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Tuesday, October 3, 2017
Sunday, March 2, 2014
वक़्त
आज जाता है कल कहाता है
चाँद सूरज पे मुस्कराता है
रात-दिन आज-कल नहीं होते
वक़्त आता है वक़्त जाता है
चाँद सूरज पे मुस्कराता है
रात-दिन आज-कल नहीं होते
वक़्त आता है वक़्त जाता है
Saturday, January 18, 2014
समय
नमक तेल मसाले
डीज़ल पेट्रोल गैस
आलू प्याज़ टमाटर
लकड़ी कोयला कपड़ा
सभी हो रहे हैं महंगे
और
सस्ते हो रहे हैं
सम्बन्ध
व
डीज़ल पेट्रोल गैस
आलू प्याज़ टमाटर
लकड़ी कोयला कपड़ा
सभी हो रहे हैं महंगे
और
सस्ते हो रहे हैं
सम्बन्ध
व
मौत के कारण
सस्ती हो गयी है
मौत
------------------
Thursday, August 8, 2013
समय
79
समय से हो गया परिचय
समय आँखें लगाए था
समय आँखें लगाए था
मेरी आँखें हुईं थीं नम
तेरा सपना सताये था
नहीं कोई मेरा अपना
नहीं कोई मेरा सपना
बस इतना सोचता था
तेरा सपना सताये था
नहीं कोई मेरा अपना
नहीं कोई मेरा सपना
बस इतना सोचता था
क्यों मुझे अपना बताए था
=================
76 - अलंकार
75 - कारक
74 - मोती
73 - क्यों
72 - रिश्ते 2
71 - मुस्कराना
70 - सवेरा
68, 69 - होली 2013
67 - रिश्ते
66 - आस
65 - गन्तव्य
64 - मैं इतना सोच सकता हूँ 15
63 - मैं इतना सोच सकता हूँ 14
61, 62 - मैं इतना सोच सकता हूँ 13
60 - मैं इतना सोच सकता हूँ 12
57 से 59 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 11
54 से 56 तक - माँ तुझे सलाम
51 से 53 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 10
48 से 50 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 9
47 - राजनीति
44 से 46 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 8
38 से 43 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 7
28 से 37 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 6
25 से 27 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 5
24 - नींद
23 - विविधता
20 से 22 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 4
19 - विवाह
18 - संतुष्टि
17 - आवाज
12 से 16 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 3
7 से 11 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 2
1 से 6 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 1
75 - कारक
74 - मोती
73 - क्यों
72 - रिश्ते 2
71 - मुस्कराना
70 - सवेरा
68, 69 - होली 2013
67 - रिश्ते
66 - आस
65 - गन्तव्य
64 - मैं इतना सोच सकता हूँ 15
63 - मैं इतना सोच सकता हूँ 14
61, 62 - मैं इतना सोच सकता हूँ 13
60 - मैं इतना सोच सकता हूँ 12
57 से 59 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 11
54 से 56 तक - माँ तुझे सलाम
51 से 53 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 10
48 से 50 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 9
47 - राजनीति
44 से 46 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 8
38 से 43 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 7
28 से 37 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 6
25 से 27 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 5
24 - नींद
23 - विविधता
20 से 22 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 4
19 - विवाह
18 - संतुष्टि
17 - आवाज
12 से 16 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 3
7 से 11 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 2
1 से 6 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 1
Wednesday, December 7, 2011
सांस और मैं
1.
आज मैं सांस ले सका हूँ दोस्त
जिंदगी सांस मे नहीं होती
सांस लेकर नहीं मैं जिन्दा हूँ
काश ये सांस ही नहीं होती.
(1st Dec 2011, 6 pm, shillong - L 57)
2.
मुझको सांसें गिना रही थी वो
जो घडी देख कर गुजरती थी
मेरा सारा गणित अधूरा था
जिन्दगी सांस ही से चलती थी.
3.
सांस चलती है तो सताती है
सांस रूकती है तो सताती है
सांस आवागमन का माध्यम है
जिंदगी को बहुत बताती है.
4.
सांस को छोड़ कर चलूँगा मैं
जहाँ तक दोस्त लेके जायेंगे
मेरा विश्वास मेरे अपने हैं
सभी सम्बन्ध हम निभाएंगे
5.
सांस का टूटना अपेक्षित है
मगर हर सांस को जिऊंगा मैं
मुझे झुकने में दर्द क्यों होगा
अगर संभव जहर पिऊंगा मैं
6.
कष्ट साँसों से अब नहीं होता
सांस का साथ मैं निभाऊंगा
जब कभी सांस साथ छोड़ेगी
मैं उसके साथ मुस्कराऊंगा
7.
सांस की उम्र ढल रही है अब
मेरे चलने पे मुस्कराती है
मैं चल रहा हूँ यार रुकरुक कर
मेरे कदमो पे सर झुकाती है
8.
सांस लगता है प्यार करती है
मैं लिख रहा हूं सांस चलती है
मैं भरी भीड़ मे अकेला हूँ
मगर ये साथ साथ चलती है
9.
