समाज गिर रहा द्वन्द समान
गाता था ह्रदय करुण सा गान
कभी था भरा जोश प्राणों मे
रह गया शून्य समान वोह जोश
कभी थी शांति घने जंगल मे
पहुँच कर वहां उड़ गए होश
कभी बेहोश, कभी मदहोश
थी घोर विडम्बना लाखों के समान
समाज गिर रहा द्वन्द समान
गाता था ह्रदय करुण सा गान
कभी थी कड़ी जहाँ पर कतार
आज वहां है रिश्वतखोरी
कभी थी रचती बारात श्रद्धा अनुसार
बिक रही आज दहेज़ पर गोरी
कहीं पे दहेज़ कहीं परहेज
कर रहे जामाता गुणगान
समाज गिर रहा द्वन्द समान
गाता था ह्रदय करुण सा गान
यही सब विडम्बना का फल
देखना क्या होता है कल...
<विजय कुमार श्रोत्रिय, १९८३>
(पुवायां सन्देश मे प्रकाशित)