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Tuesday, January 3, 2017

Will to Survive


[picture borrowed from Ms Babita Asthana's Facebook Wall]
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1
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Life torn into pieces
Flood Full of furies and frames
Nature 
Testing their appetite to survive
Will to survive at any cost
Keeps their eyes occupied
Permutations and combinations
Possibilities and hope
Determination and drive
Scanning their brain waves

Sense of togetherness 
Energising them
Sense of expectation
Forcing them
Sense of existence
Reminding them

Thorns on the way
To better tomorrow
Shall surely lead them
To tackle
Atrocities
Complexities and 
Uncertainties
Shall surely assure them
Survival 

Learning
Living and 
Leading Life.

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2
==
Water they say
Gives life
Water they say
Saves life

But we see
Water
Taking lives
Destroying age old
Held beliefs
And
Redefining
Relationship
Between Water and Life.

Friday, February 14, 2014

आस


सो गयी संसद भुलाकर 
कृत्य काली रात के 
जग गई है आस जन मे 
जन्म नव जज्वात के 
बर्ष बीता रात भागी 
धुंध छटकर बात जागी 
सोच सकता हूँ मैं इतना 
शह दिखाकर मात के

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Thursday, November 28, 2013

सोच सकता हूँ

मैं सुनाता आ रहा हूँ 
गीत कविता
सुन जिसे क्यों सो गया है
कुल जहाँ संकुल यहाँ 
क्यों आँख खोले सो गया है
सत्य आशय झूठ संशय
एक आशा एक भाषा
सोच सकता हूँ मैं इतना
तन बदन अब रो गया है
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Friday, April 5, 2013

मुस्कराना


71

मुस्कराना बहुत ज़रूरी है 
वरना सब कुछ उदास ही तो है
दूर खुद से कभी न जाओ तुम 
ज़िंदगी नाम आस ही तो है
वक्त रहता कहाँ है हरदम एक 
उठ के गिरना है गिरके उठना है
सोचता हूँ मैं बस इतना अब 
नदी के नाम प्यास भी तो है 
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4 april 2013/ 8 30 am

(शैली अग्रवाल की फ़ेस बूक प्रविष्टि 
'तनहा... खुद से दूर.. सोच के मुस्कुरा देती हूँ..
कि अब उदासी का साथ सही.. 
उम्र भर तो रहेगा..!!
के उत्तर मे)
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(47 - CLICK HERE)          (48-50 - CLICK HERE)



Sunday, March 31, 2013

सवेरा


70
वे जहाँ तक देखते हैं 
बस अँधेरा दीखता है
पर मुझे फिर भी सुखद 
कोमल सवेरा दीखता है
रात रोशन दिन दिवाली 
दीप आशा फूल माली
सोच सकता हूँ मैं इतना 
क्यों कृषक हल खींचता है 


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Thursday, March 14, 2013

आस



66

ओस की बूँदें कहानी लिख रही हैं प्यास पर
ज्यों नहाकर धूप की किरने बुलाएँ घास पर
आँख की बारिश ह्रदय को शुष्क करती जा रही है
सोच सकता हूँ मैं इतना चल रहा हूँ आस पर

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Thursday, February 14, 2013

मैं इतना सोच सकता हूँ - 13

61

मैं सुनना चाहता हूँ गीत मंगल और सुमंगल के
है जीवित हो चुकी आशा बृहद विस्तार जंगल के
मेरे विश्वास में कोई कमी होगी तो क्यों होगी
मैं इतना सोच सकता हूँ सधे संवाद जंगल के

62

मैं पड़ना चाहता हूँ पुस्तकें स्नेह वंदन की
सरल हो व्याकरण उपयोग तम गंध चंदन की
मगर क्यों द्वेष भरती पुस्तकें बाज़ार होती हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ लगी क्यों आस बस धन की

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Thursday, November 29, 2012

पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन


ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन

चल रहा हूँ आँख मींचे
मान कर आदेश सारे
मौन रहकर कष्ट सहकर
बिन दिशा तन के सहारे
किस दिशा मुड़ना बता निर्देश देगा कौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन

रास्ता जो ले चुका हूँ
पत्थरों संग चल रहा है
संगति सम-गति समय सुध
ज्ञान मेरा छल रहा है
कंकडों सी रेत में जल भेद देगा कौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन

झेल मौसम के थपेड़े
कुल बदन पीड़ित हुआ है
बोझ कन्धों पर लिए
नव लक्ष्य अब जीवित हुआ है
वह चमकता गाँव तुमको कर सकेगा मौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन

केश सब उलझे
हवाएं कर रहीं क्रंदन
थक गया है पथ सुझाए
प्राण प्रेरित मन
दे दिया साधन बता अब साध्य देगा कौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन

अनुभवों की पोटली ले
पथ मुझे अब भा रहा है
अब दिशा का ज्ञान कुछ
स्पष्ट होता जा रहा है
अब दिशाओं का नहीं है युद्ध मैं फिर मौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन

Tuesday, May 22, 2012

आवाज

१७.
मुझे जब दर्द होता है, नहीं आवाज आती है
मगर हर कष्ट की परिणति, उजाले मे समाती है,
मेरी पीड़ा, मेरा जीवन, तेरा जीवन, मेरी पीड़ा
मैं इतना सोच सकता हूँ, कहाँ आवाज आती है
9 Oct 11, shilling

Thursday, October 13, 2011

मध्य और माध्यम


खड़े होकर
जब मैंने देखा
मुझे दिखाई दिए
कुछ ऊपर
कुछ नीचे
मेरा मध्य
उनके मध्य से भिन्न था

अच्छाई और बुराई
पाप और पुण्य
दुःख और सुख
क्लेश और शांति
इनका मध्य क्या है

कुर्सी बनाने वाला बढई
कुर्सी पर बैठने वाला शासक
पानी पिलाने वाला पियाऊ
सबको पानी पिलाने वाला शासक
मजदूर और मालिक
धनी और गरीब
किसान और उद्धमी
इनका मध्य क्या है

मुझे मात्र ज्ञात है
मध्य
सिर और पैर का 
जिसके लिए 
हम सब जी रहे हैं
युद्ध कर रहे हैं 
पाल रहें हैं
आशाएं
अभिलाषाएं

काश 
यह मध्य ना होता  
मेरा माध्यम भी
ना होता
ना होता
कोई युद्ध
संघर्ष
ना होती
कोई अभिलाषा.

(VK Shrotryia, 9:40 AM, 28 Sept 2011, Shillong)

Sunday, September 25, 2011

कल्पना का सूरज



Uday Prakash :
Waiting alone for the sun to appear from far beyond the clouds and mountains : Internal Exile in the Doomed Topograhy of the Language

कब निकलेगा 
कल्पना का सूरज
कब बादलों पर 
तीब्र प्रहार कर 
निकलेंगी किरनें 
और भींचती हुई 
ह्रदय को 
विवश कर देंगी
थामने को
कलम 
फिर क्या  
आंखे बोलती जायेंगी
हाथ शब्दों को उतारेंगे 
कल्पनाओं के आकाश से 
संभालकर  
अक्षरों को बांधेंगे
कुम्हार की तरह  
और
फिर तैयार होगी
एक स्मरणीय 
प्रतिमा
स्फुटित होगी
कल्पनाओं की भाषा

मुझे प्रतीक्षा है
कब
सूरज उदय होकर
देगा प्रकाश
निराशा के बादल
छंट जायेंगे
आशा
सूरज
उदय
प्रकाश.
कच्ची अमिया 
कब पकेगी...

(3:40 pm, 25 Sept 2011, Shillong)

Tuesday, October 12, 2010

मेरा तेरा, तेरा मेरा

किसने देखा, किसका गाँव
धरती पर रखने दो पाँव

सब इतिहास, हुआ भूगोल
आंखें किसको रहीं टटोल

मेरा तेरा, तेरा मेरा
कैसा होगा नया सवेरा

उसकी भाषा, उसका दावं
धरती पर रखने दो पाँव
किसने देखा, किसका गाँव.

मेरा घर, मेरा संसार
आस पास सब है परिवार

तेरा भवन, भवन बेकार
आंखें ढूँढें पालनहार

कदम पड़ रहे, डावांडोल
आँखें किसको रहीं टटोल
सब इतिहास हुआ भूगोल.

जीवन का सब सार विचार
साथ ना जाये कुछ भी यार

धन, पद, शक्ति और सम्मान
नियमो का क्यों हो अपमान

बीन बजाये, कौन सपेरा
मेरा तेरा, तेरा मेरा
कैसा होगा नया सवेरा...

(7th Oct 2010/ Shillong - Meghalaya)