चलो अब सांस को यहीं छोडें
उसको अविराम काम करने दें
मेरे सपनों को नींद आती है
स्वप्न साँसों को बात करने दें
10.
साँस लडती है साथ मत छोड़ो
तुम लिखो मैं तुम्हारी संज्ञा हूँ
तुम जियो मैं तुम्हे संवारूंगी
मैं विशेषण सधी प्रतिज्ञा हूँ
11.
तुम्हारा सूक्ष्मतम रहे जीवित
तुम्हारी कल्पना को पर दूँगी
तुम्हारे शब्द कर्ण कोमल हों
तुम्हे हर पल नवीन ज्वर दूँगी
12.
तुम मुझे छोड़ कभी सकते नहीं
मैं तुम्हे लड़ के जीत लुंगी विजय
न मेरी जीत है न तेरी हार
मैं तेरे साथ ही रहूंगी विजय
(11 pm New delhi Railway Stn, platform 9,
waiting for AC Express to Lucknow, 3 dec 2011)
13.
सांस मुझको सुला रही है अब
मेरे माथे को थपथपाती है
मुझे अब अंधकार भाता है
मेरी माँ मुझको याद आती है
14.
चाहता हूँ कि सांस को ओडून
मगर तकिये को वो सजाती है
मेरी चादर से पैर लम्बे हैं
पैर फैलें न वो जताती है
15.
उसका दर्शन बड़ा निराला है
मेरे अस्तित्व को बताता है
मेरे दर्शन को प्रश्न करता है
सभी उत्तर स्वयं सजाता है
15.
उसका दर्शन बड़ा निराला है
मेरे अस्तित्व को बताता है
मेरे दर्शन को प्रश्न करता है
सभी उत्तर स्वयं सजाता है
(12 midnight, in Train, 3 dec 2011)
16.
आँख है बंद सांस चलती है
उसके करतब सभी सताते हैं
सोच लूँ फिर भी भूल सकता नहीं
उसके सपने मुझे जगाते हैं
17.
उसका स्पर्ष याद आता है
उसका रंग-रूप भी लुभाता है
वो मेरे साथ है जागि हुई
बंद आँखों को चमचमाता है
18.
मेरा परिचय हुआ है अब जाकर
उसका वंदन ह्रदय से करता हूँ
मेरा जीवन उसे समर्पित है
उसके जीवन से प्यार करता हूँ
19.
मेरे सम्पर्क-सूत्र साझे है
उसके होने से ही मै होता हूँ
मेरे होने से ही वो होती है
अपनी माला को मैं पिरोता हूँ
20.
मेरी कविता उसी के वर्णन से
कम से कम कुछ तो उसको पाया जान
उसका कृतज्ञ हूँ रहूँगा सदा
मेरा हर रोम उसका अंतर्ज्ञान
21.
अंत करता हूँ मांगता हूँ क्षमा
बहुत कुछ कह दिया अधिकारों से'
फिर मिलूँगा किसी बहाने से
विजय होगी इन्ही विचारों से.
(5:30 pm, Lucknow Delhi Shatabdi,
4 dec 2011)
Friday, December 2, 2011
सांस
2.
मुझको सांसें गिना रही थी वो
जो घडी देख कर गुजरती थी
मेरा सारा गणित अधूरा था
जिन्दगी सांस ही से चलती थी.
3.
सांस चलती है तो सताती है
सांस रूकती है तो सताती है
सांस आवागमन का माध्यम है
जिंदगी को बहुत बताती है.
2nd Dec 2012, 8 PM, Shillong
Thursday, December 1, 2011
सांस
1.
आज मैं सांस ले सका हूँ दोस्त
जिंदगी सांस मे नहीं होती
सांस लेकर नहीं मैं जिन्दा हूँ
काश ये सांस ही नहीं होती.
1st Dec 2011, 6 pm, shillong - L 57...
आज मैं सांस ले सका हूँ दोस्त
जिंदगी सांस मे नहीं होती
सांस लेकर नहीं मैं जिन्दा हूँ
काश ये सांस ही नहीं होती.
1st Dec 2011, 6 pm, shillong - L 57...
Friday, December 3, 2010
स्वार्थ
स्वार्थ
कठिन है
समझ पाना अर्थ
परिस्थिति, समय व व्यक्ति
पर निर्भर है
इसकी परिभाषा
इसका अर्थ
स्वयं के अर्थ हेतु किया गया कृत्य
स्वयं
प्रत्येक परिधि पर लागू है
व्यक्ति पर
क्षेत्र विशेष पर
समूह विशेष पर
देश विशेष पर
आदि, इत्त्यादि.
स्वार्थी
कोई व्यक्ति, क्षेत्र, समूह, या देश
अधिकतर
प्रयोग इस शब्द का होता है संकुचित
व्यक्ति विशेष के सन्दर्भ में
द्रष्टिकोण भिन्नता दर्शाता है
दर्शाता है
शब्द के भिन्न प्रयोग.
मानवता
क्या स्वयं की परिधि से परे है?
