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Wednesday, January 23, 2013

सड़क


सड़क पर कांच के टुकड़े पड़े कुछ बात कहते हैं
किसी की दौड़ मंजिल बिघ्न संशय पात कहते हैं
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सभी गंतव्य सीधे हैं अगर हों साथ सच मोती
सड़क पथ द्रष्टि देती है सुझाये युक्ति नवज्योति

सड़क ले जाती है सबको सभी के घर स्वयं चलकर
मगर अपने उसूलों से वो टस से मस नहीं होती

मैं अक्सर देखकर गड्ढा सड़क पर चेत होता हूँ
मगर फिर भी मुसाफिर पर वो इक आंसूं नहीं रोती

जो सिगरट को दबाकर यों सड़क पर पीस देते हैं
वो उनकी वेदना को पढके हंसती है नहीं रोती

हमारी जिंदगी की बड रही रफ़्तार कहती है
सड़क बस सीख देती है कभी भी वो नहीं सोती

उसे गति गीत गाने से नहीं रोको नहीं टोको
कोई प्रतिफल नहीं सोचे न ही हीरे न ही मोती

सड़क ले जाती है सबको सभी के घर स्वयं चलकर

मगर अपने उसूलो से वो टस से मस नहीं होती

Saturday, May 22, 2010

समय की गति

समय,
गतिशील है,
गतिवान है,
अविराम है,
कुछ कुछ
जीवन की तरह,
परन्तु
जीवन गतिशील होते हुए भी
अविराम नहीं है,
जीवन,
मनुष्य का,
जानवर का,
पक्षी का,
पौधे का,
या ब्रक्ष का,
समान नहीं है,
परन्तु
अविराम भी नहीं है,
कभी ना कभी,
कहीं ना कहीं,
अवश्य होगा,
विराम,
समय से बिछुड़ना ही होगा
जीवन को.

समय,
बहुत स्वार्थी है,
नहीं रखता किसी के साथ,
इतनी घनिष्ठता,
जिसको दे सके
अपनी आयु,
जिसके साथ
रह सके
अविराम रूप से,
उसका कोई प्रतिद्वंदी
भी नहीं है,
वह सर्वशक्तिमान है.

समय,
जन्म देता है,
कई लड़ाइयों को,
समय कि गति से भी तीब्र
गति से,
भागने का प्रयास करता है,
मानव,
जिस प्रकार से,
बढती जाती है
जीवन की गति,
समय का महत्व भी,
बढता जाता है,
समय कि गति समान रहती है,
परन्तु
प्रतीत होता है,
कभी तीब्र - कभी मंद,
यही दर्शन है,
समय का.

कौन रोक सकता है,
समय को,
कौन रोक पायेगा,
यदि किया गया,
कोई प्रयास,
इस आशय का,
बस ठीक उसी समय
युद्ध प्रारंभ हो जायेगा,
विराम व अविराम के मध्य,
अविराम, विराम के जीवन पर
प्रश्नचिन्ह लगाएगा,
और,
उसका साक्षात्कार,
उसके समय से कराएगा,
अंततः
विराम,
विराम हो जायेगा,
एक पूर्ण विराम,
गतिहीन,
ठहरा हुआ,
रुका हुआ,
और
अविराम,
हमेशा की तरह,
बढ जायेगा,
आगे,
प्रतीत होगा,
उसकी गति मंद थी,
उसकी गति तीब्र है,
यह सब
मस्तिष्ट का फेर है,
ना कहीं जल्दी है,
ना देर है,
इसको समझ पाना,
ना कठिन है,
ना आसान है,.
समय गतिशील है,
गतिवान है,
जिसकी गति समान है....
(२६ सितम्बर, १९९९, कक्ष स: १९, ४ बजे संध्या, परीक्षा ड्यूटी, शेरुब्त्से कॉलेज, कंग्लुंग, भूटान)

समय का पहिया

समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे,
गति निर्भर करती है,
परिस्थितियों पर,
कई बार
गति प्रदान करने वाले
व्यक्ति पर भी,
परन्तु,
न्यूनतम व अधिकतम,
गति सीमा से परे,
कठिन है जाना.
जैसे लगता है,
रविवार २४ घंटे का नहीं होता,
बल्कि मध्य में या कभी-कभी,
प्रारम्भ में,
याचना करता है
दशमलव के प्रयोग की,
जबकि कई बार कई दिन
२४ घंटे के स्थान पर
४२ घंटे के प्रतीत होते हैं.
क्षण-घंटे-दिन-सप्ताह-माह व वर्ष,
किस प्रकार गुज़र जाते हैं,
ज्ञात होता है,
गुजरने के बाद.
यदि यह अनुभूति,
प्रारंभ में ही हो जाये,
जानिए,
आधी समस्याओं का समाधान.

आयु व समय
एक दूसरे से साक्षात्कार करते हैं
प्रायः
किस समय, कौन किसका
साक्षात्कार कर रहा है,
बता पाना कठिन है,
यदि कोई इसको समझ सके,
या स्पष्ट रूप से जान सके,
जानिये
आधी समस्याओं का समाधान...

स्वयं की आयु का ज्ञान कब होता है?
जब स्वयं द्वारा पानी दिए पेड़ की
टहनियां लहलाहतीं हैं,
फलों का लालच देकर
पास बुलाती हैं,
तब.

एक शिक्षक द्वारा पडाया गया छात्र
आसीन होता है उसके बराबर के
पद पर
तब.

मोहल्ले में पडोसी का बेटा
जो खेलता था कंचे
आँखों सामने,
अब व्यापार में पिता का
हाथ बटाता प्रतीत होता है
तब.

एक नौजवान दिखने वाले
अभिनेता का पुत्र
उसी अभिनेत्री के साथ
अभिनेता के रूप मे प्रदर्शित होता है
जिसके साथ कभी,
उसके पिता प्रदर्शित होते थे
तब.

इमारतों की मंजिलें
बढती दिखतीं हैं
तब.

सड़क की चौडाई
बढती दिखती है
तब.

रामलाल की बेटी गुडिया
जिसे कभी गोदी में खिलाता था
पुत्रवती होती है
तब.

या फिर तब
जब
माता पिता मे खिलखली
का सिलसिला
कम होता दिखाई देता है.

तब - जब
सुई में धागा डालने के लिए
माँ को चश्मे की

आवश्यकता होती है.

तब - जब
पिता को
चाय में चीनी
व सब्जी में नमक
अधिक लगता है.

तब - जब
डाक्टर अंकल से मेल अधिक
दिखता है
परिवार का.

तब - जब
स्वयं की गतिविधियाँ
दोहराई जाती हैं
स्वयं के बच्चों के द्वारा
स्वयं के शिष्यों के द्वारा.

सचमुच
समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे
जो इस गति सीमा को
ठीक ठीक पड़ ले
जानिए
अधिकतर समस्याओं का समाधान...

(२६ सितम्बर, १९९४, शेरुब्त्से कॉलेज, कान्ग्लुंग, त्राशीगांग, भूटान, exam duty: room no 15 - 9:15 to 10 AM)