Sunday, May 16, 2010

संयोग

मेरे अश्रु,
गुलाब की पत्ती पर पड़ीं,
ओस की बूँदें,
आपस मे
सामंजस्य दर्शाती हैं,
परन्तु,
ओस समय पर आती है,
एकाग्रता के,
भाव से,
परिचित कराती है,
मेर अश्रु,
वक़्त/बेवक्त,
समय/बेसमय,
कुछ नहीं देखते,
अक्सर आते हैं,
परिचित कराते हैं,
अपनी बिवषता से.
कीचड़ मे खिला कमल,
मेरे लिए,
प्रेरणा बन जाता है,
वह भी अपनी,
बिवषता दिखाता है,
ओस की बूँदें,
सीमायें लांघने का,
प्रयास नहीं करतीं,
मेरे अश्रु,
किसी की,
प्रतीक्षा नहीं करते,
अंतर बताती हैं,
प्रश्न कर जातीं हैं,
द्रश्य को,
संयोग बताती है,
मेरी विचारधारा,
मेरा अनुभव...

(१९ फरबरी १९८८, तिलक कालोनी, सुभाष नगर, बरेली, उत्तरप्रदेश)