Saturday, December 17, 2011

पत्थर और मैं

आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर

सड़क के बीच
देखकर बहता पानी

अप्राकृतिक
वर्षा देखकर
पानी के टेंकों से

देखते
सीमा लांघते

सुनते
साक्षात झूठ

देखते
मूल्यों का होते
सौदा

मूर्त व मौन
रूप से
देखते-पड़ते
वो सब कुछ
जिसपर प्रतिक्रिया
आवश्यक है

अपेक्षित
प्रतिक्रिया
पर लगाते
हुए विराम

उपस्थिति
अनुपस्थिति
के अंतर के ज्ञान
से परे

मैं पत्थर
बनना नहीं चाहता
या फिर
सोचता हूँ
बनूँ ऐसा पत्थर
जिसके पास अपने आपको
फेंकने की हो
शक्ति

मुझे ज्ञात है
पत्थर से ही बनते हैं
भवन

पत्थर के
इधर-उधर
होने से होता है
विभाजन

पत्थर में होते हैं
प्राण
और प्रायः
लोग मानते हैं
पत्थर में होते हैं
भगवान

लेकिन फिर भी
स्वभावतः
मैं पत्थर बनना
नहीं चाहता

फिर
आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर

मुझे डर है
न बन जाये
ये मेरी
आदत

निवेदन
रोको
मुझे
पत्थर बनने से.

(11:10 pm, 10 Dec 2011, Shillong)

Wednesday, December 7, 2011

सांस और मैं

1.
आज मैं सांस ले सका हूँ दोस्त
जिंदगी सांस मे नहीं होती
सांस लेकर नहीं मैं जिन्दा हूँ
काश ये सांस ही नहीं होती.

(1st Dec 2011, 6 pm, shillong - L 57)


2.
मुझको सांसें गिना रही थी वो
जो घडी देख कर गुजरती थी
मेरा सारा गणित अधूरा था
जिन्दगी सांस ही से चलती थी.

3.
सांस चलती है तो सताती है
सांस रूकती है तो सताती है
सांस आवागमन का माध्यम है
जिंदगी को बहुत बताती है.

(2nd Dec 2012, 8 PM, Shillong)

4.
सांस को छोड़ कर चलूँगा मैं
जहाँ तक दोस्त लेके जायेंगे
मेरा विश्वास मेरे अपने हैं
सभी सम्बन्ध हम निभाएंगे

5.
सांस का टूटना अपेक्षित है
मगर हर सांस को जिऊंगा मैं
मुझे झुकने में दर्द क्यों होगा 
अगर संभव जहर पिऊंगा मैं

6.
कष्ट साँसों से अब नहीं होता
सांस का साथ मैं निभाऊंगा
जब कभी सांस साथ छोड़ेगी 
मैं उसके साथ मुस्कराऊंगा 

7.
सांस की उम्र ढल रही है अब
मेरे चलने पे मुस्कराती है
मैं चल रहा हूँ यार रुकरुक कर
मेरे कदमो पे सर झुकाती है 

8.
सांस लगता है प्यार करती है
मैं लिख रहा हूं सांस चलती है
मैं भरी भीड़ मे अकेला हूँ
मगर ये साथ साथ चलती है

9.
चलो अब सांस को यहीं छोडें 
उसको अविराम काम करने दें
मेरे सपनों को नींद आती है
स्वप्न साँसों को बात करने दें 

10.
साँस लडती है साथ मत छोड़ो
तुम लिखो मैं तुम्हारी संज्ञा हूँ
तुम जियो मैं तुम्हे संवारूंगी
मैं विशेषण सधी प्रतिज्ञा हूँ

11.
तुम्हारा सूक्ष्मतम रहे जीवित 
तुम्हारी कल्पना को पर दूँगी
तुम्हारे शब्द कर्ण कोमल हों
तुम्हे हर पल नवीन ज्वर दूँगी

12.
तुम मुझे छोड़ कभी सकते नहीं
मैं तुम्हे लड़ के जीत लुंगी विजय
न मेरी जीत है न तेरी हार
मैं तेरे साथ ही रहूंगी विजय

