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Saturday, December 6, 2025

रिश्ते 37

रिश्तों का गणित
अनूठा होता है
जहाँ
बताना और जताना
गिनाना और दिखाना
बातचीत का केंद्र होते हैं
तराजू लिए लोग
नापने-तोलने में व्यस्त रहते हैं
और दूर बैठे रिश्ते
उन पर मुस्कराते हैं
उन पर तरस खाते हैं
और अपना पता बदल लेते हैं
रिश्ते केवल जीवित दिखाई देते हैं
उनमें जीवन होता नहीं है
रिश्ते अपनी गति अनुसार
नियमानुसार
चलते रहते हैं
निर्जीव

बहुत कठिन होता है 
यह जानना
कौन किसका कितना है
मैं किसका कितना हूँ
क्या वो भी मेरा उतना है

उतना-कितना 
मेरा-उसका
रिश्तों में दूरी लाते हैं

बिना किसी जीवन के
ऐसे रिश्ते चलते तो हैं
पर उनमें रुधिर सूखता जाता है
और हम रुक जाते हैं
रिश्ते चलते रहते हैं

कई बार हम भूल जाते हैं
कि यदि हमको कोई
छोटा दिखाई दे रहा है तो
या तो हम उसे बहुत
दूर से देख रहे होते हैं
या फिर
गुरूर से देख रहे होते हैं
थोड़ा पास जाइए
बैठिए, संभलिये, बात करिए
विस्तार समझिए
गणित से परे 
क्षेत्रफल को जानिए 
फिर निर्णय लीजिए
गुरूर को थूकिये फिर कहिए
कोई छोटा है या बड़ा

तलाश
रिश्तों में जीवन ढूँढने की  

Thursday, April 2, 2020

कोरोना से करुणा की ओर

हम घर से बाजार निकले थे,
सामान जुटाने,
जीविकोपार्जन के लिये,
बाजार ने दिया काम,
काम ने दिखाए सपने,
और सपनों को साकार करने लिए,
भागने लगे हम ।

हम सब,
अपना सब कुछ भूलकर,
परिवार से दूर,
घर से बाजार की ओर,
गाँव से शहर की ओर,
सूक्ष्म से स्थूल की ओर,
मैदान से पत्थर की ओर,
अभाव से प्रभाव की ओर,
कम से अधिक की ओर,
एक से अतिरेक की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
ज्ञान से विज्ञान की ओर,
ज्ञात से अज्ञात की ओर,
स्पर्धा से प्रतिस्पर्धा की ओर,
अनुरोध से आदेश की ओर,
स्वीकृति से प्रतिरोध की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
कम से अधिक की ओर,
छोटे से बड़े की ओर,
रिश्तों से रुपयों की ओर,
योग से प्रयोग की ओर,
उपयोग से उपभोग की ओर,
जीवन से जीविका की ओर,
ठहराव से बहाव की ओर,
धरती से आसमान की ओर,
पूरव से पश्चिम की ओर,
प्रकृति से कृतिम की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

अविराम - विश्राम से परे,
करते रहे दोहन,
साधनों-संसाधनों का,
प्रकृति का,
अपने स्वार्थ हेतु,
अपने हित हेतु,
और, और से भी और की चाह में,
हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

आशाएं व अभिलाषाएं बढ़ती रहीं,
अपनी अपनी कहानियां गढ़ती रहीं,
रोकती रहीं, टोकती रहीं,
जब-जब साहस किया,
जाने का, बहाव से ठहराव की ओर ।

प्रतिभाओं व प्रतिस्पर्धाओं से ग्रसित मन,
उपभोग का आदी शरीर,
आसमान को छूने की तमन्ना,
आकाश से ऊंचे उड़ने का हौसला,
प्रयासों से कमाई पूंजी,
कंधों में समाहित ऊर्जा,
सब कुछ रोकते रहे,
विवश करते रहे प्रयासरत रहने को,
सपनों को साकार करने के लिए,
सपने जो समय के अनुसार बदलते रहे,
और हम, भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

