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Thursday, July 17, 2014

आंखें

मेरी आंखें झुकेंगी कृत्य
यदि संहार का होगा
मेरी आंखें उठेंगी कृत्य
यदि ना प्यार का होगा
सभी को आँख की भाषा
समझनी चाहिए मित्रो
बस इतना सोचता हूँ
कब यही संसार का होगा

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Friday, December 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 10

51

मैं अंधों को दिखाकर रास्ता संतुष्ट होता हूँ
मगर इन स्वस्थ आँखों की व्यथा पर रुष्ट होता हूँ
नहीं उपलब्ध साधन साध्य फिर भी व्योम छूना  है
मैं इतना सोच सकता हूँ नहीं संतुष्ट होता हूँ

52

मैं अक्सर रात को उठ बैठकर सपने सुलाता हूँ
भरी आँखों से सारी स्रष्टि की रचना भुलाता हूँ
मेरी हर थपथपाहट पर वो सपना मुस्कराता है
मैं इतना सोच सकता हूँ मैं अपना कल सजाता हूँ

53

मैं अँधा हो चुका हूँ देखकर अंधी हुई दुनिया
मेरी आंखें भी ढूँढें हैं कोई क्रेता कोई बनिया
नयी सी रौशनी लेकर कोई बालक बुलाता है
मैं इतना सोच सकता हूँ मेरे कंधे तेरी दुनिया


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Wednesday, October 12, 2011

मैं इतना सोच सकता हूँ

१.
मैं जितना सोच सकता हूँ, वहीँ तक सिर उठाता हूँ
मगर जब आँख दबती है, सभी कुछ भूल जाता हूँ
तेरा चेहरा मेरा दर्पण, तेरा दर्पण मेरा चेहरा
मैं इतना सोच सकता हूँ, तभी तो सर झुकाता हूँ.
२.
मेरे घर लोग आते हैं, मुझे सर पर चडाते हैं
मगर जब आँख दबती है, मुझे सपने सताते हैं
तेरा कहना मेरा सुनना, तेरा सुनना मेरा कहना
मैं इतना सोच सकता हूँ, मुझे मेरे सताते हैं.
३.
मुझे क्यों क्षोभ होता है, उन्हे क्यों लोभ होता है
मगर संयम, नियम, संशय लघु प्रयोग होता है
तेरी बातें मेरी आंखें, तेरी आंखें मेरी बातें 
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं संयोग होता है.
४.
मेरा हर रोम शोभित है, तेरी हर सांस संशित है
मगर वो कृत्य और वो वाण, शब्दशः सुरक्षित है
तेरा कहना मेरा सुनना, तेरा हँसना मेरा सहना 
मैं इतना सोच सकता हूँ, सभी उस ओर संचित है.
५.
मेरी क्यों द्रष्टि विकसित है, मुझे अब बोध होता है
अगर सबका सही हो भूत, कभी ना क्रोध होता है
मेरा कहना, मेरा जगना, मेरा सपना, मेरा अपना
मैं इतना सोच सकता हूँ, जहाँ प्रबोध होता है. 
६.
मुझे हर जीत का कारण, नया प्रतीत होता है
मगर जब हार होती है, नहीं कोई मीत होता है
मेरी श्रद्धा, मेरा आश्रय, मेरी करुणा, मेरा आशय
मैं इतना सोच सकता हूँ, मधुर संगीत होता है.

5-6 oct 2011, navmi/dashmi, shillong

Friday, April 1, 2011

दर्द

उनकी आँखों ने कहा
मेरी आँखों ने सुना
मेरे होठों ने पिया
उनके होठों से गिरा

मेरे हांथों ने सुना
उनके क़दमों ने कहा
उनके गालों पे सजा
मेरे होठों का कहा

एक सन्नाटा सा था
सुबह चिड़िया ने कहा
आँख क्यों दर्द सहे
स्वप्न क्यों दर्द बना.

शिलांग ... १ अप्रैल २०११ ...
       