(11 pm New delhi Railway Stn, platform 9, 
waiting for AC Express to Lucknow, 3 dec 2011)

13.
सांस मुझको सुला रही है अब
मेरे माथे को थपथपाती है
मुझे अब अंधकार भाता है
मेरी माँ मुझको याद आती है

14.
चाहता हूँ कि सांस को ओडून
मगर तकिये को वो सजाती है
मेरी चादर से पैर लम्बे हैं
पैर फैलें न वो जताती है

15.
उसका दर्शन बड़ा निराला है
मेरे अस्तित्व को बताता है
मेरे दर्शन को प्रश्न करता है
सभी उत्तर स्वयं सजाता है  

(12 midnight, in Train, 3 dec 2011)

16.
आँख है बंद सांस चलती है
उसके करतब सभी सताते हैं
सोच लूँ फिर भी भूल सकता नहीं
उसके सपने मुझे जगाते हैं

17.
उसका स्पर्ष याद आता है
उसका रंग-रूप भी लुभाता है 
वो मेरे साथ है जागि हुई
बंद आँखों को चमचमाता है

18.
मेरा परिचय हुआ है अब जाकर 
उसका वंदन ह्रदय से करता हूँ
मेरा जीवन उसे समर्पित है
उसके जीवन से प्यार करता हूँ 

19.
मेरे सम्पर्क-सूत्र साझे है
उसके होने से ही मै होता हूँ
मेरे होने से ही वो होती है
अपनी माला को मैं पिरोता हूँ

20.
मेरी कविता उसी के वर्णन से
कम से कम कुछ तो उसको पाया जान
उसका कृतज्ञ हूँ रहूँगा सदा
मेरा हर रोम उसका अंतर्ज्ञान

21.
अंत करता हूँ मांगता हूँ क्षमा
बहुत कुछ कह दिया अधिकारों से'
फिर मिलूँगा किसी बहाने से
विजय होगी इन्ही विचारों से.


(5:30 pm, Lucknow Delhi Shatabdi, 
4 dec 2011)

Thursday, November 24, 2011

चांटा

महंगाई का
भ्रष्टाचार का
भेदभाव का
अवसरवादिता का
झूठ का
वादों का

गलत इरादों का
चांटा
अब तक मारा है
सत्ताधारियों ने
आम आदमी पर

अब
जब आम आदमी
गया है बिदक
और
जीवित है
उसकी संवेदना,
आज
उसका संतोष
संयम,
धैर्य,
सहनशीलता,
तितिक्षा,
वात्सल्य,
सब
उसको कर रहे हैं
बाध्य
उस हाथ को
उठाने पर
जिसकी एक उंगली
ने सत्ताधारियों
को चुना हो.

क्यों
इस चांटे
की अधिक
चर्चा है
उस चांटे से

मेरी कल्पना से
परे है
इसकी सोच...


[24 Nov 2011, Shillong, 10:10 PM]
Today one person (Harvinder Singh, a sikh youth) slapped Sharad Pawar, Minister of Agriculture, Govt of India.  I am little skeptical about what must have prompted him to think of taking such a step.  There have been few cases of this nature before, when people have been throwing chappals/shoes on the powerful people.  It is the outburst of common man against the ruler/powerful.  Where are we heading???



Tuesday, November 22, 2011

घर

जिनके घर हैं
घर में नहीं रहते
जिनके नहीं हैं घर
तलाशते रहते हैं
अपना घर.

(22 Nov 2011...1040 AM, Shillong)

Monday, October 24, 2011

रैपर

आज सुबह
विश्वविद्यालय के
प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य
भिन्न भिन्न दूरियों पर
देखे पड़े हुए
रैपर
चिप्स-नमकीन के पैकेटों के
देखीं पड़ी हुई
शराब की खाली बोतलें
देखे पड़े हुए
प्लास्टिक के खाली
लुदके हुए गिलास
कागज की प्लेटें
(प्रयोग की हुई)
देखे पड़े हुए
रैपर
सिगरेट के पैकिटों के
माचिस की डिब्बियों के