यदि नहीं
तो स्वार्थ प्रत्येक जगह है
किसी ना किसी रूप में
छावं में या धूप मे
स्वार्थी
प्रत्येक जगह हैं
हाथ में या पावं में
धूप मे या छावं में
प्रदेश मे या देश में
किसी ना किसी भेष में
देश में या परदेश में
मेल में या क्लेश में
गर्मी में, बरसात में
दिन में या रात में
बसंत में या जाडे में
मुफ्त में या भाडे में
घर में या वाहर
लेखक या शायर
साहसी या कायर
सच्चा या लायर
स्वार्थ
प्रत्येक जगह है
किसी ना किसी रूप में
छावं में या धूप में...
(Sherubtse College, Kanglung - Bhutan, Exam duty Room No B New building, 23rd Nov 1994, 10:40 AM)
कठिन है
समझ पाना अर्थ
परिस्थिति, समय व व्यक्ति
पर निर्भर है
इसकी परिभाषा
इसका अर्थ
स्वयं के अर्थ हेतु किया गया कृत्य
स्वयं
प्रत्येक परिधि पर लागू है
व्यक्ति पर
क्षेत्र विशेष पर
समूह विशेष पर
देश विशेष पर
आदि, इत्त्यादि.
स्वार्थी
कोई व्यक्ति, क्षेत्र, समूह, या देश
अधिकतर
प्रयोग इस शब्द का होता है संकुचित
व्यक्ति विशेष के सन्दर्भ में
द्रष्टिकोण भिन्नता दर्शाता है
दर्शाता है
शब्द के भिन्न प्रयोग.
मानवता
क्या स्वयं की परिधि से परे है?
यदि नहीं
तो स्वार्थ प्रत्येक जगह है
किसी ना किसी रूप में
छावं में या धूप मे
स्वार्थी
प्रत्येक जगह हैं
हाथ में या पावं में
धूप मे या छावं में
प्रदेश मे या देश में
किसी ना किसी भेष में
देश में या परदेश में
मेल में या क्लेश में
गर्मी में, बरसात में
दिन में या रात में
बसंत में या जाडे में
मुफ्त में या भाडे में
घर में या वाहर
लेखक या शायर
साहसी या कायर
सच्चा या लायर
स्वार्थ
प्रत्येक जगह है
किसी ना किसी रूप में
छावं में या धूप में...
(Sherubtse College, Kanglung - Bhutan, Exam duty Room No B New building, 23rd Nov 1994, 10:40 AM)
Friday, November 12, 2010
साहस, परिस्थितियाँ व मजबूरी
जो महसूस करता हूँ
कह नहीं सकता
लिख सकता हूँ
जो महसूस करता हूँ
अप्रत्यक्ष रूप से
कह भी सकता हूँ.
प्रत्यक्ष
लिख सकता हूँ.
अभाव
साहस का
नहीं
अनुकूल परिस्थितियों का.
कोई दीवार खड़ी है
प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष के मध्य
साहस व परिस्थितियों के मध्य
कहना - किसको
निर्भर करता है
परिस्थितियों पर.
किसी से कह नहीं सकता
किसी से भी नहीं
विश्वास के कारण
लिखा किसी को दिखा नहीं सकता
किसी को भी नहीं
विश्वास के कारण
लिखता हूँ किसके लिए फिर
स्वयं को अनुभव दिलाने के लिए!
शायद इसलिए कि
साहस और परिस्थितियों से
समझौता प्रदर्शित कर सके
जो कुछ मैं लिखूं.
या फिर
जब साहस हो तब
दिखा सकूं
पड़ा सकूं
प्रकाशित करा सकूं.
वास्तव में
सबकुछ
परिस्थितियों पर निर्भर है
समय पर भी
स्वयं पर भी
कोई एक अकेला इसके लिए उत्तरदायी नहीं है
आखिर इसीलिये
सोचना पड़ता है,
बोलने से पहले
कहने से पहले
कुछ भी
और लिखने से पहले
कुछ भी
अंततः:
सबकुछ ना कह सकता हूँ,
सबसे
न लिख सकता हूँ
सबके लिए
प्रयास कर सकता हूँ
अवश्य
साहस, परिस्थितियाँ व मजबूरी...
(Quarter No 33, Sherubtse, Kanglung, Bhutan: 2.11.1994..4 PM.. tomorrow is diwali)
कह नहीं सकता
लिख सकता हूँ
जो महसूस करता हूँ
अप्रत्यक्ष रूप से
कह भी सकता हूँ.
प्रत्यक्ष
लिख सकता हूँ.
अभाव
साहस का
नहीं
अनुकूल परिस्थितियों का.
कोई दीवार खड़ी है
प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष के मध्य
साहस व परिस्थितियों के मध्य
कहना - किसको
निर्भर करता है
परिस्थितियों पर.
किसी से कह नहीं सकता
किसी से भी नहीं
विश्वास के कारण
लिखा किसी को दिखा नहीं सकता
किसी को भी नहीं
विश्वास के कारण
लिखता हूँ किसके लिए फिर
स्वयं को अनुभव दिलाने के लिए!
शायद इसलिए कि
साहस और परिस्थितियों से
समझौता प्रदर्शित कर सके
जो कुछ मैं लिखूं.
या फिर
जब साहस हो तब
दिखा सकूं
पड़ा सकूं
प्रकाशित करा सकूं.
