Showing posts with label जंगल. Show all posts
Showing posts with label जंगल. Show all posts

Saturday, May 13, 2017

हमारे पूर्वज


हमने बनाया घर 

जंगलों में
उनके घर मे घुसकर
आक्रमण से
अपने सुंदर भविष्य हेतु

आज जब 
वे, हमारे पूर्वज माने जाने वाले
अपने घर मे प्रवेश 
करने का कर रहे हैं प्रयास
तो निषेधाज्ञा लगाई जा रही है

पहिया चल रहा है
खेल जारी है
अभी कई अध्याय लिखे जाने हैं

हम उनके घर में हैं
या
वे हमारे घर मे

Thursday, February 14, 2013

मैं इतना सोच सकता हूँ - 13

61

मैं सुनना चाहता हूँ गीत मंगल और सुमंगल के
है जीवित हो चुकी आशा बृहद विस्तार जंगल के
मेरे विश्वास में कोई कमी होगी तो क्यों होगी
मैं इतना सोच सकता हूँ सधे संवाद जंगल के

62

मैं पड़ना चाहता हूँ पुस्तकें स्नेह वंदन की
सरल हो व्याकरण उपयोग तम गंध चंदन की
मगर क्यों द्वेष भरती पुस्तकें बाज़ार होती हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ लगी क्यों आस बस धन की

-------------------------------------------

Thursday, December 13, 2012

जंगल में मनुष्य

देखे
कुछ मनुष्य
जानवरों के शहर में

मदमस्त हाथी
भौंकते कुत्ते  
दहाड़ते शेर
गुर्राते भालू

गर्भवती बकरी
रंग बदलते गिरगिट
रंभाती गाय
हिनहिनाते घोड़े
मिमियाती बिल्लियाँ

टरटराते मेंढक
रेंगते कछुए
फुफकारते सांप

भिनभिनाती मधुमक्खियाँ
कावं-कावं करते कौए
गुटरगूं करते कबूतर
चिंचिहाती चिड़ियाँ

'जब आती है मौत
गीदड़ की
तो भागता है
शहर की ओर'

निहारते गीदड़
भीगी बिल्ली
खूनी शेर
एक सन्नाटा
शांति का शोर

देखे
कुछ मनुष्य
जानवरों के शहर में
इस गाँव के मध्य
मेघों के घर में
या
इस शहरनुमा गावं में

जंगल में
क्यों घुस आयें हैं
कुछ मनुष्य
जानवरों के भेष में।


(18 Oct  2011 सुबह, जब मैं व मेरी पत्नी  टहल रहे थे, विश्वविद्यालय के एक  वरिष्ठ अध्यापक ने मुझसे हंसते हुए पूंछा 'आपने किसी मनुष्य को देखा टहलते हुए', उनका  इशारा उनके अन्य साथियों से था जिन्हें वो खोज रहे थे।  उनका यह वाक्य इस कविता का प्रेरणा-स्रोत बना। धन्यवाद प्रोफेसर शुक्ला)

Thursday, September 27, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 8


44

मैं सूरज को बुलाता हूँ मुझे जब सांझ लगती है
मगर सब शुष्क मूल्यों सी धरा भी बाँझ लगती है
अजब मौसम गजब वर्षा अजब गर्मी गजब सर्दी
मैं इतना सोच सकता हूँ मुझे क्यों सांझ लगती है

45

मुझे जंगल सुहाता है सभी को खग बताता है
मगर फिर भी पहन कपडे आदमी कह्कहता है
जनम से जानवर होकर मनन से जानवर होकर
मैं इतना सोच सकता हूँ क्यों हर पशु सर झुकाता है

46

मैं सबसे प्रेम करता हूँ मुझे स्नेह भाता है
नहीं कोई मेरा दुश्मन सभी से अच्छा नाता है
सही हों पग सही हो पथ सही गन्तव्य सही जो जग
मैं इतना सोच सकता हूँ मुझे जीवन सुहाता है

18.7.12 Shillong
===========
i.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 7  (38-43 CLICK HERE)

ii.   मैं इतना सोच सकता हूँ  - 6 (28-37 CLICK HERE)

iii.  मैं इतना सोच सकता हूँ  - 5 (25-27 CLICK HERE)

iv.  मैं इतना सोच सकता हूँ -      (24 CLICK HERE)

v.   मैं इतना सोच सकता हूँ -      (23 CLICK HERE)

vi.   मैं इतना सोच सकता हूँ -  4 (20-22 CLICK HERE)

vii.   मैं इतना सोच सकता हूँ -     (19 CLICK HERE)

viii.   मैं इतना सोच सकता हूँ -    (18 CLICK HERE)

ix.    मैं इतना सोच सकता हूँ -     (17 CLICK HERE)

x.     मैं इतना सोच सकता हूँ - 3 (12-16 CLICK HERE)

xi.    मैं इतना सोच सकता हूँ -  2 (7-11 CLICK HERE)

xii.   मैं इतना सोच सकता हूँ  - 1  (1-6 CLICK HERE)