Showing posts with label पेड़. Show all posts
Showing posts with label पेड़. Show all posts

Sunday, March 24, 2019

बीज

बीज के पौधा बनने में
कई रोड़े हैं
जैसे भी हैं
हम सब मात्र यह सोचें
कि थोड़े हैं

पानी का खारापन
बीज के गुणों को
निचोड़े है
खाद ऐसी कि
मट्टी ही नहीं फोड़े है

सारे प्रयास
पौधा-फल-फूल
से जोड़े है
परंतु
बीज के प्रस्फुटित होने में
अभी भी बहुत रोड़े हैं

Thursday, July 3, 2014

भवन प्रतीक्षा में है

भवन का द्वार
प्रतीक्षा में है
कोई आए
उस पर लगी जंग हटाये
उसको खोले, सहलाये
उस पर जमी धूल पर
अपने निशान लगाये
अपनी उपस्थिति पंजीकृत कराये
कोई आए

भवन का बगीचा
प्रतीक्षा में है
कोई आए
मिटटी खोदे
क्यारियां बनाये
कोई आए
आशा के बीज बोए
फूलों से इस बगीचे को सजाये
कोई आए

किन्ही निर्देशों के अभाव में
भवन के माली
हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं
बीज और खाद की प्रतीक्षा में
कोई आए

भवन की दीवारें, दरवाजे व खिड़कियां
अपनी विवशता में रो रही हैं
प्रतीक्षा कर रही हैं
किसी नवीन स्पर्श की
चटकनियां रुष्ट हैं
उनको खोलना आसान नहीं होगा

भवन के पर्दे रोष में हैं
किसी भी प्रकार के वायु प्रबाह का
कोई प्रभाव नहीं है उन पर
खिड़कियों-दरवाजों ने
उनको जकड़ रखा है
(विश्वविद्यालयी नियमो-अधिनियमों की भांति)
परदे भूल गए हैं हिलना

भवन प्रतीक्षा में है
कोई आए

भवन की चल संपत्ति
कुछ डरी हुई है
चल अलमारी, सोफा, कुर्सी, मेज
इत्यादि सब
कुछ डरे हुए हैं
कहीं भवन का नया मालिक
उनको तिरस्कार की दृष्टि से न देखे

भवन में
किसी के न होते हुए भी
भवन की गाड़ी चल रही है
विश्वास कीजिये
भवन की गाड़ी चल रही है
संस्थान की गाड़ी भी चल रही है
मालिक की अनुपस्थिति में भी
भवन की गाड़ी चल रही है
परन्तु फिर भी
भवन प्रतीक्षा में है
कोई आए

भवन परिसर में लगे पेड़
किसी प्रभाव
व अभाव से परे
मस्त हैं
झूम रहे हैं
न तो इन्हें प्रतीक्षा है
मालिक की
न ही किसी माली की
और न ही उनका अस्तित्व
खतरे में है
(पौधों की तुलना में)
पेड़, पेड़ है
प्रकृति पर निर्भर पेड़
किसी भी मानवीय स्पर्श की
चेतना से परे

रौंदा तो पौधों को जाता है
बदल दिया जाता है
मौसमानुसार
अच्छे फूलों की आशा में
मौसमी फूलों की आशा में
बहुत से पौधों को
नहीं बनने दिया जाता है पेड़
उनमे पेड़ बनने की पूरी क्षमता
होते हुए भी
माली मात्र
मालिक के निर्देशों का पालन करते हैं
स्वेच्छा के विरुद्ध

मिटटी प्रतीक्षा में है
कोई आए

इतना बड़ा भवन
कितना छोटा हो जाता है
बड़े-बड़े पेड़ों के होते हुए भी

भवन प्रतीक्षा में है
कोई आये
इसको
अपनाये
सजाये
महकाए
इसका हो जाये
कोई आए

भवन अनभिज्ञ है
कि
भवन की गाड़ी चल रही है

(पिछले एक वर्ष से किसी स्थाई कुलपति के अभाव से विश्वविद्यालय में वर्तमान में चल रहे गतिरोध व महत्वपूर्ण निर्णयों में हो रहे विलम्ब को समर्पित इस कविता का जन्म कुलपति निवास के सामने से निकलते चलते हुआ) 

Saturday, June 21, 2014

फूल और मिट्टी

घर में फूल
फूलों में घर 
फूलों की खुशबू 
खुशबू के फूल
फूलों से रिश्ते
रिश्तों से फूल 
रिश्तों सी शाखाये 
शाखाओं से रिश्ते

लकड़ी पर कन्धा
कंधे पर लकड़ी
जड़ों से पेड़
पेड़ों से जड़ 
मट्टी में जड़
जड़ में मिट्टी 
मिट्टी में बीज 
बीज से जड़
जड़ से पौधा 
पौधे से फल-फूल 
पौधे से पेड़
पेड़ से फल-फूल 
पेड़-पौधों से लकड़ी 
लकड़ी से आग
आग से मिट्टी

मिट्टी का मानव
मानव की मिट्टी

फूलों से कीट
कीट से फूल
फूलों से बगिया
बगिया से फूल
फूलों से रंग
रंगों से फूल
फूलों से शूल
शूलों से फूल

पानी में मिट्टी
मिट्टी में पानी
पानी के बादल
बादल से पानी
पानी से मिट्टी

मिट्टी का मानव
मानव की मिट्टी

Monday, February 24, 2014

तमाशबीन

हताश से दीख रहे हैं
ये हरे पेड़
बनती देख बिल्डिंगें
अपने आस पास


उन्हें पता है
उनके
इतने फलदार होते हुए भी
उनके प्रति
कोई नहीं
व्यक्त करेगा अपनी सहानुभूति

उनके पालनहार ही बनेंगे
उनके भक्षक
उन्हें देख निहत्था व लाचार
उनकी भावभीनी विदाई की
करेंगे तैयारी

तोड़ दिए जायेंगे
मकड़ी के जालों से दीखते
शाखाओं पर
सवार रिश्ते
हरी-हरी पत्तियों पर भी
नहीं खायेगा कोई तरस

काटते जायेंगे
पेड़ों के पेड़

बागों के बाग़

और हम सब
बने रहेंगे तमाशबीन
बस में
सड़क पर
अस्पताल में
घर में
कार्यालयों में
हर जगह
बैसे ही जैसे
दिल्ली की
सोलह दिसंबर दो हज़ार बारह
वाली रात
दोहराई जा रही हो
दामिनी, निर्भया
या
ज्योति के
नाम में गुमनाम।

(3 जनवरी 2014, रात्रि 12 बजे, सुभाष नगर बरेली)