वास्तव में
सबकुछ
परिस्थितियों पर निर्भर है
समय पर भी
स्वयं पर भी
कोई एक अकेला इसके लिए उत्तरदायी नहीं है
आखिर इसीलिये
सोचना पड़ता है,
बोलने से पहले
कहने से पहले
कुछ भी
और लिखने से पहले
कुछ भी
अंततः:
सबकुछ ना कह सकता हूँ,
सबसे
न लिख सकता हूँ
सबके लिए
प्रयास कर सकता हूँ
अवश्य
साहस, परिस्थितियाँ व मजबूरी...
(Quarter No 33, Sherubtse, Kanglung, Bhutan: 2.11.1994..4 PM.. tomorrow is diwali)
Friday, August 20, 2010
पेड़ व समीकरण
पेड़,
जमीन पर उगता है पेड़
जमीन के अन्दर होती है उसकी जड़
और
जड़ पर निर्भर करता है
पेड़ का अस्तित्व.
पेड़,
पेड़ पर होती है शाखाएं
शाखाओं पर होती हैं पत्तियां
होते हैं फूल, फल और कांटे.
पेड़ पर होती है शाखाएं
शाखाओं पर होते हैं सम्बन्ध
संबंधों से बनते हैं समीकरण
और समय पर, मौसम पर
निर्भर करते हैं समीकरण.
पेड़ से आती है लकड़ी
और लकड़ी से बनती है कुर्सी
कुर्सी से बनते हैं सम्बन्ध
जमीन पर उगता है पेड़
जमीन के अन्दर होती है उसकी जड़
और
जड़ पर निर्भर करता है
पेड़ का अस्तित्व.
पेड़,
पेड़ पर होती है शाखाएं
शाखाओं पर होती हैं पत्तियां
होते हैं फूल, फल और कांटे.
पेड़ पर होती है शाखाएं
शाखाओं पर होते हैं सम्बन्ध
संबंधों से बनते हैं समीकरण
और समय पर, मौसम पर
निर्भर करते हैं समीकरण.
पेड़ से आती है लकड़ी
और लकड़ी से बनती है कुर्सी
कुर्सी से बनते हैं सम्बन्ध
संबंधों से बनते हैं समीकरण
और समय पर, मौसम पर
निर्भर करते हैं समीकरण.
पेड़ शांत रहता है
कभी बोलता है,
बडबडाता है,
दहाड़ता है.
पेड़ घूमता है,
नाचता है,
गाता है,
संगीत सजाता है.
पेड़ चलता है,
दौड़ता है,
समय के साथ -
जड़ के साथ -
बिना किये कोई समझौता.
पेड़ पर रहते हैं,
कीडे, मकोडे व पक्षी.
पेड़ पर होते हैं,
आश्रित
जीव - मनुष्य, जानवर,
कीडे, मकोडे व पक्षी,
कुर्सी पर भी.
सम्बन्ध, समीकरण व संयोग,
समय, काल व परिस्थिति,
पेड़ को जड़ से अलग करते हैं.
पेड़ शांत रहता है
सब कुछ सहता है.
समय, काल और परिस्थिति,
जड़, पेड़ और कुर्सी,
सम्बन्ध, समीकरण और संयोग,
अपना-अपना कहना कहते हैं,
सब कुछ सहते हैं,
पेड़,
जड़ से अलग होकर भी.
(15 July, 2008, Shillong, 10:55 AM-12:20 Noon)
Saturday, May 22, 2010
समय की गति
समय,
गतिशील है,
गतिवान है,
अविराम है,
कुछ कुछ
जीवन की तरह,
परन्तु
जीवन गतिशील होते हुए भी
अविराम नहीं है,
जीवन,
मनुष्य का,
जानवर का,
पक्षी का,
पौधे का,
या ब्रक्ष का,
समान नहीं है,
परन्तु
अविराम भी नहीं है,
कभी ना कभी,
कहीं ना कहीं,
अवश्य होगा,
विराम,
समय से बिछुड़ना ही होगा
जीवन को.
समय,
बहुत स्वार्थी है,
नहीं रखता किसी के साथ,
इतनी घनिष्ठता,
जिसको दे सके
अपनी आयु,
जिसके साथ
रह सके
अविराम रूप से,
उसका कोई प्रतिद्वंदी
भी नहीं है,
वह सर्वशक्तिमान है.
समय,
जन्म देता है,
कई लड़ाइयों को,
समय कि गति से भी तीब्र
गति से,
भागने का प्रयास करता है,
मानव,
जिस प्रकार से,
बढती जाती है
जीवन की गति,
समय का महत्व भी,
बढता जाता है,
समय कि गति समान रहती है,
परन्तु
प्रतीत होता है,
कभी तीब्र - कभी मंद,
यही दर्शन है,
समय का.