यहाँ
अवश्य देखा होगा
चिंगारियों ने
स्वयं को
आग मे बदलते
और आग को
राख में

यहाँ
अवश्य हुए लगते हैं
जीत के जश्न
या
मातम
चलते चलते
या
रूककर सड़क के किनारे
बैठकर
इन मुंडेरों ने
अवश्य सहारा दिया होगा
लडखडाते कदमो को
प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य

क्या यहीं
की थी
पोरस पर
चढाई
सिकंदर ने

हार के बाद
जब पोरस से पूछा था
सिकंदर ने
'क्या सुलूक किया जाये
आपके साथ'
'वही जो एक राजा को
करना चाहिए
राजा के साथ'

क्या यहीं से 
सिकंदर की सेनाएं
वापस कर दी गयी होंगी.

प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य
सभी निर्णय लिए गए होंगे

ये सब
पड़े हुए रैपर
अपनी व्यथा कहते हैं
कविता-कहानी
को जन्म देते हैं
ज्यादा कुछ नहीं
जानता हूँ मैं
परन्तु
इतना अवश्य
ज्ञात है मुझे
यहाँ बहुतों की
हुई है
मौत.
(और बहुतों के रैपर
यहाँ अभी भी पडे हुए हैं).

(11.10.11, 6:20 AM, Shillong, NEHU Campus - after the morning walk)

(विश्वविद्यालय मे पिछले लगभग दो वर्षों से कुछ मुद्दों को लेकर गतिरोध की स्थिति बनी हुई थी, विश्वविद्यालय का प्रशासनिक कार्यालय प्रथम व तृतीय द्वार के मध्य है, जहाँ सभी महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, कर्मचारियों व अध्यापकों ने इसी सड़क पर कई बार अनशन व रैली निकाली.  अब वो सब गतिरोध लगभग समाप्त सा दीखता है, परन्तु मुझे उन दिनों का स्मरण प्रायः होता है सो इस कविता का जन्म उसी अनुभूति की अभिव्यक्ति है)

Thursday, October 13, 2011

मध्य और माध्यम


खड़े होकर
जब मैंने देखा
मुझे दिखाई दिए
कुछ ऊपर
कुछ नीचे
मेरा मध्य
उनके मध्य से भिन्न था

अच्छाई और बुराई
पाप और पुण्य
दुःख और सुख
क्लेश और शांति
इनका मध्य क्या है

कुर्सी बनाने वाला बढई
कुर्सी पर बैठने वाला शासक
पानी पिलाने वाला पियाऊ
सबको पानी पिलाने वाला शासक
मजदूर और मालिक
धनी और गरीब
किसान और उद्धमी
इनका मध्य क्या है

मुझे मात्र ज्ञात है
मध्य
सिर और पैर का 
जिसके लिए 
हम सब जी रहे हैं
युद्ध कर रहे हैं 
पाल रहें हैं
आशाएं
अभिलाषाएं

काश 
यह मध्य ना होता  
मेरा माध्यम भी
ना होता
ना होता
कोई युद्ध
संघर्ष
ना होती
कोई अभिलाषा.

(VK Shrotryia, 9:40 AM, 28 Sept 2011, Shillong)

Wednesday, October 12, 2011

मैं इतना सोच सकता हूँ

१.
मैं जितना सोच सकता हूँ, वहीँ तक सिर उठाता हूँ
मगर जब आँख दबती है, सभी कुछ भूल जाता हूँ
तेरा चेहरा मेरा दर्पण, तेरा दर्पण मेरा चेहरा
मैं इतना सोच सकता हूँ, तभी तो सर झुकाता हूँ.
२.
मेरे घर लोग आते हैं, मुझे सर पर चडाते हैं
मगर जब आँख दबती है, मुझे सपने सताते हैं
तेरा कहना मेरा सुनना, तेरा सुनना मेरा कहना
मैं इतना सोच सकता हूँ, मुझे मेरे सताते हैं.
३.
मुझे क्यों क्षोभ होता है, उन्हे क्यों लोभ होता है
मगर संयम, नियम, संशय लघु प्रयोग होता है
तेरी बातें मेरी आंखें, तेरी आंखें मेरी बातें 
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं संयोग होता है.
४.
मेरा हर रोम शोभित है, तेरी हर सांस संशित है
मगर वो कृत्य और वो वाण, शब्दशः सुरक्षित है
तेरा कहना मेरा सुनना, तेरा हँसना मेरा सहना 
मैं इतना सोच सकता हूँ, सभी उस ओर संचित है.
५.
मेरी क्यों द्रष्टि विकसित है, मुझे अब बोध होता है
अगर सबका सही हो भूत, कभी ना क्रोध होता है
मेरा कहना, मेरा जगना, मेरा सपना, मेरा अपना
मैं इतना सोच सकता हूँ, जहाँ प्रबोध होता है. 
६.
मुझे हर जीत का कारण, नया प्रतीत होता है
मगर जब हार होती है, नहीं कोई मीत होता है
मेरी श्रद्धा, मेरा आश्रय, मेरी करुणा, मेरा आशय
मैं इतना सोच सकता हूँ, मधुर संगीत होता है.