संबंधों से दूर,
जमीन से ऊपर वाहन में, विमान में,
सब कुछ भूल कर,
बाजार के इशारे पर,
सूक्ष्म से बहुत दूर,
पत्थरों के शहर में,
जहां सब कुछ था, अधिक मात्रा में,
स्थूलता में परिलक्षित –
धन, भवन, व सुविधाएं,
यही दिखने वाला, सब कुछ,
और हम, भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

पार करते रहे नदियां,
बहकर और तैरकर, कूदते-फाँदते,
पार किए समंदर, एक नहीं, सात-सात,
मानवीय क्षमताएं हैं अपार,
और अपार है उनका संसार,
सात समंदर पार,
यह ज्ञात हुआ,
एक अज्ञात शहर में ।

विश्वास किए बिना
कि प्रकृति भी लेती है बदला,
अपने तरीके से,
कभी किसी को नहीं मिलता,
भाग्य से अधिक,
और समय से पहले ।

हम घर से बाजार निकले थे,
सामान जुटाने, सौदा खरीदने,
जीविकोपार्जन हेतु,
उस बाजार में जहां सब कुछ बिकता है,
बाजार में सब सामान है,
फिर चाहे
वह रिश्ते हों या हवा पानी,
समय हो या संभावनाएं,
मनुष्य हो या मनुष्यता,
यहाँ सब कुछ चलता है,
मांग-पूर्ति के नियमों के अनुसार,
सब कुछ निर्धारित करता है, बाजार,
मांग-पूर्ति व कीमत,
बाजार के अनुसार,
हर रिश्ते का होता है मूल्य,
हर सामान की होती है कीमत,
जो हम चुकाते हैं,
हम कीमत चुकाते रहे,
और भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

लगने लगा, जब हम चुका सकते हैं कीमत,
तो भागते रहते हैं,
हिरण और चीते, दोनों से तेज,
और यही सब मानकर,
हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
बनकर एक बिचौलिये,
प्रकृति व बाजार के बीच,
प्रकृति ने बनाया मानव,
और मानव ने बाजार,
और अपने अहम में, अपने दम्भ में,
यह साधारण सा समीकरण,
भूल बैठे हम,
अपना दौड़ना जारी रहा,
और उस दौड़ में,
उस अज्ञान के बहाव में,
इतना समय ही नहीं मिला,
कि अपने विवेक का कर पाते प्रयोग  ।

हम दौड़ते रहे, भागते रहे,
जीविकोपार्जन के आगे,
हांफते रहे पर भागते रहे ।

जब हमारी दौड़ ने,
सारी सीमाएं कर लीं पार,
और हम करने लगे प्रयास,
भागते-भागते पहुँचने का,
मंगलग्रह पर,
(कृतिम तकनीकों के द्वारा),
समय ने मिलकर प्रकृति के साथ,
बनाई एक योजना और खड़ी की,
कुछ ऐसी परिस्थिति,
समस्त मानव जाति के समक्ष,
कि हम समझ सकें अपनी औकात ।

आज हम सब भाग रहें हैं,
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए,
आज ली जा रही है, हमारी परीक्षा,
शायद प्रकृति ले जाना चाहती है,
हमें वापस अपने घरों की ओर,
स्थूल से सूक्ष्म की ओर,
पत्थर से जमीन की ओर,
मौद्रिक मूल्यों से मानवीय मूल्यों की ओर,
मशीन से मनुष्यता की ओर,
बाजार से घर की ओर,
शहर से गाँव की ओर,
प्रभाव से अभाव की ओर,
अधिक से कम की ओर,
विज्ञान से ज्ञान की ओर,
उपभोग से उपयोग की ओर,
प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर,
आदेश से अनुरोध की ओर,
प्रतिरोध से स्वीकृति की ओर,
रुपयों से रिश्तों की ओर ।

हम क्या साथ लाए थे,
जब आए थे, घर से बाजार,
हम कितना साथ ले जा रहे हैं,
जब जा रहे हैं, बाजार से घर,
एक अनुभवों की पोटली ।