कौन रोक सकता है,
समय को,
कौन रोक पायेगा,
यदि किया गया,
कोई प्रयास,
इस आशय का,
बस ठीक उसी समय
युद्ध प्रारंभ हो जायेगा,
विराम व अविराम के मध्य,
अविराम, विराम के जीवन पर
प्रश्नचिन्ह लगाएगा,
और,
उसका साक्षात्कार,
उसके समय से कराएगा,
अंततः
विराम,
विराम हो जायेगा,
एक पूर्ण विराम,
गतिहीन,
ठहरा हुआ,
रुका हुआ,
और
अविराम,
हमेशा की तरह,
बढ जायेगा,
आगे,
प्रतीत होगा,
उसकी गति मंद थी,
उसकी गति तीब्र है,
यह सब
मस्तिष्ट का फेर है,
ना कहीं जल्दी है,
ना देर है,
इसको समझ पाना,
ना कठिन है,
ना आसान है,.
समय गतिशील है,
गतिवान है,
जिसकी गति समान है....
(२६ सितम्बर, १९९९, कक्ष स: १९, ४ बजे संध्या, परीक्षा ड्यूटी, शेरुब्त्से कॉलेज, कंग्लुंग, भूटान)
गतिशील है,
गतिवान है,
अविराम है,
कुछ कुछ
जीवन की तरह,
परन्तु
जीवन गतिशील होते हुए भी
अविराम नहीं है,
जीवन,
मनुष्य का,
जानवर का,
पक्षी का,
पौधे का,
या ब्रक्ष का,
समान नहीं है,
परन्तु
अविराम भी नहीं है,
कभी ना कभी,
कहीं ना कहीं,
अवश्य होगा,
विराम,
समय से बिछुड़ना ही होगा
जीवन को.
समय,
बहुत स्वार्थी है,
नहीं रखता किसी के साथ,
इतनी घनिष्ठता,
जिसको दे सके
अपनी आयु,
जिसके साथ
रह सके
अविराम रूप से,
उसका कोई प्रतिद्वंदी
भी नहीं है,
वह सर्वशक्तिमान है.
समय,
जन्म देता है,
कई लड़ाइयों को,
समय कि गति से भी तीब्र
गति से,
भागने का प्रयास करता है,
मानव,
जिस प्रकार से,
बढती जाती है
जीवन की गति,
समय का महत्व भी,
बढता जाता है,
समय कि गति समान रहती है,
परन्तु
प्रतीत होता है,
कभी तीब्र - कभी मंद,
यही दर्शन है,
समय का.
कौन रोक सकता है,
समय को,
कौन रोक पायेगा,
यदि किया गया,
कोई प्रयास,
इस आशय का,
बस ठीक उसी समय
युद्ध प्रारंभ हो जायेगा,
विराम व अविराम के मध्य,
अविराम, विराम के जीवन पर
प्रश्नचिन्ह लगाएगा,
और,
उसका साक्षात्कार,
उसके समय से कराएगा,
अंततः
विराम,
विराम हो जायेगा,
एक पूर्ण विराम,
गतिहीन,
ठहरा हुआ,
रुका हुआ,
और
अविराम,
हमेशा की तरह,
बढ जायेगा,
आगे,
प्रतीत होगा,
उसकी गति मंद थी,
उसकी गति तीब्र है,
यह सब
मस्तिष्ट का फेर है,
ना कहीं जल्दी है,
ना देर है,
इसको समझ पाना,
ना कठिन है,
ना आसान है,.
समय गतिशील है,
गतिवान है,
जिसकी गति समान है....
(२६ सितम्बर, १९९९, कक्ष स: १९, ४ बजे संध्या, परीक्षा ड्यूटी, शेरुब्त्से कॉलेज, कंग्लुंग, भूटान)
समय का पहिया
समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे,
गति निर्भर करती है,
परिस्थितियों पर,
कई बार
गति प्रदान करने वाले
व्यक्ति पर भी,
परन्तु,
न्यूनतम व अधिकतम,
गति सीमा से परे,
कठिन है जाना.
जैसे लगता है,
रविवार २४ घंटे का नहीं होता,
बल्कि मध्य में या कभी-कभी,
प्रारम्भ में,
याचना करता है
दशमलव के प्रयोग की,
जबकि कई बार कई दिन
२४ घंटे के स्थान पर
४२ घंटे के प्रतीत होते हैं.
क्षण-घंटे-दिन-सप्ताह-माह व वर्ष,
किस प्रकार गुज़र जाते हैं,
ज्ञात होता है,
गुजरने के बाद.
यदि यह अनुभूति,
प्रारंभ में ही हो जाये,
जानिए,
आधी समस्याओं का समाधान.
आयु व समय
एक दूसरे से साक्षात्कार करते हैं
प्रायः
किस समय, कौन किसका
साक्षात्कार कर रहा है,
बता पाना कठिन है,
यदि कोई इसको समझ सके,
या स्पष्ट रूप से जान सके,
जानिये
आधी समस्याओं का समाधान...
स्वयं की आयु का ज्ञान कब होता है?
जब स्वयं द्वारा पानी दिए पेड़ की
टहनियां लहलाहतीं हैं,
फलों का लालच देकर
पास बुलाती हैं,
तब.
एक शिक्षक द्वारा पडाया गया छात्र
आसीन होता है उसके बराबर के
पद पर
तब.
मोहल्ले में पडोसी का बेटा
जो खेलता था कंचे
आँखों सामने,
अब व्यापार में पिता का
हाथ बटाता प्रतीत होता है
तब.