5-6 oct 2011, navmi/dashmi, shillong

Thursday, October 6, 2011

जीवन दर्शन


मेरी पीड़ा, मेरे आंसू, मेरा जीवन, मेरा अनुभव
नया है तू, नए हैं शब्द, नए कपडे, नए करतब
नयी काया, नया चश्मा, नयी वाणी, नया सपना
नयी उपमा, नई भाषा, नई संज्ञा, नया जपना

सभी सन्दर्भ अच्छे हैं, सभी सम्बन्ध सुद्रढ़ हैं
मेरा तेरा, तेरा मेरा, यही संताप की जड़ हैं 
वही हम सब, वही गीता, न कुछ लाये, न कुछ जाये
सफल जीवन हमारा हो, समझ यह सूत्र आ जाये

Tuesday, October 4, 2011

My Lab

No fire extinguisher
No air curtain
No container for hazardous waste
Absolutely
No uninterrupted power supply
No shower for eyes
No fume hoods
No bio-safety cabinets.

I am at ease
With interrupted power
With fire
With polluted air
With hazardous waste
With all chemicals.

These are welcome things
In my lab.

I observe
Actions - reactions
Movements - comments
Smiles - eyetwists
Proximities - distances
Commands - demands
Correlations - connections
Anonymities - niceties
Calculations
And
What not.

This is a perfect lab for me
As I teach
HR,
Strategy
And
Organizational Behaviour.

I just need
Free expressions of thoughts.

This is just perfect setting
And
We all are
Perfect samples.

(4th Sept 2011, Shillong, 5:20 PM, L-57)

Saturday, October 1, 2011

उन्नीसवां दीक्षांत समारोह 2011

देखकर अच्छा लगा
चूना लगाते लोग
सड़क पर पेबंद लगाते
कर्मठ वेतनभोगी
जंगल साफ़ करते
कर्मचारी
ताल से खरपतवार निकालते
तदर्थ मजदूर
अधिकारियों व
कर्मचारियों द्वारा
प्रदर्शित की जाने वाली
व्यस्तता

अचानक
वाहनों की बढती गति
(कूड़ा उठाने वाले वाहन की भी)
विश्वविद्यालय मे
प्रकाश
स्वच्छता
गति
हर ओर
अतिथिदेवो भव
को चरितार्थ
करती गतिविधियाँ
अधिक उस ओर 
जहाँ से होकर
गुजरना है
अतिथि को
उन्नीसवां दीक्षांत समारोह है
विश्वविद्यालय रुपी
दुल्हन का
कल
वैसे इसकी उम्र
पार कर रही है
अडतीस को 

मैं सोचता हूँ
इस ओर अतिथि
प्रायः क्यों नहीं आते
क्यों नहीं होते
इस प्रकार के समारोह
प्रायः  
यहाँ की सड़कें, जंगल, भवन
साफ़ नहीं दिखते
चूना लगाने वालों के
होते हुए भी
प्रायः
===
(3 pm, NEHU Shillong, 29th Sept 2011 - Tomorrow is NEHU's 19th Convocation.  The vice president of India, Shri M Hamid Ansari is going to deliver convocation address)

