Friday, November 12, 2010

साहस, परिस्थितियाँ व मजबूरी

जो महसूस करता हूँ
कह नहीं सकता
लिख सकता हूँ
जो महसूस करता हूँ
अप्रत्यक्ष रूप से
कह भी सकता हूँ.

प्रत्यक्ष
लिख सकता हूँ.

अभाव
साहस का
नहीं
अनुकूल परिस्थितियों का.

कोई दीवार खड़ी है
प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष के मध्य
साहस व परिस्थितियों के मध्य
कहना - किसको
निर्भर करता है
परिस्थितियों पर.

किसी से कह नहीं सकता
किसी से भी नहीं
विश्वास के कारण
लिखा किसी को दिखा नहीं सकता
किसी को भी नहीं
विश्वास के कारण
लिखता हूँ किसके लिए फिर
स्वयं को अनुभव दिलाने के लिए!

शायद इसलिए कि
साहस और परिस्थितियों से
समझौता प्रदर्शित कर सके
जो कुछ मैं लिखूं.

या फिर
जब साहस हो तब
दिखा सकूं
पड़ा सकूं
प्रकाशित करा सकूं.

वास्तव में
सबकुछ
परिस्थितियों पर निर्भर है
समय पर भी
स्वयं पर भी
कोई एक अकेला इसके लिए उत्तरदायी नहीं है
आखिर इसीलिये
सोचना पड़ता है,
बोलने से पहले
कहने से पहले
कुछ भी
और लिखने से पहले
कुछ भी

अंततः:
सबकुछ ना कह सकता हूँ,
सबसे
न लिख सकता हूँ
सबके लिए
प्रयास कर सकता हूँ
अवश्य
साहस, परिस्थितियाँ व मजबूरी...

(Quarter No 33, Sherubtse, Kanglung, Bhutan: 2.11.1994..4 PM.. tomorrow is diwali)