Friday, July 1, 2011

कागज़

मैंने पड़ा था:
कागज़ के फूल
कागज की नाव

मैंने देखे:
कागज के कोण
कागज के रिश्ते
कागज़ के पैसे
कागज़ के बिल
देखा:
कागज का सूखा
कागज़ की बाड़
कागज़ का पानी
कागज़ के पुल

देखी - कागज़ की सजा
देखा - कागज़ का पुरुस्कार
देखे - कागज़ के सपने 
कागज के वार
कागज़ की उड़ान
कागज़ की शान
कागज़ का द्वेष 
कागज़ का प्यार 

आजकल प्रयास कर रहा हूँ
सुनने व समझने की 
कागज़ की भाषा 

शिलांग ::: १ जुलाई २०११ ::: ११ बजे रात्रि ::: 

8 comments:

  1. fabulous writing...
    keep on writing such wonderful poems.pa....

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  2. sir your poem has just astonoshing effect... what an expression sir... the word'kagaz' has the mesmerising effect.. wonderul.. the symbol of paper is playing on my mind...

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  3. lovely verses...it really is an exceptional expression on the system-relationship-materialistic world... outstanding spoof...

    Kumar Rajesh

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  4. Sanjay ShrotryiaJuly 3, 2011 at 9:47 PM

    very sharp, crisp n hitting...gud one...

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  5. खूब कही कागज की कहानी.

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  6. kaagaj ki ahamiyat insaani jubaan se bhi jyada hai.aapki kavita pahli bar padhi bahut prbhaav shali lagi.atiuttam.

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