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Thursday, December 14, 2017

Death


Freedom as choice
Silence as voice
Ecstasy of life
Essence of existence

Pleasure of pain
Bereft of sorrows

Desire for mukti
Driven for moksha
End of suffering
The ultimate Truth

Enjoy it, 
My name is Death.

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Click for Love
 Click for Life
Click for Time

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Thursday, November 28, 2013

सोच सकता हूँ

मैं सुनाता आ रहा हूँ 
गीत कविता
सुन जिसे क्यों सो गया है
कुल जहाँ संकुल यहाँ 
क्यों आँख खोले सो गया है
सत्य आशय झूठ संशय
एक आशा एक भाषा
सोच सकता हूँ मैं इतना
तन बदन अब रो गया है
=======


Friday, November 8, 2013

भ्रम - द्रष्टिभ्रम

जैसा दीखता है
वैसा होता नहीं है
व्यक्ति 
व्यवस्था
व्यथा

वो जैसे दीखते हैं
उनको पता है
वैसे नहीं हैं वे

जैसे भी हैं वे
वैसे दीखते नहीं है

कई बार
रुके हुए
चलते दीखते हैं
कई बार
चलते हुए
रुके हुए
दिखाई देते हैं

व्यवस्था अच्छी दीखती है
अच्छी न होते हुए भी
या फिर व्यवस्था
अच्छी नहीं दीखती है
क्योंकि
हमारे पूर्वाग्रह
हमें वह दिखाते हैं
जो हम देखना चाहते हैं

स्वस्थ दीखने वाला व्यक्ति
आंतरिक रूप से
कितना अस्वस्थ होता है
नहीं दीखता है हमें

एक प्रश्न
क्या
व्यक्ति
व्यवस्था, व
व्यथा
हमको ख़राब
या
अच्छी दीखता
या दीखती है
क्योंकि हम उसको
वैसा देखते हैं
जैसा देखना चाहते हैं

हमारा चाहना ही तो
हमारा चश्मा होता है
जिसे हम प्रायः
अपनी सुविधानुसार
पहनते
या बदलते हैं
यह कोई दृष्टिभ्रम नहीं होता. 

Friday, October 12, 2012

धूप

अच्छी लगती है धूप
बरसात के बाद
रात के बाद
गर्मी के लिए
रौशनी के लिए
अच्छी लगती है धूप

धूप  का महत्व
बरसात जताती है
रौशनी का महत्व
रात जताती है
ठीक उसी तरह
जैसे
सत्य का महत्व
असत्य
अच्छाई का
बुराई
रात का
दिन
आदि-इत्यादि

सब महत्वपूर्ण है
अच्छाई-बुराई
सत्य-असत्य
रात-दिन
जाड़ा-गर्मी-बरसात

इसीलिए
अच्छी लगती है धूप
गर्मी व पसीने से परे
बरसात के बाद
रात के बाद

धूप, छाया  व रोशनी
बरसात व अँधेरा
रात और दिन।

10.10.10 - Shillong

Saturday, April 28, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 2

मैं इतना सोच सकता हूँ ... १ से ६ तक पडें यहाँ क्लिक करें

७.
मुझे जब भूख लगती है, मेरी पत्नी बताती है
मगर इस भाव से मुझको, न जाने क्यों सताती है
तेरी पूजा, मेरा जीवन, मेरी पूजा, तेरा जीवन
मैं इतना सोच सकता हूँ, मेरा जीवन सजाती है.
८.
मैं क्यों घर से निकलता हूँ, वो क्यों घर मे पसरते हैं
मगर जब संघ सच्चा हो, सभी सपने संवरते हैं
मेरी आशा, मेरा आग्रह, तेरी सीमा, तेरा वादा
मैं इतना सोच सकता हूँ, गरज बादल बरसते हैं.
९.
मैं जब कविता सुनाता हूँ, वो अक्सर टाल जाती है
मगर मेरी यही दुनिया, वो इसको मान जाती है
मेरी कविता, मेरा जीवन, तेरा जीवन मेरी कविता
मैं इतना सोच सकता हूँ, वो कवितायेँ पकाती है.
१०.
मैं पत्थर जोड़ लेता हूँ, वो मट्टी को बनाते हैं
मगर मट्टी बिना पत्थर, बिना पानी सजाते हैं
तेरे पत्थर, मेरी मट्टी, मेरा पानी, तेरे करतब
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं आकार पाते हैं.
११.
मैं इंग्लिश मे पढाता  हूँ, न हिंदी भूल जाता हूँ
मगर फिर भी कहीं खुद मे, मैं उसका मूल पाता हूँ
मेरी भाषा, मेरी बोली, मेरा शिक्षण, मेरी टोली
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं मां भूल पाता हूँ.

Monday, May 17, 2010

साहस

मुझको मालूम है
तुम्हारी आदत,
मैं जानता हूँ,
या
समझ सकता हूँ,
कब, कहाँ, क्यों, क्या होगा,
कौन करेगा,
परन्तु,
मौन हूँ,
क्यों,

पता नहीं.

मैं कुछ नहीं जानता,
उन्हें इन्तजार नहीं है,
सुबह का,
उन्हें प्यास है,
पानी की नहीं,
किसी और की.

