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Sunday, September 7, 2025

रिश्ते 36

रिश्तों का गणित
अनूठा होता है
हिसाब-किताब
जोड़ना-घटाना
गुणा-भाग
मोल-भाव
लेना-देना
यह सब
रिश्तों को कमजोर करता है
फिर भी
प्रायः जोड़ना-घटाना ही
रिश्तों का मापदण्ड होता
प्रतीत होता है

रिश्ते परे होते हैं
किसी भी गणित से
जोड़ना-घटाना
जहाँ एक ओर
रिश्तों की नींव
कमजोर करता है
वही रिश्तों को
पत्थर बना देता है
रिश्तों की परिधि
रिश्तों के घनत्व को
प्रभावित करती है
रिश्तों की ज्यामिति
प्रकार और पैमाने से इतर होती है
रिश्तों का मूल और ब्याज
रिश्तों के मूल्य, निवेश और प्रत्याय
से बहुत भिन्न होता है
मूल्य, क़ीमत और मोल-भाव
रिश्तों के मूल को
बहुत प्रभावित करता है
मूल की कोई क़ीमत
कभी हो ही नहीं सकती

मोलभाव में उलझे रिश्ते
अभाव व प्रभाव के माध्यम से
रिश्तों को प्रभावित करते हैं
और नकारात्मक विचारों को
जन्म देते हैं

अभाव का अनुभव
और अनुभव का अभाव
सारी गणित
इन्ही के मध्य
चलती रहती है

दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है
व्यक्तित्व के बनाने में
रिश्तों को बनाने में, सजाने-संवारने में
अभाव का अनुभव
सशक्त बनाता है
जड़ों को मज़बूत रखता है
दृष्टिकोण को
परिपक्व बनाता है
तो अनुभव का अभाव
परिपक्वता से दूर रखता है
अक्सर
अपरिपक्वता भी मददगार होती है
रिश्तों को सुधारने में
रिश्तों को बचाने में
अनुभव का अभाव
कई बार व्यक्ति को धरातल पर रखता है
उड़ने से रोकता है

अपने सरल-सहज-नैसर्गिक स्वरूप में
बिना किसी कृतिमता के
रिश्ते चलते रहते हैं

Wednesday, April 24, 2024

रिश्ते 30

गाँठ या यों कहें ग्रंथि
रिश्तों के जीवन में
बाधा भी बनती हैं
और स्वावलोकन का कारण भी,
बेहतर इंसान बनने की ओर
प्रेरित भी करती हैं,
और अहंकार में लिप्त रहने की
ओर खींचती भी हैं।
गाँठे हमेशा अपने रूप को
बदलती हैं,
अनुभव व समय के साथ,
सकारात्मक सोच
व रिश्तों की प्रगाढ़तावश।
परंतु यदि
अपने दम्भ में ग्रसित मानसिकता
व्यक्ति पर हावी होती जाती है
तो यही ग्रंथि
और कठोर हो जाती है,
और शरीर के राख होने तक
उसकी कठोरता जस की तस रहती है।
गाँठ को सरल करने
व उसके स्वरूप को कठोरता से
कोमलता के रास्ते होते हुए
सहज भाव से खोलने की प्रक्रिया में
किसी न किसी को झुकना होता है,
रिश्तों को नैसर्गिक
एवं सुचारु रूप से
जीवित रखने की ख़ातिर।

रिश्ते 29

रिश्तों की ऊन 
बहुत गरमाहट देती है.

रिश्तों की ऊन से
हाथ द्वारा बने स्वेटर,
किसी भी सर्दी में
गरमी का एहसास देते हैं,

स्वेटर बनाने वाले
और
पहनने वाले के रिश्ते
ऊन से बंधे रहते है
एक सिरे से दूसरे सिरे तक.

किसी भी रंग, क़िस्म
और क़ीमत पर,
रिश्तों का रंग
हावी होता है.

ऐसे स्वेटर पीढ़ी दर पीढ़ी
पहने जाते है.

रिश्तों की ऊन
बांधे रहती है
पीढ़ियों को.