Saturday, January 22, 2011

तीन रुबाइयां

चश्म आँखों ने सफ़र को देखा
मेरी माँ ने हर कहर को देखा
हर फलसफे से प्यार बढकर है
उनकी आँखों ने इस ज़हर को देखा
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सड़क पर भागते शव को देखा
धुंद मे टिमटिमा पहर देखा
दौडते-भागते कटी हर शब्
रुकते-थकते ये मंज़र देखा
---
भावना आँख से छलकती है
प्यास से रोशनी चमकती है
मेरी बेटी के प्रश्न जैसे हों
उनमे अच्छी सुबह सी दिखती है

(21st Jan 2011, 6:30 AM, travelling from Guwahati to Shillong in Taxi)

Tuesday, November 2, 2010

तुम और मैं

मैं क्यों भूल जाता हूँ
तुम्हारे स्नेह की भाषा
            प्यार की परिभाषा
            आलिंगन का आशय
तुम्हारे शरीर का स्पर्श
            स्पर्श का आकार, प्रकार
            स्पर्श की ऊर्जा
तुम्हारे पैरों की आहट
            आँखों का आमंत्रण           
            आँखों के स्वप्न
            स्वप्नों की उडान
और
तुम्हारे कृत्यों की सीमा
मैं भूल जाता हूँ
क्यों?
...
मैं भूल जाता हूँ
और
फिर भी चाहता हूँ
तुमको स्मरण रहे
तुम ना भूलो
           मेरा प्यार
           मेरी परिभाषाएं
           मेरा आलिंगन व उसका आशय
           मेरा स्पर्श
           मेरी आहट
           मेरी उडान
           मेरी सीमा
मुझको...
...
तुम
तुम हो
और
मैं
मैं
क्यों भूल जाता हूँ मैं....
(Shillong...L-57...2nd Nov 2010...9 AM)

Thursday, September 9, 2010

मेरी आंखें और चश्मा

आंखें क्या क्या देखती हैं?
चश्मे की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
किस समय कौन सा चश्मा?

चश्मा
कभी देखने के लिए
कभी ना देखने के लिए
कभी लोगों को दिखाने के लिए -
            मैं सब-कुछ देख सकता हूँ
            या
            मैं कुछ नहीं देख सकता

कभी यह भी दिखाने के लिए कि -
             मैं क्या हूँ
             मै क्या नहीं हूँ
चश्मा -
सब कुछ देख सकता है
चश्मा -
कई बार आँखों को विश्राम देता है
कई बार उसकी नग्नता को भी
इसलिए कि समय पडने पर,
नग्न होने पर
साफ़ और स्वच्छ रूप से देख सके

चश्मा -
देखने की गति बड़ा देता है
कई बार
चश्मा सब कुछ देख सकता है
यदि इस आशय से पहना जाये
चश्मा कुछ नहीं देख सकेगा
यदि इस आशय से पहना जाये
महत्वपूर्ण है
आशय
जो बदल भी सकता है
समय के साथ
परिस्थितियों के साथ
आप देखना चाहते हैं
या नहीं?

नग्न आंखें देखती हैं
वह भी - कई बार
जो देखना नहीं चाहते.
कई बार
नहीं देख पाती हैं
जो देखना चाहते हैं.
नग्न आंखें - नग्न हैं
आशय के महत्व से परे
          नग्न आंखें क्या क्या देखती हैं
          नग्न आंखें सब कुछ देख सकती हैं
          सब कुछ देखती हैं
आंखें
झुकी हुई या उठी हुई
खुली या बंद
हंसती या रोती
कटी या फटी
शांत या अशांत
अपना कहना कहतीं हैं
अक्सर
चुप रहती हैं, शांत रहती हैं
अपना कहना कहती हैं
चीखती हैं, चिल्लाती हैं
अपना कहना कह जाती हैं
अक्सर
वाणी के बिना.

नग्न आंखें सब कुछ देख सकती हैं
सचमुच
काफी कुछ कह भी सकती हैं
वाणी के बिना.

आँखों की ध्वनि/आवाज
देखी जा सकती है - सुनी नहीं
अक्सर
देखना सुनने से अधिक
महत्वपूर्ण होता है.
विश्वास
देखने पर या सुनने पर - ?
नग्न आंखें बोलती हैं
अक्सर
वाणी के बिना.

