Showing posts with label आशय. Show all posts
Showing posts with label आशय. Show all posts

Friday, April 19, 2019

पानी, मिट्टी और पत्थर

बारिश से पानी
पानी से जीवन
मिट्टी और पत्थर
बारिश की बूंदे
पत्थर की चमक
मिट्टी का भोजन
मिट्टी से पत्थर
पत्थर से मिटटी

हम
मिट्टी या पत्थर?

गांव और शहर
मिट्टी और पत्थर
गांव से शहर,
मिट्टी से पत्थर

बारिश का पानी
पत्थर से टक्कर
पत्थर से मिटटी

गाँव, शहर और पत्थर-वन

मिट्टी-पानी का खेल
उनकी घनिष्टता
का
प्रकार व विकार

समावेशी है
मिट्टी का स्वभाव
उसकी शक्ति है
उसकी लोच
शक्ति का
दुरूपयोग
कभी-कभी  

समय, काल व परिस्थिति
मिट्टी व पत्थर का संबंध
व समीकरण

गांव
बन रहे हैं
शहर
और शहर
वैश्विक गांव

गतिमान है
कालचक्र - कर्मचक्र
गति-सीमा से परे

क्या है दिल्ली
गांव अथवा शहर
मिट्टी अथवा पत्थर

-विजय कुमार श्रोत्रियः
[20:11, 11 अप्रैल, 2018]

Thursday, September 11, 2014

आशय

नियम क़ानून अनुशासन
सभी अपवाद लगते हैं
जो आशय हो सही संगत
सही संवाद सजते हैं
मेरा दर्शन मेरे मित्रों को
क्यों कल्पित ही लगता है
बस इतना सोचता हूँ
क्यों नहीं संवाद करते हैं
=======================

Thursday, November 28, 2013

सोच सकता हूँ

मैं सुनाता आ रहा हूँ 
गीत कविता
सुन जिसे क्यों सो गया है
कुल जहाँ संकुल यहाँ 
क्यों आँख खोले सो गया है
सत्य आशय झूठ संशय
एक आशा एक भाषा
सोच सकता हूँ मैं इतना
तन बदन अब रो गया है
=======


Friday, November 8, 2013

भ्रम - द्रष्टिभ्रम

जैसा दीखता है
वैसा होता नहीं है
व्यक्ति 
व्यवस्था
व्यथा

वो जैसे दीखते हैं
उनको पता है
वैसे नहीं हैं वे

जैसे भी हैं वे
वैसे दीखते नहीं है

कई बार
रुके हुए
चलते दीखते हैं
कई बार
चलते हुए
रुके हुए
दिखाई देते हैं

व्यवस्था अच्छी दीखती है
अच्छी न होते हुए भी
या फिर व्यवस्था
अच्छी नहीं दीखती है
क्योंकि
हमारे पूर्वाग्रह
हमें वह दिखाते हैं
जो हम देखना चाहते हैं

स्वस्थ दीखने वाला व्यक्ति
आंतरिक रूप से
कितना अस्वस्थ होता है
नहीं दीखता है हमें

एक प्रश्न
क्या
व्यक्ति
व्यवस्था, व
व्यथा
हमको ख़राब
या
अच्छी दीखता
या दीखती है
क्योंकि हम उसको
वैसा देखते हैं
जैसा देखना चाहते हैं

हमारा चाहना ही तो
हमारा चश्मा होता है
जिसे हम प्रायः
अपनी सुविधानुसार
पहनते
या बदलते हैं
यह कोई दृष्टिभ्रम नहीं होता.