Thursday, November 12, 2015

बोझ

समाप्त कर लेता हूँ
स्वयं को
और 
ताउम्र
आत्मसमर्पण भाव में
जीवित रहता हूँ,
भूलता जाता हूँ
स्वयं को -
न स्वयं का
न किसी और का.

सहता हूँ पीड़ा
इसीलिए कहता हूँ
आत्मसमर्पण के बाद
मैं कर लेता हूँ 
आत्महत्या
और 
ताउम्र ढोता रहता हूँ
बोझ
एक लाश का.

[धन्यवाद सुनील जी ... आपके द्वारा फेसबुक पर लिखी पंक्तियों ने मुझे बाध्य किया इन पंक्तियों को लिखने के लिए]