चलो हम सब अब चलते हैं,
प्रयोग से योग की ओर,
जीविका से जीवन की ओर,
बहाव से ठहराव की ओर,
अज्ञान से ज्ञान की ओर,
आसमान से धरती की ओर,
पश्चिम से पूरव की ओर,
कृतिम से प्रकृति की ओर,
कोरोना से करुणा की ओर ।

प्रकृति शायद ले जाना चाहती है,
हमें वापस,
अपने घरों में,
अपने परिवारों व रिश्तों के बीच,
(जिन्हे हम बाजार आते समय घर छोड़ आए थे),
अपने स्वयं के बीच,
स्वनिरीक्षण हेतु ।

हमने क्या किया प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों का,
हमने उसके द्वारा दी गई स्वतंत्रता का,
कितना बनाया मज़ाक,
और हम समझने लगे,
स्वयं को मालिक,
जुट गए संभावनाएं तलाशने की,
कि कैसे हम बना सकें,
मंगल गृह पर अपना घर ।

आज हम सब छिपे हैं,
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए,
अपने घरों में, अपने बिलों में,
सब कुछ होते हुए भी,
क्या है हमारे पास,
हैं तो मात्र कुछ रिश्ते,
आसपास
या फोन की कान्टैक्ट लिस्ट में,
जिन्हे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता ।

हम सबको ढूढ़ने होंगे रास्ते,
जीवन बचाने के,
इस परीक्षा की घड़ी में,
जीविकोपार्जन से कहीं अधिक,
हम दुखी हों या खुश,
हमें बदलने होंगे,
अपने जीने के तरीके,
बाजार के नियमों से परे,
बाजार के अस्तित्व से इतर,
जहां के लिए हम निकले थे,
सामान जुटाने, सौदा खरीदने,
जीविकोपार्जन हेतु ।

Friday, March 27, 2020

कविता और कहानी - 2

अब नया संचार कविता बन कहानी कह रहा है
भूत की पीड़ा भुलाकर स्वच्छ पानी बह रहा है
अब नहीं विश्राम क्षण भर श्रम नया अध्याय लिखता
मृदुल भाषा सरल सब जन सजग संबल कह रहा है


जब किसी का रास्ता रोका गया है गालियों से
जब कभी बांटा गया है घर चुभी सी जालियों से
मिट गये रिश्ते मिटी विश्वास की संभावनाएं
जब कभी भी खुशबुओं को दूर रखा मालियों से


कौन सी कविता बिना श्रृंगार के सजती नहीं है
कौन सी है धुन बिना संगीत जो रचती नहीं है
कौन सा वह गीत जिसमे दर्द का दर्शन नहीं है
कौन है वह कवि जिसे संवेदना कहती नहीं है


तालियों का ज्वर कभी भी उम्र भर रहता नहीं है
ज्यों पके फल से लदा हर पेड़ कुछ कहता नहीं है
बोलना लिखना समझना ध्यान से चलना सिखाना
ज्यों लिखा हर शब्द अपनी उम्र से थकता नहीं है

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कविता और कहानी - 1

Tuesday, March 24, 2020

कविता और कहानी - 1

आजकल कविता भुलाकर मैं कहानी लिख रहा हूँ
भूलकर बचपन बुढ़ापा मैं जवानी लिख रहा हूँ
शब्द लय से हट गए हैं गद्यमय लेखन हुआ है
कुछ नहीं संकोच सीधी सी रवानी लिख रहा हूँ

क्यों विरोधाभास अब अभिव्यक्त हो बस हंस रहा है
क्यों भला मस्तिष्क मेरा नई विधा में फंस रहा है
किस विनय को कर्ण मैं दूँ कारकों को साथ मानूं
ज्ञान से मेरे परे हो ध्यान चपलक धंस रहा है