एक नौजवान दिखने वाले
अभिनेता का पुत्र
उसी अभिनेत्री के साथ
अभिनेता के रूप मे प्रदर्शित होता है
जिसके साथ कभी,
उसके पिता प्रदर्शित होते थे
तब.
इमारतों की मंजिलें
बढती दिखतीं हैं
तब.
सड़क की चौडाई
बढती दिखती है
तब.
रामलाल की बेटी गुडिया
जिसे कभी गोदी में खिलाता था
पुत्रवती होती है
तब.
या फिर तब
जब
माता पिता मे खिलखली
का सिलसिला
कम होता दिखाई देता है.
तब - जब
सुई में धागा डालने के लिए
माँ को चश्मे की
आवश्यकता होती है.
तब - जब
पिता को
चाय में चीनी
व सब्जी में नमक
अधिक लगता है.
तब - जब
डाक्टर अंकल से मेल अधिक
दिखता है
परिवार का.
तब - जब
स्वयं की गतिविधियाँ
दोहराई जाती हैं
स्वयं के बच्चों के द्वारा
स्वयं के शिष्यों के द्वारा.
सचमुच
समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे
जो इस गति सीमा को
ठीक ठीक पड़ ले
जानिए
अधिकतर समस्याओं का समाधान...
(२६ सितम्बर, १९९४, शेरुब्त्से कॉलेज, कान्ग्लुंग, त्राशीगांग, भूटान, exam duty: room no 15 - 9:15 to 10 AM)
गति सीमा से परे,
गति निर्भर करती है,
परिस्थितियों पर,
कई बार
गति प्रदान करने वाले
व्यक्ति पर भी,
परन्तु,
न्यूनतम व अधिकतम,
गति सीमा से परे,
कठिन है जाना.
जैसे लगता है,
रविवार २४ घंटे का नहीं होता,
बल्कि मध्य में या कभी-कभी,
प्रारम्भ में,
याचना करता है
दशमलव के प्रयोग की,
जबकि कई बार कई दिन
२४ घंटे के स्थान पर
४२ घंटे के प्रतीत होते हैं.
क्षण-घंटे-दिन-सप्ताह-माह व वर्ष,
किस प्रकार गुज़र जाते हैं,
ज्ञात होता है,
गुजरने के बाद.
यदि यह अनुभूति,
प्रारंभ में ही हो जाये,
जानिए,
आधी समस्याओं का समाधान.
आयु व समय
एक दूसरे से साक्षात्कार करते हैं
प्रायः
किस समय, कौन किसका
साक्षात्कार कर रहा है,
बता पाना कठिन है,
यदि कोई इसको समझ सके,
या स्पष्ट रूप से जान सके,
जानिये
आधी समस्याओं का समाधान...
स्वयं की आयु का ज्ञान कब होता है?
जब स्वयं द्वारा पानी दिए पेड़ की
टहनियां लहलाहतीं हैं,
फलों का लालच देकर
पास बुलाती हैं,
तब.
एक शिक्षक द्वारा पडाया गया छात्र
आसीन होता है उसके बराबर के
पद पर
तब.
मोहल्ले में पडोसी का बेटा
जो खेलता था कंचे
आँखों सामने,
अब व्यापार में पिता का
हाथ बटाता प्रतीत होता है
तब.
एक नौजवान दिखने वाले
अभिनेता का पुत्र
उसी अभिनेत्री के साथ
अभिनेता के रूप मे प्रदर्शित होता है
जिसके साथ कभी,
उसके पिता प्रदर्शित होते थे
तब.
इमारतों की मंजिलें
बढती दिखतीं हैं
तब.
सड़क की चौडाई
बढती दिखती है
तब.
रामलाल की बेटी गुडिया
जिसे कभी गोदी में खिलाता था
पुत्रवती होती है
तब.
या फिर तब
जब
माता पिता मे खिलखली
का सिलसिला
कम होता दिखाई देता है.
तब - जब
सुई में धागा डालने के लिए
माँ को चश्मे की
आवश्यकता होती है.
तब - जब
पिता को
चाय में चीनी
व सब्जी में नमक
अधिक लगता है.
तब - जब
डाक्टर अंकल से मेल अधिक
दिखता है
परिवार का.
तब - जब
स्वयं की गतिविधियाँ
दोहराई जाती हैं
स्वयं के बच्चों के द्वारा
स्वयं के शिष्यों के द्वारा.
सचमुच
समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे
जो इस गति सीमा को
ठीक ठीक पड़ ले
जानिए
अधिकतर समस्याओं का समाधान...
(२६ सितम्बर, १९९४, शेरुब्त्से कॉलेज, कान्ग्लुंग, त्राशीगांग, भूटान, exam duty: room no 15 - 9:15 to 10 AM)
Monday, May 17, 2010
परिवर्तन 2
परिवर्तन,
कहाँ है,
नहीं जानता,
परन्तु है अवश्य,
किसमे
यह भी नहीं मालूम,
परन्तु है अवश्य,
आखिर इसकी आवश्यकता क्या है.