Sunday, September 25, 2011

कल्पना का सूरज



Uday Prakash :
Waiting alone for the sun to appear from far beyond the clouds and mountains : Internal Exile in the Doomed Topograhy of the Language

कब निकलेगा 
कल्पना का सूरज
कब बादलों पर 
तीब्र प्रहार कर 
निकलेंगी किरनें 
और भींचती हुई 
ह्रदय को 
विवश कर देंगी
थामने को
कलम 
फिर क्या  
आंखे बोलती जायेंगी
हाथ शब्दों को उतारेंगे 
कल्पनाओं के आकाश से 
संभालकर  
अक्षरों को बांधेंगे
कुम्हार की तरह  
और
फिर तैयार होगी
एक स्मरणीय 
प्रतिमा
स्फुटित होगी
कल्पनाओं की भाषा

मुझे प्रतीक्षा है
कब
सूरज उदय होकर
देगा प्रकाश
निराशा के बादल
छंट जायेंगे
आशा
सूरज
उदय
प्रकाश.
कच्ची अमिया 
कब पकेगी...

(3:40 pm, 25 Sept 2011, Shillong)

Thursday, September 8, 2011

My Intention

I have closed
Windows,
As I fear
Fresh Air.

I have closed
Doors,
As I fear
Honest Visitors.

I have closed
Garden Gate,
As I fear
Blooming Buds
and
Soothing Odour.

You read my intentions,
I Hope and
You Can.

(5:50 pm, L-57, NEHU, Shillong: 4th Sept 2011)

Sunday, September 4, 2011

Struggle

With
Folded hands
Cottoned ears
Tied lips
Blind eyes
They
Struggle.

Power
Praises
Peoples'
Protest.

Rotten Principles
Faded Values
with
Sweet Spices
Are getting cooked
Ready to serve
When requisitioned.

(5 pm, 4th Sept 2011, Shillong, L-57, nehu)

Friday, July 1, 2011

कागज़

मैंने पड़ा था:
कागज़ के फूल
कागज की नाव

मैंने देखे:
कागज के कोण
कागज के रिश्ते
कागज़ के पैसे
कागज़ के बिल
देखा:
कागज का सूखा
कागज़ की बाड़
कागज़ का पानी
कागज़ के पुल

देखी - कागज़ की सजा
देखा - कागज़ का पुरुस्कार
देखे - कागज़ के सपने 
कागज के वार
कागज़ की उड़ान
कागज़ की शान
कागज़ का द्वेष 
कागज़ का प्यार 

आजकल प्रयास कर रहा हूँ
सुनने व समझने की 
कागज़ की भाषा 

शिलांग ::: १ जुलाई २०११ ::: ११ बजे रात्रि ::: 

Saturday, June 25, 2011

शेरुब्त्से में होली

शेरुब्त्से कॉलेज में, होली का त्यौहार
होती भारत मे दिखी, रंगों की बौछार
रंगों की बौछार, कोई है पीला कोई लाल
मुहं में गुजिया दबी है, हाथों मे गुलाल

पहली होली पर दिखा, गुजिया का आभाव
कॉलेज में टीचिंग करो, या फिर गुजिया खाव
या फिर गुजिया खाव, नहीं भारत है प्यारो
जिसको देखो भरो, और पिचकारी मारो

होली पर दुश्मन लगे, मित्रों से भी मित्र
मित्रों के चेहरे लगे, हमें बडे बिचित्र
हमें बडे बिचित्र, गले से हाथ मिलाएं
होली पर तो तनिक, मित्र यों ना शर्मायें

भिन्न रंग तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न प्रदेश
भिन्न भेष तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न हर देश
भिन्न चर्म तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न है मर्म
भिन्न वस्त्र तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न है धर्म
भिन्न-भिन्न है धर्म, मगर है एक धर्म ही शेष
सब धर्मों मे एक है, मानव धर्मं विशेष

भारतियों की संस्कृति, रंगों की झोली
जितना उसमें डालिए, उतनी कम बोली
जाने पर आता हमे, कब आये होली
हमको लगता दोस्तों, होनी थी हो ली...

