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Friday, February 14, 2014

आस


सो गयी संसद भुलाकर 
कृत्य काली रात के 
जग गई है आस जन मे 
जन्म नव जज्वात के 
बर्ष बीता रात भागी 
धुंध छटकर बात जागी 
सोच सकता हूँ मैं इतना 
शह दिखाकर मात के

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Thursday, November 28, 2013

सोच सकता हूँ

मैं सुनाता आ रहा हूँ 
गीत कविता
सुन जिसे क्यों सो गया है
कुल जहाँ संकुल यहाँ 
क्यों आँख खोले सो गया है
सत्य आशय झूठ संशय
एक आशा एक भाषा
सोच सकता हूँ मैं इतना
तन बदन अब रो गया है
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Friday, April 5, 2013

मुस्कराना


71

मुस्कराना बहुत ज़रूरी है 
वरना सब कुछ उदास ही तो है
दूर खुद से कभी न जाओ तुम 
ज़िंदगी नाम आस ही तो है
वक्त रहता कहाँ है हरदम एक 
उठ के गिरना है गिरके उठना है
सोचता हूँ मैं बस इतना अब 
नदी के नाम प्यास भी तो है 
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4 april 2013/ 8 30 am

(शैली अग्रवाल की फ़ेस बूक प्रविष्टि 
'तनहा... खुद से दूर.. सोच के मुस्कुरा देती हूँ..
कि अब उदासी का साथ सही.. 
उम्र भर तो रहेगा..!!' 
के उत्तर मे)
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Thursday, March 14, 2013

आस



66

ओस की बूँदें कहानी लिख रही हैं प्यास पर
ज्यों नहाकर धूप की किरने बुलाएँ घास पर
आँख की बारिश ह्रदय को शुष्क करती जा रही है
सोच सकता हूँ मैं इतना चल रहा हूँ आस पर

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Thursday, February 14, 2013

मैं इतना सोच सकता हूँ - 13

61

मैं सुनना चाहता हूँ गीत मंगल और सुमंगल के
है जीवित हो चुकी आशा बृहद विस्तार जंगल के
मेरे विश्वास में कोई कमी होगी तो क्यों होगी
मैं इतना सोच सकता हूँ सधे संवाद जंगल के

62

मैं पड़ना चाहता हूँ पुस्तकें स्नेह वंदन की
सरल हो व्याकरण उपयोग तम गंध चंदन की
मगर क्यों द्वेष भरती पुस्तकें बाज़ार होती हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ लगी क्यों आस बस धन की

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Friday, December 21, 2012

चूना लगना जारी है – नेहू में बीसवां दीक्षांत समारोह २०१२

है दीक्षांत समीप आ रहा परिसर हुआ भिखारी है
काला कौआ बोल उड़ा चूना लगने की बारी है

खरपतवार बढ़े खंबे से खुश होता अधिकारी है
खिली-खिली आँखें हैं उसकी अब चांदी ही चांदी है
काला कौआ बोल उड़ा चूना लगने की बारी है

सड़क झेलती वजन शून्य का पाकेट कितनी भारी है
बोतल रैपर सिगरेट माचिस बीस लाख की गाड़ी है
काला कौआ बोल उड़ा चूना लगने की बारी है

बालू मिट्टी गिट्टी ठेका लेन-देन की बारी है
मजबूरी मजदूरी करती कामकाज सरकारी है
काला कौआ बोल उड़ा चूना लगने की बारी है

दूना खर्चा कभी न चर्चा मोलभाव बीमारी है
नेता क्रेता बोल चुके हैं सीएजी बीमारी है
काला कौआ बोल उड़ा चूना लगना तो जारी है

जल आकाश हवा ने भी तो कर ली इनसे यारी है
बड़ी-बड़ी मोटी फाइल में लीपा-पोती जारी है
काला कौआ बोल उड़ा चूना लगना तो जारी है

मैना गौरैया बुलबुल चुप ये इनकी लाचारी है
सीधा साफ़ सरल सम्प्रेषण खतरा कितना भारी है
सबकी बांछे खिली हुई हैं कुछ कहना मक्कारी है

सबका नेहू सबकी रोटी इसकी लाज हमारी है
हरी घास है हरी पत्तियाँ इक ही अर्ज़ हमारी है
पिले रहेंगे खिले रहेंगे चुप रहना बीमारी है

काला कौआ बोल उड़ा चूना लगना तो जारी है
सबकी बांछे खिली हुई हैं कुछ कहना मक्कारी है
है दीक्षांत समीप आ रहा परिसर हुआ भिखारी है

Wednesday, April 14, 2010

मेरे सपने

मेरे सपने अपने थे, जब हम केवल अपने थे
आज मुझे मालूम हो गया, सपने कितने अपने थे

कितने भी दुःख, कष्ट, सजाएँ, हंस के सब कुछ सह लेंगें हम
जीवन की हर धुंध ओड़कर, अन्धकार मे रह लेंगें हम
नहीं झुकेंगे कभी कहीं हम, ऐसे देखे सपने थे
सपने केवल अपने थे, जब हम केवल अपने थे

हर मुश्किल अच्छी लगती थी, जैसे कोई नया सवेरा
नई किरण की नई रौशनी, नया नया सपना था मेरा
नहीं कभी समझौता खुद से, ऐसे देखे सपने थे
सपने कितने अपने थे, जब हम केवल अपने थे

कोई शूल चुभा जैसे हो, आशाओं का धुंधला पड़ना
कब तक पतझड़ को देखे हम, ऋतुओं से कब तक हो लड़ना
रिश्तो मे इतनी दूरी क्यों, क्यों ये सपने अपने थे
सपने कितने अपने थे, जब हम केवल अपने थे

मेरे सपने अपने थे, सपने कितने अपने थे.

२८ जुलाई १९९९: ५:३० संध्या : कान्ग्लुंग : भूटान