कलम रुककर कह रही है क्यों नहीं विश्राम करते
कुल स्याही जम गई है उम्र भर अविराम बहते
पृष्ठ पीड़ा से व्यथित हो लड़ रहे हैं उंगलियों से
प्रेरणा की घनिष्ठता का पृष्ठ ही परिणाम सहते

क्यों अधूरी छोड़कर कविता, विधा का रूप बदला
क्यों अधूरा साथ देकर यों हवा का रुख बदला
कल्पना के स्वर स्वतः ही स्वप्न बन कर घूमते हैं
क्यों भला संदर्भ वंचित साथ संचित रूप बदला

कुल विषय विस्तार वर्णन बंधनों से मुक्त होकर
सृजन शक्ति सुगम आशय सुलभता से युक्त होकर
जंगलों में झाड़ियों से झूझती है कलम मेरी
उस सुबह की है प्रतिक्षा अड़चनों से मुक्त होकर

Wednesday, January 15, 2020

दिल्ली की ठण्ड

धूप व्योम से झांक रही है
जीना अब बदहाल हो गया 
कैसा सबका हाल हो गया
दिल्ली नैनीताल हो गया 

कैसे यह मौसम निकलेगा 
किनके सपनों को निगलेगा 
कंधा ही अब ढाल हो गया 
जीना अब बदहाल हो गया 
दिल्ली शिमला माल हो गया 

बर्फ़ जम गयी बिस्तर पर अब 
कम्बल रह गए अस्तर भर अब 
मफलर अब रूमाल हो गया 
दिल्ली शिमला माल हो गया 
दिल्ली नैनीताल हो गया 



ठंड खिंच गई सिकुड़ गए हम
धुँध सड़क पर अन्धकार सम
दिल्ली भर फुआल हो गया 
जीना अब बदहाल हो गया 
दिल्ली शिमला माल हो गया 
दिल्ली नैनीताल हो गया 

बस वसंत का इंतज़ार है 
शिशिर विदा की अब बयार है 
चैत शुरू का काल हो गया 
वर्णन माया-जाल हो गया 

दिल्ली शिमला माल हो गया 
दिल्ली नैनीताल हो गया

=====

Tuesday, November 12, 2019

हौसला


यों उड़ाकर टोपियों को खुश हुए ऐसा लगा,
पा गए मंज़िल मगर गंतव्य अब भी दूर है;
हौसला तुमको, तुम्हारे जोश को जीवित रखे,
भाग्य लिखने में तुम्हे आनंद जो भरपूर है।

Saturday, June 29, 2019

मायका - 3

मायके में कभी बचपन
बिखरा नहीं होता
संगठित होता है

मां उसको
अपने हृृृदय के
लॉकर में
बड़े पीतल के ताले में
बंद कर के रखती है

जिसकी चाबी
वो बहुत संभाल कर रखती है
कभी किसी को नहीं देती है

यह ताला
उतना ही मजबूत होता है
जितना उसका इरादा
उसका संकल्प
परिवार को एक कड़ी में
बांधे रखने का

और शनै शनै
जब नाती - नातिन,
पोते - पोतियां होते हैं

उनके सामने
धीरे धीरे ताले खुलते हैं
मां चाबी घुमाती है

सारा संगठित बचपन
मां की आंखों से
बच्चों की संवेदना तक
संप्रेषित होता है
धुलता है (मां की आंखों से)
खुलता है

बचपन मायके में
बिखरा हुआ नहीं
संगठित होता है

Saturday, June 15, 2019

मायका - 2

बहुत कुछ छोड़ आए हैं
मायके में
हम सब
अच्छी सी
दिखने वाली दुनिया
की तलाश में

क्या बचपन था
रोटी पर घी था
दूध में चीनी थी
आम की खुश्बू
कितनी भीनी थी

अब
कितना कुछ फीका है
जिंदगी जीने का
यही सलीका है

यह ससुराल है
वह मायका

Monday, June 10, 2019

मायका - 1

1

जैसे किसी समय में
होती थी
लड़की की विदाई
आंखें नम होती थीं
माता पिता, भाई बहन
और
सभी घरवालों की
नाते - रिश्तेदारों की