संतुष्टि किसी को नहीं है,
शायद यही हमारी विवशता है,
फिर भी नैतिकता शब्दकोष मे है,
इसको ढूँढ पाना
कोई कठिन नहीं,
है परन्तु
कुछ के लिए,
जो परिवर्तन को परिवर्तित
करते रहते हैं.
सीमा - इसको मैं नहीं जानता,
संतोष - आँखों से बहुत दूर है,
विश्वास - इतिहास की पुस्तकों मे है,
धैर्य - कभी मित्र था,
म्रदुल - आता जाता था,
शोभा - पता नहीं आजकल कहाँ है,
समय, काल व परिस्थिति,
शब्दों की परिभाषाएं
परिवर्तित हो चुकी हैं,
ना जाने कितनी पीड़ियाँ
समर्पित हों चुकी हैं
बिना अर्चना के,
कभी-कभी मस्तिष्ट
प्रश्नों के प्रकाश में,
कुछ सोचने का प्रयत्न करता है
परन्तु प्रयत्न
मात्र प्रयत्न ही रहेगा
मैं जानता हूँ,
निरर्थक होंगे सारे प्रयास
फिर कहाँ होगा विकास...
(११ अक्टूबर, १९९१, ७:१५ बजे संध्या, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड)
कहाँ है,
नहीं जानता,
परन्तु है अवश्य,
किसमे
यह भी नहीं मालूम,
परन्तु है अवश्य,
आखिर इसकी आवश्यकता क्या है.
संतुष्टि किसी को नहीं है,
शायद यही हमारी विवशता है,
फिर भी नैतिकता शब्दकोष मे है,
इसको ढूँढ पाना
कोई कठिन नहीं,
है परन्तु
कुछ के लिए,
जो परिवर्तन को परिवर्तित
करते रहते हैं.
सीमा - इसको मैं नहीं जानता,
संतोष - आँखों से बहुत दूर है,
विश्वास - इतिहास की पुस्तकों मे है,
धैर्य - कभी मित्र था,
म्रदुल - आता जाता था,
शोभा - पता नहीं आजकल कहाँ है,
समय, काल व परिस्थिति,
शब्दों की परिभाषाएं
परिवर्तित हो चुकी हैं,
ना जाने कितनी पीड़ियाँ
समर्पित हों चुकी हैं
बिना अर्चना के,
कभी-कभी मस्तिष्ट
प्रश्नों के प्रकाश में,
कुछ सोचने का प्रयत्न करता है
परन्तु प्रयत्न
मात्र प्रयत्न ही रहेगा
मैं जानता हूँ,
निरर्थक होंगे सारे प्रयास
फिर कहाँ होगा विकास...
(११ अक्टूबर, १९९१, ७:१५ बजे संध्या, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड)
Monday, April 26, 2010
जब कभी मैं अकेला होता हूँ
जब कभी मैं अकेला होता हूँ,
मेरी लेखनी,
मुझे बिवश करती है,
अपने स्पर्श को,
लेकिन मैं उस घड़ी की
प्रतीक्षा करता हूँ,
जब मैं स्वयं,
उसके स्पर्श को
बिवश होऊं.
बिवषता के अंधकार में,
उजियारे मात्र को
चमकाने के लिए,
लेखनी थामकर बहुत कुछ
सोचता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
कभी गीत, कभी ग़ज़ल,
कभी कविता,
साहित्य,
हर क्षेत्र में विचरण
करने के पश्चात्,
निष्कर्ष निकालने में
स्वयं को असमर्थ पता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
कभी भूत तो कभी भविष्य,
बीते कल को याद करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
वास्तविकता की पुस्तकें,
अपनी रुआंसी हंसी को,
होठों के चुम्बन के लिए
बाध्य करती हैं,
अपनी बीती हुई गाथा,
दोहराती हैं,
याद करती हैं.
वे जो कमल के पुष्प के समान,
कीचड़ मे भी मुस्करातीं थीं,
अठखेलियाँ किया करती थीं,
शाम को सांझ डलते,
कभी कभी उस द्रश्य को
याद करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
बीते हुए क्षण
अकेले मे ही याद आते हैं,
अश्रुओं की वर्षा,
तो कभी,
ख़ामोशी के ओले,
अपनी-अपनी कथा,
स्वयं ही सुनाते है.
आशाएं और आकांक्षाएं,
गीले कागज़ पर
लिखे कुछ अक्षर,
जिस प्रकार
फ़ैल से जाते हैं,
इसी प्रकार,
बीते समय की छवि
गीली आँखों से
देखता हूँ,
सोचता हूँ,
तत्पश्चात निष्कर्ष,
रोता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
भविष्य,
अर्थात - आने वाला कल,
मात्र कल्पना के अंधकार मे
फंस जाता है,
जब कभी बीता हुआ कल
याद आता है.
