Showing posts with label स्व. Show all posts
Showing posts with label स्व. Show all posts

Thursday, June 6, 2013

जैसी चाह वैसी राह

हम वह सोचते हैं
जो सोचना चाहते हैं
हम वह पड़ते हैं
जो पड़ना चाहते हैं
हम वह खाते हैं
जो खाना चाहते हैं
हम वह पहनते हैं
जो पहनना चाहते हैं

क्या सोचना
क्या पड़ना
क्या खाना
क्या पहनना
और न जाने ऐसी
कितनी ही क्रियाएं
व कारक
निर्भर करते हैं
इस पर
आखिर चाहते क्या हैं
हम और आप

प्रयास आवश्यक है
जानने का यह
आखिर चाहते क्या हैं हम
जानिये - प्रयोग कीजिये 
स्वयं पर
अपने जानने के हक का
जानिये
आखिर चाहते क्या हैं आप
चाहिए अच्छा
होगा सब अच्छा

एक विडम्बना
आखिर क्यों
अक्सर
वह नहीं कर पाते हैं
जो करना चाहते हैं हम

Wednesday, April 14, 2010

मेरे सपने

मेरे सपने अपने थे, जब हम केवल अपने थे
आज मुझे मालूम हो गया, सपने कितने अपने थे

कितने भी दुःख, कष्ट, सजाएँ, हंस के सब कुछ सह लेंगें हम
जीवन की हर धुंध ओड़कर, अन्धकार मे रह लेंगें हम
नहीं झुकेंगे कभी कहीं हम, ऐसे देखे सपने थे
सपने केवल अपने थे, जब हम केवल अपने थे

हर मुश्किल अच्छी लगती थी, जैसे कोई नया सवेरा
नई किरण की नई रौशनी, नया नया सपना था मेरा
नहीं कभी समझौता खुद से, ऐसे देखे सपने थे
सपने कितने अपने थे, जब हम केवल अपने थे

कोई शूल चुभा जैसे हो, आशाओं का धुंधला पड़ना
कब तक पतझड़ को देखे हम, ऋतुओं से कब तक हो लड़ना
रिश्तो मे इतनी दूरी क्यों, क्यों ये सपने अपने थे
सपने कितने अपने थे, जब हम केवल अपने थे

मेरे सपने अपने थे, सपने कितने अपने थे.

२८ जुलाई १९९९: ५:३० संध्या : कान्ग्लुंग : भूटान