Thursday, October 13, 2011

मध्य और माध्यम


खड़े होकर
जब मैंने देखा
मुझे दिखाई दिए
कुछ ऊपर
कुछ नीचे
मेरा मध्य
उनके मध्य से भिन्न था

अच्छाई और बुराई
पाप और पुण्य
दुःख और सुख
क्लेश और शांति
इनका मध्य क्या है

कुर्सी बनाने वाला बढई
कुर्सी पर बैठने वाला शासक
पानी पिलाने वाला पियाऊ
सबको पानी पिलाने वाला शासक
मजदूर और मालिक
धनी और गरीब
किसान और उद्धमी
इनका मध्य क्या है

मुझे मात्र ज्ञात है
मध्य
सिर और पैर का 
जिसके लिए 
हम सब जी रहे हैं
युद्ध कर रहे हैं 
पाल रहें हैं
आशाएं
अभिलाषाएं

काश 
यह मध्य ना होता  
मेरा माध्यम भी
ना होता
ना होता
कोई युद्ध
संघर्ष
ना होती
कोई अभिलाषा.

(VK Shrotryia, 9:40 AM, 28 Sept 2011, Shillong)