कल्पनाओं को संचित करने के लिए,
स्वयं के मस्तिष्ट को,
स्वयं को,
असमर्थ पाता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
मानवीय शरीर के छिद्रों के समान,
कल्पनाएँ,
अनगिनत हैं,
कुछ छिद्र सरलता से
दृष्टिगत होते हैं,
ठीक उसी प्रकार
कुछ कल्पनाएँ,
महत्ता/आवश्यकता दर्शाती हैं,
वाकी सब वकवास नज़र आती हैं,
फिर भी वकवास पर अधिक
ध्यानाकर्षित करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
कलम की स्याही,
स्वतः ही,
कुछ हल्की सी होती जाती है,
आखिर वह भी
अपनी व्यथा दर्शाती है,
बिना आंसुओं का रोना रोती है,
विना निद्रा के
सो सी जाती है,
बिना दर्द के कराहती है,
अंततः
स्वयं को कुछ उभारने मे
असमर्थ पाती है,
उसके इस विचित्र रूप को
समझने का
प्रयत्न करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ...
(७ जुलाई १९८६ - तिलक कालोनी, सुभाष नगर, बरेली, उत्तर प्रदेश)
मेरी लेखनी,
मुझे बिवश करती है,
अपने स्पर्श को,
लेकिन मैं उस घड़ी की
प्रतीक्षा करता हूँ,
जब मैं स्वयं,
उसके स्पर्श को
बिवश होऊं.
बिवषता के अंधकार में,
उजियारे मात्र को
चमकाने के लिए,
लेखनी थामकर बहुत कुछ
सोचता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
कभी गीत, कभी ग़ज़ल,
कभी कविता,
साहित्य,
हर क्षेत्र में विचरण
करने के पश्चात्,
निष्कर्ष निकालने में
स्वयं को असमर्थ पता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
कभी भूत तो कभी भविष्य,
बीते कल को याद करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
वास्तविकता की पुस्तकें,
अपनी रुआंसी हंसी को,
होठों के चुम्बन के लिए
बाध्य करती हैं,
अपनी बीती हुई गाथा,
दोहराती हैं,
याद करती हैं.
वे जो कमल के पुष्प के समान,
कीचड़ मे भी मुस्करातीं थीं,
अठखेलियाँ किया करती थीं,
शाम को सांझ डलते,
कभी कभी उस द्रश्य को
याद करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
बीते हुए क्षण
अकेले मे ही याद आते हैं,
अश्रुओं की वर्षा,
तो कभी,
ख़ामोशी के ओले,
अपनी-अपनी कथा,
स्वयं ही सुनाते है.
आशाएं और आकांक्षाएं,
गीले कागज़ पर
लिखे कुछ अक्षर,
जिस प्रकार
फ़ैल से जाते हैं,
इसी प्रकार,
बीते समय की छवि
गीली आँखों से
देखता हूँ,
सोचता हूँ,
तत्पश्चात निष्कर्ष,
रोता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
भविष्य,
अर्थात - आने वाला कल,
मात्र कल्पना के अंधकार मे
फंस जाता है,
जब कभी बीता हुआ कल
याद आता है.
कल्पनाओं को संचित करने के लिए,
स्वयं के मस्तिष्ट को,
स्वयं को,
असमर्थ पाता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
मानवीय शरीर के छिद्रों के समान,
कल्पनाएँ,
अनगिनत हैं,
कुछ छिद्र सरलता से
दृष्टिगत होते हैं,
ठीक उसी प्रकार
कुछ कल्पनाएँ,
महत्ता/आवश्यकता दर्शाती हैं,
वाकी सब वकवास नज़र आती हैं,
फिर भी वकवास पर अधिक
ध्यानाकर्षित करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ.
कलम की स्याही,
स्वतः ही,
कुछ हल्की सी होती जाती है,
आखिर वह भी
अपनी व्यथा दर्शाती है,
बिना आंसुओं का रोना रोती है,
विना निद्रा के
सो सी जाती है,
बिना दर्द के कराहती है,
अंततः
स्वयं को कुछ उभारने मे
असमर्थ पाती है,
उसके इस विचित्र रूप को
समझने का
प्रयत्न करता हूँ,
जब कभी मैं अकेला होता हूँ...
(७ जुलाई १९८६ - तिलक कालोनी, सुभाष नगर, बरेली, उत्तर प्रदेश)
Saturday, April 10, 2010
MAY BE OR MAY NOT BE
Counting nights,
without her.
Does she also have nights?
When this counting would end?
And would begin
another counting.
Her nights would end,
with the beginning of our nights.
That counting would be ours.
My days are not numbered,
but nights.
That counting would be for days,
not nights.
Darkness of nights,
and brightness of days,
would reverse in its reflection.
Counting of days for nights,
and counting of minutes for days,
would keep on be there,
till the last breath of life.
Till the theory of
‘Time’
is practiced.
(23rd March 1998 at 11:45am Exam duty in Room No NB(A))
without her.
Does she also have nights?
When this counting would end?
And would begin
another counting.
Her nights would end,
with the beginning of our nights.
That counting would be ours.
My days are not numbered,
but nights.
That counting would be for days,
not nights.
Darkness of nights,
and brightness of days,
would reverse in its reflection.
Counting of days for nights,
and counting of minutes for days,
would keep on be there,
till the last breath of life.
Till the theory of
‘Time’
is practiced.
(23rd March 1998 at 11:45am Exam duty in Room No NB(A))
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