Saturday, May 22, 2010

समय की गति

समय,
गतिशील है,
गतिवान है,
अविराम है,
कुछ कुछ
जीवन की तरह,
परन्तु
जीवन गतिशील होते हुए भी
अविराम नहीं है,
जीवन,
मनुष्य का,
जानवर का,
पक्षी का,
पौधे का,
या ब्रक्ष का,
समान नहीं है,
परन्तु
अविराम भी नहीं है,
कभी ना कभी,
कहीं ना कहीं,
अवश्य होगा,
विराम,
समय से बिछुड़ना ही होगा
जीवन को.

समय,
बहुत स्वार्थी है,
नहीं रखता किसी के साथ,
इतनी घनिष्ठता,
जिसको दे सके
अपनी आयु,
जिसके साथ
रह सके
अविराम रूप से,
उसका कोई प्रतिद्वंदी
भी नहीं है,
वह सर्वशक्तिमान है.

समय,
जन्म देता है,
कई लड़ाइयों को,
समय कि गति से भी तीब्र
गति से,
भागने का प्रयास करता है,
मानव,
जिस प्रकार से,
बढती जाती है
जीवन की गति,
समय का महत्व भी,
बढता जाता है,
समय कि गति समान रहती है,
परन्तु
प्रतीत होता है,
कभी तीब्र - कभी मंद,
यही दर्शन है,
समय का.

कौन रोक सकता है,
समय को,
कौन रोक पायेगा,
यदि किया गया,
कोई प्रयास,
इस आशय का,
बस ठीक उसी समय
युद्ध प्रारंभ हो जायेगा,
विराम व अविराम के मध्य,
अविराम, विराम के जीवन पर
प्रश्नचिन्ह लगाएगा,
और,
उसका साक्षात्कार,
उसके समय से कराएगा,
अंततः
विराम,
विराम हो जायेगा,
एक पूर्ण विराम,
गतिहीन,
ठहरा हुआ,
रुका हुआ,
और
अविराम,
हमेशा की तरह,
बढ जायेगा,
आगे,
प्रतीत होगा,
उसकी गति मंद थी,
उसकी गति तीब्र है,
यह सब
मस्तिष्ट का फेर है,
ना कहीं जल्दी है,
ना देर है,
इसको समझ पाना,
ना कठिन है,
ना आसान है,.
समय गतिशील है,
गतिवान है,
जिसकी गति समान है....
(२६ सितम्बर, १९९९, कक्ष स: १९, ४ बजे संध्या, परीक्षा ड्यूटी, शेरुब्त्से कॉलेज, कंग्लुंग, भूटान)