हिरन।

चीता दौड़ता है
इस आशय से
कि उसको
मरना पड़ेगा भूखा
यदि नहीं मिला
उसको उसका शिकार
उसको दौड़ना ही पड़ेगा,
दौड़ते रहना पड़ेगा
अन्यथा मार देगी उसको
भूख।

और हिरन
दौड़ता है
इस आशय से
कि यदि नहीं दौड़ा वह
तो बन जायेगा शिकार
पीछे आ रहे चीते का
मार देगी उसको
चीते की भूख।

चीता या हिरन
सूरज की
प्रथम किरण के साथ ही
हो जाती है प्रारंभ
दौड़।

हम सबको दौड़ना पड़ता है
दौड़ना पड़ेगा
दौड़ना चाहिए
अपनी भूख मिटाने के लिए
और
इसलिए भी
कि कहीं हम
किसी दूसरे की भूख का
शिकार न हो जाएँ,

चाहे हम
स्वयं दौड़ें
अथवा
दौड़ाये जाएँ।