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Thursday, July 3, 2014

भवन प्रतीक्षा में है

भवन का द्वार
प्रतीक्षा में है
कोई आए
उस पर लगी जंग हटाये
उसको खोले, सहलाये
उस पर जमी धूल पर
अपने निशान लगाये
अपनी उपस्थिति पंजीकृत कराये
कोई आए

भवन का बगीचा
प्रतीक्षा में है
कोई आए
मिटटी खोदे
क्यारियां बनाये
कोई आए
आशा के बीज बोए
फूलों से इस बगीचे को सजाये
कोई आए

किन्ही निर्देशों के अभाव में
भवन के माली
हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं
बीज और खाद की प्रतीक्षा में
कोई आए

भवन की दीवारें, दरवाजे व खिड़कियां
अपनी विवशता में रो रही हैं
प्रतीक्षा कर रही हैं
किसी नवीन स्पर्श की
चटकनियां रुष्ट हैं
उनको खोलना आसान नहीं होगा

भवन के पर्दे रोष में हैं
किसी भी प्रकार के वायु प्रबाह का
कोई प्रभाव नहीं है उन पर
खिड़कियों-दरवाजों ने
उनको जकड़ रखा है
(विश्वविद्यालयी नियमो-अधिनियमों की भांति)
परदे भूल गए हैं हिलना

भवन प्रतीक्षा में है
कोई आए

भवन की चल संपत्ति
कुछ डरी हुई है
चल अलमारी, सोफा, कुर्सी, मेज
इत्यादि सब
कुछ डरे हुए हैं
कहीं भवन का नया मालिक
उनको तिरस्कार की दृष्टि से न देखे

भवन में
किसी के न होते हुए भी
भवन की गाड़ी चल रही है
विश्वास कीजिये
भवन की गाड़ी चल रही है
संस्थान की गाड़ी भी चल रही है
मालिक की अनुपस्थिति में भी
भवन की गाड़ी चल रही है
परन्तु फिर भी
भवन प्रतीक्षा में है
कोई आए

भवन परिसर में लगे पेड़
किसी प्रभाव
व अभाव से परे
मस्त हैं
झूम रहे हैं
न तो इन्हें प्रतीक्षा है
मालिक की
न ही किसी माली की
और न ही उनका अस्तित्व
खतरे में है
(पौधों की तुलना में)
पेड़, पेड़ है
प्रकृति पर निर्भर पेड़
किसी भी मानवीय स्पर्श की
चेतना से परे

रौंदा तो पौधों को जाता है
बदल दिया जाता है
मौसमानुसार
अच्छे फूलों की आशा में
मौसमी फूलों की आशा में
बहुत से पौधों को
नहीं बनने दिया जाता है पेड़
उनमे पेड़ बनने की पूरी क्षमता
होते हुए भी
माली मात्र
मालिक के निर्देशों का पालन करते हैं
स्वेच्छा के विरुद्ध

मिटटी प्रतीक्षा में है
कोई आए

इतना बड़ा भवन
कितना छोटा हो जाता है
बड़े-बड़े पेड़ों के होते हुए भी

भवन प्रतीक्षा में है
कोई आये
इसको
अपनाये
सजाये
महकाए
इसका हो जाये
कोई आए

भवन अनभिज्ञ है
कि
भवन की गाड़ी चल रही है

(पिछले एक वर्ष से किसी स्थाई कुलपति के अभाव से विश्वविद्यालय में वर्तमान में चल रहे गतिरोध व महत्वपूर्ण निर्णयों में हो रहे विलम्ब को समर्पित इस कविता का जन्म कुलपति निवास के सामने से निकलते चलते हुआ) 

Wednesday, January 11, 2012

मकान की तलाश

मैं ढूँढ रहा था
एक मकान
राजधानी समीप
इस पथरीले जंगल में


मैं ढूँढ रहा था
गीली मिटटी
कुछ कण रेता
कुछ फूल, पत्ते और पेड़
सूरज और धूप
चंदा और चांदनी
चहचहाती चिड़ियाँ
नीला आकाश

मुझे मिले
कुछ अदद जानवर
दलालों के रूप में
पक्का सीमेंट
अटूट रिश्तों सा
पैसे से
पैसे के रिश्ते
रिश्तों के पैसे
फूल सी भाषा
काँटों सा व्यवहार

मुझे मिला
धुंधलीला आकाश
मिली
कीचड
प्लास्टिक के पत्ते
चमचमाते सिक्के
इस
राजधानी समीप
पथरीले जंगल में
इस
सब्जी बाज़ार में
जहाँ
आलू, मकान और माल
मे कोई अंतर नहीं है

मुझे ज्ञात हुआ
उतना घातक नहीं होता
मकान का बाज़ार मे होना
जितना घातक होता है
बाज़ार का मकान में होना


इस पथरीले जंगल मे
कुछ मकानों मे घर है
कुछ मे मात्र बाज़ार


इस
जंगल के जानवर
कर रहे हैं
इन मकानों की सुरक्षा
बेहतर बाज़ार की
प्रतीक्षा में

व्यापार
रोज़गार, व
बाज़ार
सब कुछ इस
पथरीले जंगल मे है

मेरी तलाश जारी रहेगी
जारी रहेगा
मोल-भाव, नाप-तोल, लेन-देन
जानवरों के साथ
कब बाज़ार देगा
मुझे एक मकान
और कब
मैं बनाऊंगा
उस मकान को
घर.

7 Jan 2012, Intercity express, delhi to bareilly, 9 pm