(27 Sept 1994 - Room No 26, Exam Duty, 11 AM, Sherubtse College, Kanglung, Bhutan)

पंद्रह अगस्त

पंद्रह अगस्त

परतंत्रता के जाल में
असहाय पक्षी के समान
पंखों को थे हम फडफडा
इक बंद पुर्जे की तरह

सोचते थे हम यह कब
टूटेगा जाल पक्षियों का
ओर कब होगा सवेरा
विदेश के इन भक्षियों का

हम यह सोंचे वह समय भी
अब बहुत करीब है
अब तो हम कहते हैं यह
कि देश यह गरीब है

और भी आकांक्षाएं
थीं हमारे मस्तिष्ट में
छोड़ के इस जाल को
हम उड़ चलें अन्तरिक्ष में

वह भी दिन आया जवानो
जब देश यह था बड़ा मस्त
याद होगा आपको भी
दिन था वो पंद्रह अगस्त.

विजय कुमार श्रोत्रिय,
(Subhash Nagar, Bareilly, 1984)

Sunday, May 15, 2011

छोटा-बड़ा

चौड़ी सड़कें 
लम्बे-चौड़े वाहन
अतिरेक उपाधियाँ
ऊँचे पद
पांच अंकीय आय
बड़ा कूड़ादान 
ऊँची मीनारें 
ऊँचे टावर 
ऊँचे भाव
ऊँची चिमनी
ऊँचा धुंआ 

छोटे दिमाग
छोटे रिश्ते
छोटे परिवार
बड़े मकान
छोटे घर.

Tuesday, April 26, 2011

रेलवे स्टेशन पर

ख़रीदा, 
खोला, 
पड़ा,
बिछाया, 
हाथ पोछा, 
रगडा,
मोड़ा, 
गेंद बनाया, 
फेंका.

आंखें खिलीं, 
एक आशा, 
बच्चे झपटे, 
एक ने पाया, 
उठाया,
संजोया, 
खोला, 
चाटा,
उसमे अपना चित्र पाया.

एक रोष,
उसने उसके चिथडे किये, 
जैसे वाक्यों से शब्द,
शब्दों से अक्षर, 
सब अलग हो गए हों.

फिर उसको 
तेज रफ़्तार से,
चलती ट्रेन के सामने 
उड़ा दिया.
ट्रेन कुचल गई,
बढ गई आगे,
अपने गन्तव्य की ओर.

मैं सोचता रहा, 
कैसा आज,
कैसा जागरण, 
कैसा उजाला,
कैसा भास्कर, 
कैसा नव-भारत,
कैसा हिंदुस्तान. 

24 April 2011, Bareilly to Delhi (Intercity Express, 9:40 AM)

Tuesday, April 19, 2011

कभी ना भूख बदले

रंग बदले रूप बदले,
हर कदम स्वरुप बदले
बोझ कन्धों पर लिए 
हर कष्ट हर सपना वही था 
द्रष्टि, अंतर्ध्वनि, दिशा, 
रुकना कभी सीखा नहीं था
रीड़ का सौदा करूँ क्यों
प्रस्तरों का भय नहीं था
अस्मिता कैसी दया क्यों
वीर यदि शमशीर बदले
प्रश्न यह है हित अहित कर
क्यों ह्रदय का पीर बदले
मात्र यह प्रयास हर पल
अब कभी ना भूख बदले
हर कदम स्वरुप बदले
रंग बदले रूप बदले
पर कभी ना भूख बदले

Thursday, April 7, 2011

क्रिकेट विजय

संबंधों का रूप खेल में
कर की शोभा सभी मेल में
उच्च शिखर ज्यों पहुँच गए हम
प्रबल, प्रखर प्रहार सहे हम
उत्तर, प्रश्न सभी संचित थे
एक जीत से ही वंचित थे

श्रम, श्रद्धा, क्षमता संभवतः 
जोश, पराक्रम, विजय अंततः
उत्सव, स्वागत, चर्चा, हर्षा
पुरुस्कार व धन की वर्षा

संचित विजय भाव को रक्खो 
स्नेह, नीति दाव को रक्खो 
दायित्वों का वडा भार है
हार विजय का ही उपहार है...