उसी तरह
लड़कों की भी
होती है विदाई
आज
मां बाप, भाई बहन
और घरवाले
रोते हैं
इस विदाई पर भी

मायका
लड़की का ही नहीं
लड़कों का भी होता है
जहां बचपन से पचपन तक का
संजोया हिसाब
सुरक्षित होता है

पुराने कागज़, यादें
घर की रखी पहली ईंट
दरवाजों के कब्ज़े,
चिटकनियां
और परदे
उसके आकार, प्रकार व रंग

पड़ोसी की चिकचिक
पड़ोसन की भाषा
कौए की कांव कांव
आने की आशा

होली का हुड़दंग
रंग और गुलाल
बोतल वाली पिचकारी
गुजिया, कचरी और पापड़

दिवाली के पटाखे
रंगीन फुलझडियां
धागे पे दौड़ती रेलगाड़ी
गोली से बनता सांप
खील और खिलौने
मोमबत्तियों का मोम
मोम से फिर मोमबत्तियां
बुझे हुए बम
मिठाइयां व मेला
बहनो की राखी
पतंग का उड़ाना
कटना और काटना

रामलीला की रातें
दशहरे का रावण
मिट्टी के भगवान
मेला, फिरकी और बरतन
भीड़, शोर और भगदड़
दशहरे का टीका
मीठा, नहीं फीका

बचपन की यारी
बचपन के खेल
बचपन की बदमाशियां
बचपन के मेल

पतली सी गलियां
गलियों के नुक्कड़
मोहल्ले का हुल्लड़
चाय वाला कुल्हड़
पतंगों वाला मांझा
अपना या सांझा
साइकिल पे चलना
समय का ढलना
सब याद है

मायका
केवल लड़की का ही नहीं
लड़के की भी बुनियाद है

सब छूट गया
मायके में
बस कुछ ही बचा है
ज़ायके में

Saturday, May 4, 2019

नेतृत्व नीति

व्यक्ति यदि व्यवधान का कारण बने तो जान लो
व्यक्ति ही साधन, निवारण, खोज में सहयोग देंगें
तुम अगर सम्राट बन संशय, सघन के साथ होगे
सब तुम्हारी दीप्ति के दोष का प्रयोग होंगे

साथ लो सबको सभी का साथ तुमको प्राण देगा
मान लो इसको इसी से सोच का निर्माण होगा
यदि तुम्हारा 'मैं' तुम्हे वाधित करे स्वीकारने को
मान लेना कट गया जीवन यहीं विश्राम होगा

क्यों हुआ विद्रोह इसको जान लो अच्छा रहेगा
क्यों लगी है आग यदि संज्ञान लो अच्छा रहेगा
कारकों के कारणों को कुछ समय देकर समझना
बिन सजे संवरे धवल दर्पण सभी सच्चा कहेगा

भूल जाओ भूत की भाषा भले 'मैं' रोकता हो
दृष्टि डालो नव तिमिर पर ह्रदय कुछ भी सोचता हो
काठ की कुर्सी किसी के साथ कुल जीवन नहीं है
जामवंतो से हुआ निर्मित भले पद टोकता हो

उठो उठकर रीढ़ को कुछ लोच देकर आंख पोछो
उस अमावस रात का तुम ऋण उतारो हाथ पोछो
पूर्णिमा का चांद अपनी रोशनी संचित किये है
झुको झुककर सूर्य के सम्मुख नया निर्माण सोचो

खोल वाहें खिलखिलाओ हंसो अट्टाहस करो तुम
मिलो मिलकर झूमलो खुलकर जरा साहस करो तुम
नहीं कटु स्मृतियां सदा व्यक्तित्व से संलग्न रहतीं
उठ अंधेरों की विदा का आज दुःसाहस करो तुम

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Saturday, April 6, 2019

मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे - पार्ट 2

24 मार्च 2019 को मैंने इसी शीर्षक से एक कविता पोस्ट की थी, एक मित्र ने अपनी टिप्पणी में यह तीन पंक्तियाँ प्रेषित कीं :  
तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

