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Tuesday, March 26, 2013

होली २०१३

68

ये फागुन की हवाएँ कह रहीं हैं देख मुझको सुन
ये खिलते फूल सरगम साज मे है ख़ुशबुओं की धुन
कहीं होली के रंगों से कोई आँचल बचा है क्या
बस इतना सोचता हूँ अवगुणों मे भी कहीं है गुण

69

सभी रंग जिस्म पर चढ़कर सफेदी छोड़ देते हैं
कि जैसे पूर्वजो के पिंड हथेली छोड़ देते है
ये जीवन रंग जमकर इंद्रधनुषों को सजाते हैं
बस इतना सोच सकता हूँ सभी को जोड़ देते हैं

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(47 - CLICK HERE)          (48-50 - CLICK HERE)




Monday, May 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 3

१२.
मेरे सब मित्र अच्छे हैं, मुझे मंजिल दिखाते हैं
मगर फिर क्यों वही मुझसे, सही रस्ता छिपाते हैं
मेरी मंजिल, तिरा निर्णय, तिरा संशय, मेरा रस्ता
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं मंजिल वो पाते हैं.
१३.
मेरे सब बाल पकते हैं, वो बालों को रंगाते हैं
मगर क्यों उम्र को हम, सब प्रकारों से छिपाते हैं
तेरा रुकना, मेरा चलना, तेरा चलना, मेरा रुकना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं हम सोच पाते हैं.
१४.
मुझे आकाश के तारे, चमक कर क्यों बुलाते हैं
अगर उस व्योम मे इतने, मधुर स्वर गुनगुनाते हैं
तेरी आशा, मेरी मंशा, मेरे अपने, मेरी सीमा
मैं इतना सोच सकता हूँ, कि वे क्यों झिलमिलाते हैं.
१५.
मुझे रोना नहीं आता, उन्हे हंसना रुलाता है
मगर निष्प्राण जीवन का, यही चेहरा दिखाता है
तेरी भाषा, तेरे आंसू, तेरी क्रिया, तेरी बोली
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं कुछ साथ जाता है.
१६.
मुझे क्यों नींद आती है, उन्हें क्यों स्वप्न आते हैं
अगर हो कर्म सब अच्छे, निरर्थक अर्थ पाते हैं
मेरी निद्रा, तेरे सपने, मेरी आंखें, तेरी रचना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं अपने बताते हैं.

7 oct 2011, shillong

Saturday, June 25, 2011

शेरुब्त्से में होली

शेरुब्त्से कॉलेज में, होली का त्यौहार
होती भारत मे दिखी, रंगों की बौछार
रंगों की बौछार, कोई है पीला कोई लाल
मुहं में गुजिया दबी है, हाथों मे गुलाल

पहली होली पर दिखा, गुजिया का आभाव
कॉलेज में टीचिंग करो, या फिर गुजिया खाव
या फिर गुजिया खाव, नहीं भारत है प्यारो
जिसको देखो भरो, और पिचकारी मारो

होली पर दुश्मन लगे, मित्रों से भी मित्र
मित्रों के चेहरे लगे, हमें बडे बिचित्र
हमें बडे बिचित्र, गले से हाथ मिलाएं
होली पर तो तनिक, मित्र यों ना शर्मायें

भिन्न रंग तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न प्रदेश
भिन्न भेष तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न हर देश
भिन्न चर्म तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न है मर्म
भिन्न वस्त्र तो क्या हुआ, भिन्न-भिन्न है धर्म
भिन्न-भिन्न है धर्म, मगर है एक धर्म ही शेष
सब धर्मों मे एक है, मानव धर्मं विशेष

भारतियों की संस्कृति, रंगों की झोली
जितना उसमें डालिए, उतनी कम बोली
जाने पर आता हमे, कब आये होली
हमको लगता दोस्तों, होनी थी हो ली...

(27 Sept 1994 - Room No 26, Exam Duty, 11 AM, Sherubtse College, Kanglung, Bhutan)

Thursday, March 17, 2011

होली 2011

होली  का  हो  हुल्लड़
हाथ  में  हो  कुल्ल्हड़
गाल  पे  हो  गुलाल
नीला,  पीला  और  लाल

हम  सब  झूमें
मस्ती  में  नहायें
प्यार  की  भाषा
सब  सुने  और  सुनाएँ 

छोटी  ही  हो  गोली
नयी  सी  हो  होली
नई  नई सम्भावनायं
सभी  को  होली  की  शुभकामनाएं  .....
शिलांग .... 17 मार्च 2011....