:::विजय कुमार श्रोत्रिय::: शिलांग ::: 7 April 2011:::
(भारत की क्रिकेट विश्व कप मे जीत को समर्पित, 2 April 2011 को मुंबई के वानखेड़े मैदान पर भारत ने श्रीलंका को विश्व कप फ़ाइनल मे हराया) 

Friday, April 1, 2011

दर्द

उनकी आँखों ने कहा
मेरी आँखों ने सुना
मेरे होठों ने पिया
उनके होठों से गिरा

मेरे हांथों ने सुना
उनके क़दमों ने कहा
उनके गालों पे सजा
मेरे होठों का कहा

एक सन्नाटा सा था
सुबह चिड़िया ने कहा
आँख क्यों दर्द सहे
स्वप्न क्यों दर्द बना.

शिलांग ... १ अप्रैल २०११ ...
       

Tuesday, March 22, 2011

My Pain

Camouflaging the injuries
Going through the severity of pain
Without realising
No one but self 

and only self
Feels its severity
Understands its depth
Knows its reason

Expecting them 
    to understand it
    to know it
Expecting it (nature) 

    to provide strength

Me and my mother are one
Far away
She knows it
She feels it
She understands it
She and me are one self
Self and only the self
Feels the pain
Of camouflaged injuries.

I am bewildered
For my pain 

is hers
and not 

hers mine...

Woodland hospital...shillong...11 15 am...22 March 2011

Thursday, March 17, 2011

होली 2011

होली  का  हो  हुल्लड़
हाथ  में  हो  कुल्ल्हड़
गाल  पे  हो  गुलाल
नीला,  पीला  और  लाल

हम  सब  झूमें
मस्ती  में  नहायें
प्यार  की  भाषा
सब  सुने  और  सुनाएँ 

छोटी  ही  हो  गोली
नयी  सी  हो  होली
नई  नई सम्भावनायं
सभी  को  होली  की  शुभकामनाएं  .....
शिलांग .... 17 मार्च 2011....

Monday, February 7, 2011

Being Kind

Maybe Yesterday had something to unwind
And though you want yet you cant rewind
Today shall be yesterday tomorrow
So do your best, hence no drive to rewind
and move on, move on till it remains in mind
Remember one thing, 

nothing pays more than being KIND
nothing pays more than being KIND.


(posted the above lines to a wall post of Palash (Anu) Shrotryia on Facebook)


He had posted the following lines on 6th Feb 2011:


Maybe redemption has stories to tell
Maybe forgiveness is right where you fell
Where can you run to escape from yourself?
Where you gonna go?

Salvation is here.....I Dare you to Move.

Sunday, January 30, 2011

घर


घर बनाने मे वक़्त लगता है
घर सजाने मे वक़्त नहीं लगता...

विजय कुमार श्रोत्रिय 

Tuesday, January 25, 2011

नया वर्ष आया

आपकी जो वाणी, उसी की तो जय हो
वाणिज्य वाणिज्य, किसी को ना भय हो 
सभी धन कमायें, सभी धन बढाएं
धरा को सभी हम, कोमल बनायें
पुनीत ने सबके कानो मे गुनगुनाया
नया वर्ष आया नया वर्ष आया....

आपको नव वर्ष की शुभकामनायें... इसी प्रकार नई नई रचनाओं से सभी का मन जीतते रहें...

विजय कुमार श्रोत्रिय
(ये पंक्तियाँ मैने पुनीत जी की निम्न पंक्तियों के उत्तर में लिखी थीं, 31.12.2010)

नया वर्ष आया !!!!!

अरे क्या सुना ,क्या किसी ने सुनाया,
हवा ने मेरे कान, कुछ भुनभुनाया,
मयूरा मना जोर से खिलखिलाया ,
नया वर्ष आया, नया वर्ष आया....1

नयी शक्ति जागृत नयी कामना  है
नए मार्ग पर तीव्र संभावना है,
बढ़ो बस यही वक्त की चाहना है,
ये ही कर्म देवी  की आराधना है,
यही तथ्य गतवर्ष ने गुनगुनाया .
नया वर्ष आया नया वर्ष आया..2