उपरोक्त पंक्तियों को आगे बढ़ाते हुए एक नई कविता की रचना हो गई -

तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

नव किरण का तेज अपने में दिशा का ज्ञान ले
दे रहा था रोशनी सम्बन्ध कुछ शामिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

कुछ किताबी ज्ञान साझा कर सफलता के शिखर
पा कहां पाया कोई जब तक अथक काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

ढल रहा था सूर्य अपनी रोशनी को बांटकर
आंधियों के हौसले अवरोध के काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

यदि कदम को लडख़ड़ाने से बचा पाओ तो तुम
पा गए सब कुछ सकल जो स्वप्न में हासिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे


[31 मार्च 2019, अजमेर दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस 7:30 शाम]

Thursday, April 4, 2019

मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे - पार्ट 2

24 मार्च 2019 को मैंने इसी शीर्षक से एक कविता पोस्ट की थी, एक मित्र ने अपनी टिप्पणी में यह तीन पंक्तियाँ प्रेषित कीं :
तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

उपरोक्त पंक्तियों को आगे बढ़ाते हुए एक नई कविता की रचना हो गई -

तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

नव किरण का तेज अपने में दिशा का ज्ञान ले
दे रहा था रोशनी सम्बन्ध कुछ शामिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

कुछ किताबी ज्ञान साझा कर सफलता के शिखर
पा कहां पाया कोई जब तक अथक काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

ढल रहा था सूर्य अपनी रोशनी को बांटकर
आंधियों के हौसले अवरोध के काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

यदि कदम को लडख़ड़ाने से बचा पाओ तो तुम
पा गए सब कुछ सकल जो स्वप्न में हासिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे


[31 मार्च 2019, अजमेर दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस 7:30 शाम]




Sunday, March 24, 2019

बीज

बीज के पौधा बनने में
कई रोड़े हैं
जैसे भी हैं
हम सब मात्र यह सोचें
कि थोड़े हैं

पानी का खारापन
बीज के गुणों को
निचोड़े है
खाद ऐसी कि
मट्टी ही नहीं फोड़े है

सारे प्रयास
पौधा-फल-फूल
से जोड़े है
परंतु
बीज के प्रस्फुटित होने में
अभी भी बहुत रोड़े हैं

जल गई रस्सी

जल गई रस्सी नहीं उस गांठ का कुछ रूप बदला
बह गई मिट्टी समंदर का नहीं स्वरूप बदला
आपसी मतभेद में रिश्ते सभी जल राख सूखे
गल गया पत्थर शिखर ने झुक स्वयं जब रुख बदला

मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

लक्ष्य कोई भी नहीं था,
पर दिशा थी, दृष्टि थी;
कर्म था, आनंद था,
प्रण था, संतुष्टि थी;
प्रार्थना के स्वर सरल थे,
भाव कटु,
दाखिल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं
जो दौड़ में शामिल न थे।

बोझ कोई भी नहीं,
बस रास्ता था,
साथ था, संकल्प था;
फूल की खुशबू थी,
स्नेह था, रिश्ते थे,
नहीं विकल्प था;
साथ उनका भी मिला,
जो दृष्टि के काबिल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं,
जो दौड़ में शामिल न थे।

जड़ थी, पेड़ था,
शाखाओं से पत्ते,
झड़ रहे थे;
वृक्ष छाया दे रहे थे,
पक्षियों के स्वर,
कहानी गढ़ रहे थे;
बौर था, आंधी थी, बल था,
पर कभी गा़फ़िल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं,
जो दौड़ में शामिल न थे।

जोर भी पुरजोर था, योद्धा थे,
गुणा पर अढ़ रहे थे;
भूल कर प्रारब्ध को,
छल भाव से,
कहानी गढ़ रहे थे;
तीब्र लहरों के थपेड़े थे,
मगर साहिल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं,
जो दौड़ में शामिल न थे।

