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Friday, June 6, 2014

आभास

कबूतरों और बन्दरों
गोर्रैयों और गिलहरियों
चूहों और छछुन्दरों
के जहाँ थे आवास
वहां मानव से दीखते
जानवरों ने
किया है अतिक्रमण
बना लिए हैं
सुन्दर से दिखने वाले
अपने आवास

घुस गए हैं उनके
घरों में
घोसलों में
बिलों में
अपने शक्ति व
धन बल से
ज्ञान बल की अनुपस्थिति में
या
होते हुए भी
उसका प्रयोग किये बिना

मानव
करने लगा है व्यवहार
इन सभी पक्षियों
व जानवरों की तरह

अब देखना है
कब पक्षी व जानवर
करेंगे
मानव सा व्यवहार
और
अपने शक्ति व ज्ञान बल से
कर देंगे बेदखल
इन मानव से दीखते
जानवरों को
अपने आवासों से

मेरा आभास

मेरा आवास

Thursday, December 13, 2012

जंगल में मनुष्य

देखे
कुछ मनुष्य
जानवरों के शहर में

मदमस्त हाथी
भौंकते कुत्ते  
दहाड़ते शेर
गुर्राते भालू

गर्भवती बकरी
रंग बदलते गिरगिट
रंभाती गाय
हिनहिनाते घोड़े
मिमियाती बिल्लियाँ

टरटराते मेंढक
रेंगते कछुए
फुफकारते सांप

भिनभिनाती मधुमक्खियाँ
कावं-कावं करते कौए
गुटरगूं करते कबूतर
चिंचिहाती चिड़ियाँ

'जब आती है मौत
गीदड़ की
तो भागता है
शहर की ओर'

निहारते गीदड़
भीगी बिल्ली
खूनी शेर
एक सन्नाटा
शांति का शोर

देखे
कुछ मनुष्य
जानवरों के शहर में
इस गाँव के मध्य
मेघों के घर में
या
इस शहरनुमा गावं में

जंगल में
क्यों घुस आयें हैं
कुछ मनुष्य
जानवरों के भेष में।


(18 Oct  2011 सुबह, जब मैं व मेरी पत्नी  टहल रहे थे, विश्वविद्यालय के एक  वरिष्ठ अध्यापक ने मुझसे हंसते हुए पूंछा 'आपने किसी मनुष्य को देखा टहलते हुए', उनका  इशारा उनके अन्य साथियों से था जिन्हें वो खोज रहे थे।  उनका यह वाक्य इस कविता का प्रेरणा-स्रोत बना। धन्यवाद प्रोफेसर शुक्ला)