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Saturday, May 4, 2019

नेतृत्व नीति

व्यक्ति यदि व्यवधान का कारण बने तो जान लो
व्यक्ति ही साधन, निवारण, खोज में सहयोग देंगें
तुम अगर सम्राट बन संशय, सघन के साथ होगे
सब तुम्हारी दीप्ति के दोष का प्रयोग होंगे

साथ लो सबको सभी का साथ तुमको प्राण देगा
मान लो इसको इसी से सोच का निर्माण होगा
यदि तुम्हारा 'मैं' तुम्हे वाधित करे स्वीकारने को
मान लेना कट गया जीवन यहीं विश्राम होगा

क्यों हुआ विद्रोह इसको जान लो अच्छा रहेगा
क्यों लगी है आग यदि संज्ञान लो अच्छा रहेगा
कारकों के कारणों को कुछ समय देकर समझना
बिन सजे संवरे धवल दर्पण सभी सच्चा कहेगा

भूल जाओ भूत की भाषा भले 'मैं' रोकता हो
दृष्टि डालो नव तिमिर पर ह्रदय कुछ भी सोचता हो
काठ की कुर्सी किसी के साथ कुल जीवन नहीं है
जामवंतो से हुआ निर्मित भले पद टोकता हो

उठो उठकर रीढ़ को कुछ लोच देकर आंख पोछो
उस अमावस रात का तुम ऋण उतारो हाथ पोछो
पूर्णिमा का चांद अपनी रोशनी संचित किये है
झुको झुककर सूर्य के सम्मुख नया निर्माण सोचो

खोल वाहें खिलखिलाओ हंसो अट्टाहस करो तुम
मिलो मिलकर झूमलो खुलकर जरा साहस करो तुम
नहीं कटु स्मृतियां सदा व्यक्तित्व से संलग्न रहतीं
उठ अंधेरों की विदा का आज दुःसाहस करो तुम

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Saturday, August 16, 2014

रास्ते

ये टेढ़े रास्ते लेकर
मुझे मंजिल दिलाएंगे
मेरे हर कृत्य को
सम द्रष्टि देकर भूल जायेंगे
मेरी यात्रा मुझे जीवन परख
मे व्यस्त रखेगी
बस इतना सोचता हूँ
ये कदम पत्थर सजायेंगे
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Friday, August 8, 2014

कर्मबल

कर्मवीरों अब उठो देखो खिली सी धूप
ह्रदय खोलो प्रेम की धारा धवल हो रूप
बाजुओं की वीरता का अंत होता काल
ज्ञान के झर बीज पूर्वज बो गए अब ढाल

अब नहीं विश्राम चाहे बीतें शत प्रहर
अब दिशा पकड़ो भुलाकर ऊर्जा का ज्वर
काम का अम्बार पथ से ना करे भ्रमित
प्रण विनय परिश्रम प्रणय प्रतिमूर्ति अमित

कौन बैठा किस भवन किस डाल किस तरुवर
तुम तुम्हारी दृष्टि तुम्हारे तीर तुम्हारे कर
तुम उजाला बन करोगे रौशनी हर घर
याद रखना शाम का ढलना नहीं पथ पर

धूप ओझल हो भला तुम कर्मबल देखो
शाम ढल जाए प्रकृति का रूप कल देखो
चील कौए कीट कीड़े सब प्रकृति के जीव
एक मानव ही जुटा है अभिग्रहण निर्जीव

(प्रो० एस के मिश्र द्वारा निम्न कविता मिली___ उसके उत्तर में उपरोक्त पंक्तियाँ भेजी)

शाम सहसा ढल गयी है 

धूप ओझल हो गयी है । 

जो जहाँ हैं, लौटने को हो रहे तैयार 
काम  का वैसे पड़ा है सामने अंबार 
अब करेंगे, अब करेंगे, हो गयी दुपहर 
सोचने में और गुजरा एक अन्य प्रहर । 

डूबने को जा रहा मसि-सिंधु में संसार  
मच्छरों की फ़ौज़ है उन खिड़कियों के  पार 
हैं वहीं  टकरा रहे चमगादड़ों के पर 
गूँजते हैँ हर तरफ बस झींगुरों के स्वर । 


ऊँघते उल्लू जमे हैँ शाख पर हर ओर 
उस तरफ से आ रहा है शावकों का शोर 
दूर तक दिखता नहीं है रौशनी  का श्रोत 
कर सकेंगे राह रौशन ये निरे खद्योत ?

शाम सहसा ढल गयी है । 

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सुधाँशु