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Friday, March 21, 2014

जड़

देखो
नई नवेली
मांग भरी दुल्हन समान
सड़क
रंग भेद से परे
करीने से छोड़े गए
हाशिए के साथ

देखो
ध्यान से देखो
उसपर जहाँ-तहां
उगती झांकती घास
बुलडोज़र से
कुचले जाने के बाद भी

कोमल घास जीवंत है
मानो कह रही हो
सीधे-साधे मजदूर
कभी नहीं
खोदते हैं
काटते हैं
किसी की जडें
जब तक
न निर्देशित किया जाये
मालिकों के द्वारा
किसी की जड़ों को
खोदने
या
काटने के लिए

Monday, May 17, 2010

परिचय

परिचय,
किसका, क्यों, किस हेतु,
किस प्रकार
अर्थात
कैसे
व्यक्ति
स्वयं मे स्वयं
एक परिचय है,
उसका नाम
मात्र
पहचान के लिए है;
यदि खो जाये
तो नाम से
ढूँढा जा सके.
कक्षा में नाम से
पुकारा जा सके
प्रकाशित हों सके
समाचार पत्र में.
पिता का नाम
उसके अस्तित्व
से सम्बंधित है,
महत्त्वपूर्ण भी है.
प्रश्न उठता है,
व्यक्ति को
किस नाम से जाना जाता है,
उसके नाम से
या फिर
उसके पिता के नाम से
वास्तविकता यह है
कि एक दूसरे के पूरक हैं
यह दो
परिचयसूत्र,
क्योंकि
कभी
पुत्र, पिता के नाम से जाना जाता है
कभी
पिता, पुत्र के नाम से.
अभिप्राय
सीमा लांघने से है
कौन, किसकी, किस तरह
और कब
सीमा लांघता है...


(२९ अगस्त १९९१, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश - उत्तराखंड)

Wednesday, April 7, 2010

AN IRONY

Oblivious of the harsh realities
of existence.
Pulling on,
Without making much sense.

Witnessing the fading-off
of the clouds,
leaving no footprints.
Observing equable mental climate,
without advancing any hints.

Devoting
best of time,
Irrigating barren land,
not knowing the fence.
Watching,
clear and clean sky,
Sickle like moon.
Climate of opinion,
splitting how soon.

Decoding the presence
of thought,
of yesterday.
Trying to apply it
for future,
I know they may.

Considering the attitude
for tomorrow,
yet hence.
Oblivious of the harsh realities
of existence.

(22nd November, 1998 / Kanglung, Bhutan: 7:40 pm)