Sunday, October 12, 2014

सोच


वो जैसा है नहीं मुझको
दिखाई देता है वैसा
मेरा चश्मा मुझे आगाह
करता है कपट कैसा
सफल जीवन नहीं यदि
कष्ट पीड़ा साथ जीवन में
मैं इतना सोचता हूँ
क्यों दिखाई देता बस पैसा

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Wednesday, September 24, 2014

यात्रा

मैं चलकर सोचता हूँ
सोचकर चलता नहीं हूँ अब
मेरी यात्रा में शामिल
मित्र दुश्मन भाई बंधु सब
मेरी भाषा संभल जाए
मेरा हर पग संभल जाए
बस इतना सोचता हूँ
अब चलूँ सोचूं विचारू सब
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Thursday, September 11, 2014

आशय

नियम क़ानून अनुशासन
सभी अपवाद लगते हैं
जो आशय हो सही संगत
सही संवाद सजते हैं
मेरा दर्शन मेरे मित्रों को
क्यों कल्पित ही लगता है
बस इतना सोचता हूँ
क्यों नहीं संवाद करते हैं
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Friday, August 29, 2014

सपना

मैं ढोना चाहता हूँ बोझ
सपनों का इन कन्धों पर
किसी को कष्ट में देखूं
तो खोलूं बाहें बन्दों पर
किसी की ईर्ष्या को
प्रेम से जीतूँ यही सपना
बस इतना सोच सकता हूँ
लगा विराम धंधों पर
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Friday, August 22, 2014

मैं इतना सोच सकता हूँ

हम अपनी बाजुओं के जोर
को अब आजमाएंगे
बहुत प्रतीक्षा करने में
आंसू सूख जायेंगे
अजब खेमो में बंटकर
आप हम क्यों दूर होते हैं     
बस इतना सोच सकता हूँ
उन्हे उनके रुलायेंगे  
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Saturday, August 16, 2014

रास्ते

ये टेढ़े रास्ते लेकर
मुझे मंजिल दिलाएंगे
मेरे हर कृत्य को
सम द्रष्टि देकर भूल जायेंगे
मेरी यात्रा मुझे जीवन परख
मे व्यस्त रखेगी
बस इतना सोचता हूँ
ये कदम पत्थर सजायेंगे
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Friday, August 8, 2014

कर्मबल

कर्मवीरों अब उठो देखो खिली सी धूप
ह्रदय खोलो प्रेम की धारा धवल हो रूप
बाजुओं की वीरता का अंत होता काल
ज्ञान के झर बीज पूर्वज बो गए अब ढाल

अब नहीं विश्राम चाहे बीतें शत प्रहर
अब दिशा पकड़ो भुलाकर ऊर्जा का ज्वर
काम का अम्बार पथ से ना करे भ्रमित
प्रण विनय परिश्रम प्रणय प्रतिमूर्ति अमित

कौन बैठा किस भवन किस डाल किस तरुवर
तुम तुम्हारी दृष्टि तुम्हारे तीर तुम्हारे कर
तुम उजाला बन करोगे रौशनी हर घर
याद रखना शाम का ढलना नहीं पथ पर

धूप ओझल हो भला तुम कर्मबल देखो
शाम ढल जाए प्रकृति का रूप कल देखो
चील कौए कीट कीड़े सब प्रकृति के जीव
एक मानव ही जुटा है अभिग्रहण निर्जीव

(प्रो० एस के मिश्र द्वारा निम्न कविता मिली___ उसके उत्तर में उपरोक्त पंक्तियाँ भेजी)

शाम सहसा ढल गयी है 

धूप ओझल हो गयी है । 

जो जहाँ हैं, लौटने को हो रहे तैयार 
काम  का वैसे पड़ा है सामने अंबार 
अब करेंगे, अब करेंगे, हो गयी दुपहर 
सोचने में और गुजरा एक अन्य प्रहर । 

डूबने को जा रहा मसि-सिंधु में संसार  
मच्छरों की फ़ौज़ है उन खिड़कियों के  पार 
हैं वहीं  टकरा रहे चमगादड़ों के पर 
गूँजते हैँ हर तरफ बस झींगुरों के स्वर । 


ऊँघते उल्लू जमे हैँ शाख पर हर ओर 
उस तरफ से आ रहा है शावकों का शोर 
दूर तक दिखता नहीं है रौशनी  का श्रोत 
कर सकेंगे राह रौशन ये निरे खद्योत ?

शाम सहसा ढल गयी है । 

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सुधाँशु