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Tuesday, May 21, 2013

अलंकार

76

मुझे उपमा सुहाती है 
उन्हें अनुप्रास भाता है
मगर क्यों श्लेष कर अतिश्योक्ति 
यह उपहास लाता है
अलंकारों की दुनिया में 
नहीं रूपक नहीं दीपक
मैं इतना सोच सकता हूँ 
विधा व्यंजन सजाता है

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