वर्तमान में,
सच यह है,
कि
मैं कुछ नहीं जानता,
मुझे मालूम भी नहीं है
कुछ,
क्योंकि सत्य,
सत्य है,
एक कटु सत्य,
जिसे स्वीकारना
परे है,
स्वयं सत्य से,
सब जानते हैं,
सभी को मालूम भी है,
सत्य क्या है,
परन्तु,
साहस सब मे नहीं है,
है  - परन्तु कुछ में.


सत्य,
पीछे है,
काले शीशे कि उस दीवार के,
जिसमे,
इधर से उधर का,
देखा जा सकता है,
उधर रौशनी होने पर,
इधर रौशनी होने पर,
देखा जा सकता है,
उधर से इधर का.

निष्कर्ष,
सत्य को चाहिए,
अभिव्यक्ति,
और
अभिव्यक्ति को चाहिए,
रौशनी - प्रकाश,
और उस हेतु चाहिए,
साहस
जिसकी तलाश है...

(३१ अगस्त १९९१, १०:३५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)

परिवर्तन 1

द्वेष, घ्रणा, छल, कपट, असत्य, फरेब,
आदि, इत्यादि,
शब्दों ने
किया है बसेरा मेरे शहर मे,
भाषा में,
चालढाल में,
रंग-ढंग में,
कारण, पता नहीं,
शायद,
वे अधिक फलते फूलते हैं,
शायद,
उन्हें दर्शन होते हैं
परमपिता परमेश्वर के,
शायद,
वे अधिक सम्रद्धवान होते हैं,
शायद,
उन्हे अधिक आदर मिलता है,
समाज से,
राष्ट्र से,
या फिर
उनकी पूँछ होती है,
उनकी पहुँच होती है,
परन्तु
यह निश्चित है कि
वो चोर हैं,
समान के नहीं,
सम्मान के,
हथियार के नहीं,
सत्कार के,
धन के नहीं,
मन के,
मकान के नहीं,
श्य्म्शान के,
यह ऐसी चोरी है,
जिसकी रपट
थानेदार नहीं लिखता,
इसको
प्रकाशित भी नहीं किया जा सकता,
कुछ लोग इसको
वकवास कहते हैं.
इसकी जांच पड़ताल
नहीं की जा सकती,
जासूसों द्वारा
क्योंकि
वे स्वयं जासूस हैं,
कंफुउस हैं,
मनहूस हैं,
डिफुउस हैं,
रिफुउस हैं,
समाज से, परिवार से,
जहां से,
जहाँ वो शरणार्थी हैं.

इसकी रपट लिखी
जा रही है,
इसकी जांच-पड़ताल
भी चल रही है,
उससे संभंधित कार्य
प्रगति पर है,
उनका भविष्य
अंधकार मे नहीं है,
उनके अनुसार,
वो जानता है
उसका परिणाम,
उसकी पीड़ियाँ
भुगतेंगी,
पश्चाताप,
उनकी पीड़ियाँ करेंगी,
उसको डर नहीं है,
बद्दुआओं का,
पीडाओं का,
पीड़ियों की.

परन्तु मैं सोचता हूँ,
क्यों ना अपना शहर बदल लूं,
या फिर
खत्म कर दूं,
इन सबको.
शायद बेहतर
यही होगा,
क्योंकि
यदि मैने शहर बदला,
तो उस शहर मे केवल
उन्ही की आवादी होगी,
परिवार नियोजन से
मुक्त होंगे
वे परिवार,
घर से शहर,
शहर से प्रदेश,
प्रदेश से देश,
देश से परदेश.

अब इन शब्दों का बसेरा
कहीं नहीं होगा
यदि
हम, आप और सब जागें,
देर है
अंधेर नहीं
परिवर्तन होगा
अवश्य
शब्दों में
प्रेम से
सत्य से......

(३० अगस्त, १९९१, ११:१५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश - उत्तराखंड)

पश्चाताप

मेरी चौखट पर
किसी नामर्द की आहट,
मस्तिष्ट विचारता है,
समस्त भूत की पुस्तकें;
कुछ जानी पहचानी सी प्रतीत होती है,
यह दस्तक;
शायद -
पुनः मेरे स्पर्श की कल्पना
उन्हे हो,
परन्तु, बल्कि...
अब मात्र
निष्प्राण, मानव समान
किसी भाषा के प्रयोग
को दर्शाते हैं;
अरे वो .......?
नहीं हों सकता,
मुझे विश्वास नहीं है,
और
हों भी क्यों;
आखिर..........!
खैर...

परिवर्तन,
वक़्त की,
समय की मांग है,
परन्तु -
पुनः स्वयं के प्रयोग को
बाध्य करता है,
शायद
वो भी बिवश है,
किसी को क्या मालूम
सत्य क्या है...
संभवतः
मै भी नहीं जानता,
शायद वह भी नहीं,
फिर भी
कुछ है अवश्य,
यदि नहीं
तो यह आहट
आखिर
जानी, पहचानी
क्यों लगती है,
यदि सत्य,
वास्तव मे सत्य है,
तो करना ही पड़ेगा
पश्चाताप,
मात्र आहट को नहीं,
स्वयं मुझे भी
संतोष
किसे और क्यों...

(२९ अगस्त १९९१, १०:३५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश (उत्तराखंड))