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Wednesday, September 12, 2018

Remise for Premise


I went agog
seeing burgeoning fear
and stupid defenses
in the eyes
that were ready
for every kind of senseless causation.

Why one has to find
fretless fault for framing finicky friends?
Why the hell
the whole world seem
to conspire against odds
to finks foolishly?

All my legends
went in vain
and the vanity once again
cried, dry and dense
in frozen tears.

All the wildness
stood standstill
with sombre yet sublime sensibility. 

God save them
for what they intend
with intent of gaining and getting
to loose, for what
subtlety they put efforts
for the end,
missing on inordinate means,
for dreams that are unseen
through open eyes,
missing on achievable vision,
for being like pagan,
seizing sympathy serendipitously.

Monday, May 5, 2014

रतौंधी

मैं काला देखकर क्यों रंग
कुछ भयवीत होता हूँ
नहीं मालूम कारण क्यों
रंगों के बीज बोता हूँ
जो बोया वो नहीं रोपा
जो रोपा वो नहीं पाया
बस इतना सोच सकता हूँ
रतौंधी रोग रोता हूँ
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Wednesday, October 24, 2012

चूड़ियाँ


मैंने देखी 
एक माँ
अपने
दो वर्षीय
पुत्र को
खेल-खेल में
पहनाती हुई
चूड़ियाँ

बच्चा
झटक रहा था
अपना हाथ
सिकोड़ रहा था
अपनी नाक
खींच रहा था
अपनी उँगलियाँ
तनी हुई थीं
उसकी भौंए
चेहरे में
दिख रही थी
अकड़
इस दो वर्षीय
लड़के के
आँखों में भरी थी
एक रुआंस
लेकिन एक बूँद न थी
आंसू की

मैंने द्रष्टि हटाई
उसकी माँ
की ओर देखा
मैं
प्रयास कर रहा था
पड़ने का
उस माँ की आँखों को
आंकने का
उन आँखों के
आधार को
समझने का
उस भीनी मुस्कान को

आभा
देखते बनती थी
माँ के चेहरे की
दबी सी दीप्ति

मानो
बच्चा
कहना चाहता था
कुछ भी हो
नहीं पहनूंगा
चूड़ियाँ

मानो
माँ
कहना चाहती थी
कभी नहीं
कभी नहीं
चाहूंगी मैं
की मेरे बेटे को
पहननी पडें
चूड़ियाँ

मैं
मात्र इतना
सोच रहा था
आखिर
कब तक
कब तक
यह दो वर्षीय बच्चा
अपने को
बचा पायेगा
चूड़ियों से

अपनी इच्छा से
या
किसी प्रभाव में

मुझे केवल
एक ही है
डर
कहीं
यह स्वीकार
न कर ले
स्वेच्छा से
पहनना
चूड़ियाँ
कभी इसको
अच्छा न लगने लगे
पहनना चूड़ियाँ

कम से कम
ऐसा नहीं लगता
देख कर
इसके
आज के तेवर

खेल-खेल में भी
चूड़ियाँ पहनना
उसे स्वीकार नहीं है
आखिर
स्वीकार
हो भी क्यों।

Saturday, December 17, 2011

पत्थर और मैं

आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर

सड़क के बीच
देखकर बहता पानी

अप्राकृतिक
वर्षा देखकर
पानी के टेंकों से

देखते
सीमा लांघते

सुनते
साक्षात झूठ

देखते
मूल्यों का होते
सौदा

मूर्त व मौन
रूप से
देखते-पड़ते
वो सब कुछ
जिसपर प्रतिक्रिया
आवश्यक है

अपेक्षित
प्रतिक्रिया
पर लगाते
हुए विराम

उपस्थिति
अनुपस्थिति
के अंतर के ज्ञान
से परे

मैं पत्थर
बनना नहीं चाहता
या फिर
सोचता हूँ
बनूँ ऐसा पत्थर
जिसके पास अपने आपको
फेंकने की हो
शक्ति

मुझे ज्ञात है
पत्थर से ही बनते हैं
भवन

पत्थर के
इधर-उधर
होने से होता है
विभाजन

पत्थर में होते हैं
प्राण
और प्रायः
लोग मानते हैं
पत्थर में होते हैं
भगवान

लेकिन फिर भी
स्वभावतः
मैं पत्थर बनना
नहीं चाहता

फिर
आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर

मुझे डर है
न बन जाये
ये मेरी
आदत

निवेदन
रोको
मुझे
पत्थर बनने से.

(11:10 pm, 10 Dec 2011, Shillong)