पढ़े हर कोई अन् पढ़ा  जन ना छूटे
मिटे अँधियारा किरण ज्ञान फूटे,
सभी कर कलम हों ना रगड़े अंगूठे
महाजन किसानो का हक अब ना खूँटें
नया वर्ष साक्षर बिगुल है बजाया
नया वर्ष आया नया वर्ष आया...3

सभी रोग मिट जाएँ विकसित हों टीकें
नीरोगी सभी जिंदगी ठीक बीते
ना बच्चा कोई और खांसे व छींके
रहे चंग सब पोलियो ड्रॉप पीके.
नए वर्ष ने स्वस्थ भारत दिखाया
नया वर्ष आया नया वर्ष आया...4

नए ऊँचे महलें  नए कुछ भवन हों
नए फैशनो  के नए पैरहन हों.
नए वाहनों के नए से चमन हों,
नए अर्ज धन के व्यवस्थित जतन हों,
नए वर्ष ने कुछ नया ही सिखाया
नया वर्ष आया नया वर्ष आया..5.

अमीरी बढे पर गरीबी बढे मत,
किसी के बदन पर कोई ऋण चढ़े मत,
कोई भी किसी से कभी भी लड़े मत
दहेजी बलि भेंट बेटी चढ़े मत
नए वर्ष का कंठ क्यों रूंध आया
नया वर्ष आया नया वर्ष आया...6

बहे प्रेम गंगा थमी आंधियां  हों
बमों गोलिओं   से बची वादियाँ हों,
रहे मेल भाई ,नरम भाभियाँ हों,
सभी वीर- जराओं  की  शादियाँ हों,
नए वर्ष ने शांति का पथ सुझाया  ,
नया वर्ष आया नया वर्ष आया....7

- पुनीत द्विवेदी "क्रांतिकारी Indore

Saturday, January 22, 2011

तीन रुबाइयां

चश्म आँखों ने सफ़र को देखा
मेरी माँ ने हर कहर को देखा
हर फलसफे से प्यार बढकर है
उनकी आँखों ने इस ज़हर को देखा
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सड़क पर भागते शव को देखा
धुंद मे टिमटिमा पहर देखा
दौडते-भागते कटी हर शब्
रुकते-थकते ये मंज़र देखा
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भावना आँख से छलकती है
प्यास से रोशनी चमकती है
मेरी बेटी के प्रश्न जैसे हों
उनमे अच्छी सुबह सी दिखती है

(21st Jan 2011, 6:30 AM, travelling from Guwahati to Shillong in Taxi)

Thursday, January 6, 2011

भारतीयों की भारतीयता

देखा है
देख रहा हूँ
और
देखूंगा
भारतीयों की भारतीयता
भारत के बाहर.
रूड़ियाँ परम्पराएँ व
सामाजिक मूल्य.
आकाश से साक्षात्कार करते पहाड़
रुड़ियों की भांति
तीब्र गति से बहतीं नदियाँ
घाटियों के मध्य
मूल्यों की भांति
मूल्यों के साथ.

कहाँ से कहाँ
शायद विरोधाभास ही
तय करेगा
विकास की गति.

भूटान
यानी - भूमि पर चट्टान
भारतीयों की आन
और
अभार्तियों की शान.
थिम्पू
राजधानी का रूप
कांग्लुंग
सभ्यता स्वरुप
थिम्पू के लोग
भारतीयों का संयोग
कांग्लुंग कहानी
पानी काला या काला पानी
जब तब बरसात
कहती अपनी बात
सूर्य प्रकाश
दौड़ता आकाश.

कान्ग्लुंग और थिम्पू
किसको बैराग
अपनी-अपनी डपली
अपना-अपना राग
दो समानांतर रेखाएं
अपनी-अपनी व्यथाएं
तुलनात्मक अपवाद
समानताओं की याद
भारतीयों का रूप
बदलता स्वरुप
समय के अनुसार
मूल्यों की हार
आखिर कब तक
चलता रहेगा
आत्मसमर्पण के बाद
आत्महत्या का प्रयास
देखा है, देख रहा हूँ और देखूंगा...

(Banquet Hall, Thimphu: 10:40 AM, 6th April 1996 - during Shercol Indian Teachers' Orientation Programme)