Tuesday, May 29, 2012

संतुष्टि

१८.
मेरा बस अर्थ इतना है, सकल उत्पाद झूठा है
अगर धन भूख सच्ची है, मेरा इतिहास झूठा है
सभी हों खुश, सभी सम्रद्ध, तभी सम्पूर्ण संतुष्टि
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं उल्हास झूठा है.
22 Nov 11, shillong 10 AM

Tuesday, May 22, 2012

आवाज

१७.
मुझे जब दर्द होता है, नहीं आवाज आती है
मगर हर कष्ट की परिणति, उजाले मे समाती है,
मेरी पीड़ा, मेरा जीवन, तेरा जीवन, मेरी पीड़ा
मैं इतना सोच सकता हूँ, कहाँ आवाज आती है
9 Oct 11, shilling

Sunday, May 13, 2012

माँ तुझे सलाम

मैं क्यों माँ को सताता था, नहीं यह जान पाता हूँ,
मगर फिर भी अमित ममता, मैं उसके प्राण भाता हूँ,
परी बातें, बड़ी मातें, खरी-खोटी, भरी आंखें,
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं कुछ भूल पाता हूँ। 

मेरी माँ कष्ट सहती थी, स्वयं प्रमोद करता था,
वो फिर भी प्रेम करती थी, समर कर रोज़ मरता था,   
सरल जीवन, सफल जीवन, सजग निष्ठा, सफल पूजा, 
मैं इतना सोच सकता हूँ, मैं क्यों कर क्रोध करता था।

मैं कुछ ना भूल पाता हूँ, मुझे माँ याद आती है,
मेरे हर कृत्य को भूली, मुझे स्मृति सताती है,  
तेरे सपने, मेरी आंखे, तेरी मेहनत, मेरी उन्नति,
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही माँ, माँ कहाती है। 

13 May 2012, Shillong, 9 PM
आज अन्तराष्ट्रीय माँ दिवस है... यह पंक्तियाँ मेरी माँ को समर्पित जिन्होनें अत्यंत कष्ट सहकर हम सबको, हमारे सुनहरे भविष्य हेतु, पड़ाया व बडाया ... माँ तुझे सलाम ... (these lines are dedicated to my mother who suffered a lot in bringing us up..... today is mother's day)

रात और रौशनी

रात दिन मे दिखाई देती है 
रौशनी से विदाई लेती है 
रात की रौशनी नहीं टिकती 
दिन की काली कमाई लगती है।
 

Monday, May 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 3

१२.
मेरे सब मित्र अच्छे हैं, मुझे मंजिल दिखाते हैं
मगर फिर क्यों वही मुझसे, सही रस्ता छिपाते हैं
मेरी मंजिल, तिरा निर्णय, तिरा संशय, मेरा रस्ता
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं मंजिल वो पाते हैं.
१३.
मेरे सब बाल पकते हैं, वो बालों को रंगाते हैं
मगर क्यों उम्र को हम, सब प्रकारों से छिपाते हैं
तेरा रुकना, मेरा चलना, तेरा चलना, मेरा रुकना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं हम सोच पाते हैं.
१४.
मुझे आकाश के तारे, चमक कर क्यों बुलाते हैं
अगर उस व्योम मे इतने, मधुर स्वर गुनगुनाते हैं
तेरी आशा, मेरी मंशा, मेरे अपने, मेरी सीमा
मैं इतना सोच सकता हूँ, कि वे क्यों झिलमिलाते हैं.
१५.
मुझे रोना नहीं आता, उन्हे हंसना रुलाता है
मगर निष्प्राण जीवन का, यही चेहरा दिखाता है
तेरी भाषा, तेरे आंसू, तेरी क्रिया, तेरी बोली
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं कुछ साथ जाता है.
१६.
मुझे क्यों नींद आती है, उन्हें क्यों स्वप्न आते हैं
अगर हो कर्म सब अच्छे, निरर्थक अर्थ पाते हैं
मेरी निद्रा, तेरे सपने, मेरी आंखें, तेरी रचना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं अपने बताते हैं.

7 oct 2011, shillong

Saturday, May 5, 2012

विवाह

न ये संताप होता है, न ये बलिदान होता है
यही जीवन, यही बंधन, यही अरमान होता है
मुझे तेरी, तुझे मेरी, जरूरत जान पड़ती है
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही संज्ञान होता है।

5 May 2012, Shillong...

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सुधीर राणा द्वारा प्रेषित निम्नलिखित प्रतिक्रिया के उत्तर में -

ये एक विश्वास होता है, ये एक संताप होता है,
एक ऐसा ये बंधन है, जो सबसे ख़ास होता है,
कभी टूटा मैं बंधकर, कभी टूटा नहीं बंधकर,
मगर में सोच सकता हूँ, विवाह बलिदान होता है.