अश्रु
आँखों का कहना कहते हैं
अपने समय पर बहते हैं
ख़ुशी मे हंसकर
दुःख मे फंसकर
बहुत कुछ सहते हैं
आँखों का कहना कहते हैं
एक माध्यम बनकर.

अश्रु का समय पर ना आना
किसी अभाव को प्रदर्शित करता है
उस व्यक्ति के मनोभाव को
चित्रित करता है
आंसुओं का समय पर ना आना
मौन रहकर
प्रयास करता है
कुछ कहने का
सब-कुछ सहने का
परन्तु
अश्रु का ना बहना
स्वयं एक माध्यम बन जाता है
कुछ कहने का
और कह जाता है
अक्सर
वाणी के बिना
प्रायः:
व्यक्ति करता है यही आशा
कैसे भी समझ सके
अश्रुओं की भाषा.

आंखें, चश्मा और अश्रु
चश्मा
आँखों पर
कई बार
अश्रुओं को आश्रय देता है
ना दिखा सके वह
जो दिखाना नहीं चाहती है
आंखें
ना कह सके वह
जो कहना नहीं चाहती हैं
आंखें -
आंखें
सब कुछ देखती हैं - देख सकती हैं
सब कुछ कहती हैं - कह सकती हैं
सब कुछ बोलती हैं - बोल सकती हैं
अश्रुओं की पीड़ा के परे
अक्सर
वाणी के बिना
शब्दों के बिना.

(28th Sept 1994, Room No 27, Sherubtse College, Kanglung, Bhutan, 4:20 PM)

Saturday, May 29, 2010

आशय

उनके चुप से नहीं समझना
                वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
                बस्ते खोल नहीं सकते हैं

मेरे चुप से नहीं समझना
                मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
                होठों को खोल नहीं सकता हूँ

इक महिला की खातिर तुमने
सारे नियम तार कर दिए

                इक सदस्य के कह देने से
                छै पर तुमने वार कर दिए

उडिया और गुडिया की सरगम
हम सब झेल नहीं सकते हैं
वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
बस्ते खोल नहीं सकते हैं

उनके चुप से नहीं समझना
                वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
                बस्ते खोल नहीं सकते हैं

तेरे कन्धों की पीड़ा को
मेरा चश्मा देख रहा है
                तेरे सम्बोधन का आशय
                सबकी आंखें खोल रहा है

चश्मे से वो दिल तक पहुंचे
ऐसा बोल नहीं सकता हूँ
मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
होठों को खोल नहीं सकता हूँ

मेरे चुप से नहीं समझना
                 मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
                 होठों को खोल नहीं सकता हूँ

Wednesday, May 5, 2010

नाक

नाक कभी उठती है, कभी झुकती है
नाक कभी रूकती है, कभी बहती है
नाक कभी लाल होती है, कभी पीली होती है
नाक कभी सूखती है, कभी गीली होती है.

नाक के नीचे मुहं होता है,
जो अधिकतर चुप, सोता है
नाक के ऊपर दो आंखे होती हैं
जो अक्सर बंद, सोतीं हैं

जिसका मुहं बंद रहता है,
और आँख सोती है
मित्रों ऐसों की नाक
शूर्पनखा की होती है....

Friday, April 9, 2010

EYES AND LOVE

The expression of Love
need no words,
having no language of its own.
But it turns them down
when it is shown.

The very feeling
brings the two together,
when the eyes speak
without uttering a single word,
without any physical advances,
even without chances.
When the eyes speak.

The cascade,
Oh!
That beautiful lake beside.
An island addressing the two,
side by side.

Penetrating my body
with the sound of love
and unknown breeze,
again the same sound of love,
no voice, no noise.

Speaking to my Love in eyes.
Eyes can speak no wrong,
though without words.
Eyes can express
nothing but Love.
Eyes can see no evil,
evil of action.

My dark brown eyes,
express something,
I wish it never dies.

(12th Sept 1997 at 11:45pm)
also available at: http://www.poetry.com/poems/eyes-and-love/7065251/