Sunday, July 1, 2018

जाले

कमरे के कोने में
किताबों की अलमारी में
चौके में रखे मसाले के डिब्बों के ऊपर
कुर्सी-मेज़ के इर्द-गिर्द

हर उस जगह
हर उस वस्तु के आसपास
जिसका प्रयोग काफी समय से नहीं किया गया है
या
जो हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों से परे है

हर उस रिश्ते में जिसको हम भूल रहे हैं

लग गए हैं जाले

चलिए
उन जालों को साफ करते हैं।

कमरों में झांकते हैं
कोनों को खंगालते हैं
मसालों का स्वाद लेते हैं
किताबों के पृष्ठों को पलटते हैं
थोड़ा कुर्सी-मेज़ को हिलाते हैं

वस्तुओं का प्रयोग करते हैं
या
जिसकी आवश्यकता नहीं हैं
-जिसको उसकी आवश्यकता है-
उसको देते हैं

रोजमर्रा की गतिविधियों में कुछ प्रयोग करते हैं
रिश्तों को पुनर्जीवित करते हैं
उन्हें संभालते हैं

चलिए
जालों को तलाशते हैं
उनको साफ करते हैं।

Thursday, May 24, 2018

प्रतिशोध

क्यों भला प्रतिशोध की ज्वाला लिए तुम जी रहे हो
क्यों दिखाकर द्वेष-भेष घूँट विष का पी रहे हो
नम्रता का भाव लेकर जय विजय नेतृत्व देखो
क्षम्य कृत्यों का लिए क्यों बोझ तुम अब जी रहे हो 

भूल जाओ भूत की भाषा विषय सब सांझ आई
उम्र कोई भी भले हो सुबह सबकी बार आई
घास झुककर चीड़ के सम्मुख खड़ी लहलहा रही है
और धरती पर पड़ी लकड़ी व्यथा पर मुस्कराई

---

Tuesday, March 20, 2018

गन्तव्य

वह नहीं गन्तव्य जिसका ले टिकट हम चल रहे हैं
वह कहाँ है रौशनी जो दीप करते जल रहे हैं
शब्द पक्षी बन हमें दे प्रेरणा घट बैठ हंसते
हम भ्रमित हो ले सहारा मान मंजिल चल रहे हैं

===

Saturday, May 13, 2017

हमारे पूर्वज


हमने बनाया घर 

जंगलों में
उनके घर मे घुसकर
आक्रमण से
अपने सुंदर भविष्य हेतु

आज जब 
वे, हमारे पूर्वज माने जाने वाले
अपने घर मे प्रवेश 
करने का कर रहे हैं प्रयास
तो निषेधाज्ञा लगाई जा रही है

पहिया चल रहा है
खेल जारी है
अभी कई अध्याय लिखे जाने हैं

हम उनके घर में हैं
या
वे हमारे घर मे

Sunday, September 11, 2016

आ जाओ


[चित्र प्रो0 विद्यानंद झा जी की फेसबुक वाल से साभार]

सब छोड़ देते हैं साथ
अपने भी

फिर भी 
लोगों की नज़र 
पड़ ही जाती है

पराये-अपने के भेद से परे

कितनी ख़ूबसूरत थी 
ये दुनिया 
जब तुम्हारा साथ था

हम दोनों कितनो का 
सहारा थे
बरसात में
कड़ी धूप में

अब क्या है 
मेरा अस्तित्व 
तुम्हारे बिना

और तुम्हारा 
मेरे बिना

तुम अब 
उड़ रही होगी 
बिना किसी की
मुट्ठी में बंधे 

आ जाओ

 मैं कष्ट में हूँ
तुम्हारे साथ न होने पर
मुझे ठोकरें पड़ रही हैं
हाथ से सीधे पैरों में आ गिरी हूँ
मुझे अब
ज्ञात हो रहा है
तुम्हारे साथ का महत्व


आ जाओ 
चलो 
फिर से हम खा लेते है 
कसमें साथ मरने-जीने की

आ जाओ


मेरी वेदना पर
कुछ तो तरस खाओ

आ जाओ

====================