कई बार
उधेड़े भी जाते हैं
ऐसे स्वेटर
और नये रूप में,
नये फैशन के,
नये आकार और प्रकार
में बदल दिये जाते हैं.

रिश्तों की ऊन
बहुत गरमाहट देती है.

आजकल
ऐसे रिश्ते, ऐसे स्वेटर
कम ही दीखते हैं.

Thursday, April 2, 2020

कोरोना से करुणा की ओर

हम घर से बाजार निकले थे,
सामान जुटाने,
जीविकोपार्जन के लिये,
बाजार ने दिया काम,
काम ने दिखाए सपने,
और सपनों को साकार करने लिए,
भागने लगे हम ।

हम सब,
अपना सब कुछ भूलकर,
परिवार से दूर,
घर से बाजार की ओर,
गाँव से शहर की ओर,
सूक्ष्म से स्थूल की ओर,
मैदान से पत्थर की ओर,
अभाव से प्रभाव की ओर,
कम से अधिक की ओर,
एक से अतिरेक की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
ज्ञान से विज्ञान की ओर,
ज्ञात से अज्ञात की ओर,
स्पर्धा से प्रतिस्पर्धा की ओर,
अनुरोध से आदेश की ओर,
स्वीकृति से प्रतिरोध की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
कम से अधिक की ओर,
छोटे से बड़े की ओर,
रिश्तों से रुपयों की ओर,
योग से प्रयोग की ओर,
उपयोग से उपभोग की ओर,
जीवन से जीविका की ओर,
ठहराव से बहाव की ओर,
धरती से आसमान की ओर,
पूरव से पश्चिम की ओर,
प्रकृति से कृतिम की ओर ।

हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

अविराम - विश्राम से परे,
करते रहे दोहन,
साधनों-संसाधनों का,
प्रकृति का,
अपने स्वार्थ हेतु,
अपने हित हेतु,
और, और से भी और की चाह में,
हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

आशाएं व अभिलाषाएं बढ़ती रहीं,
अपनी अपनी कहानियां गढ़ती रहीं,
रोकती रहीं, टोकती रहीं,
जब-जब साहस किया,
जाने का, बहाव से ठहराव की ओर ।

प्रतिभाओं व प्रतिस्पर्धाओं से ग्रसित मन,
उपभोग का आदी शरीर,
आसमान को छूने की तमन्ना,
आकाश से ऊंचे उड़ने का हौसला,
प्रयासों से कमाई पूंजी,
कंधों में समाहित ऊर्जा,
सब कुछ रोकते रहे,
विवश करते रहे प्रयासरत रहने को,
सपनों को साकार करने के लिए,
सपने जो समय के अनुसार बदलते रहे,
और हम, भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

संबंधों से दूर,
जमीन से ऊपर वाहन में, विमान में,
सब कुछ भूल कर,
बाजार के इशारे पर,
सूक्ष्म से बहुत दूर,
पत्थरों के शहर में,
जहां सब कुछ था, अधिक मात्रा में,
स्थूलता में परिलक्षित –
धन, भवन, व सुविधाएं,
यही दिखने वाला, सब कुछ,
और हम, भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

पार करते रहे नदियां,
बहकर और तैरकर, कूदते-फाँदते,
पार किए समंदर, एक नहीं, सात-सात,
मानवीय क्षमताएं हैं अपार,
और अपार है उनका संसार,
सात समंदर पार,
यह ज्ञात हुआ,
एक अज्ञात शहर में ।

विश्वास किए बिना
कि प्रकृति भी लेती है बदला,
अपने तरीके से,
कभी किसी को नहीं मिलता,
भाग्य से अधिक,
और समय से पहले ।

हम घर से बाजार निकले थे,
सामान जुटाने, सौदा खरीदने,
जीविकोपार्जन हेतु,
उस बाजार में जहां सब कुछ बिकता है,
बाजार में सब सामान है,
फिर चाहे
वह रिश्ते हों या हवा पानी,
समय हो या संभावनाएं,
मनुष्य हो या मनुष्यता,
यहाँ सब कुछ चलता है,
मांग-पूर्ति के नियमों के अनुसार,
सब कुछ निर्धारित करता है, बाजार,
मांग-पूर्ति व कीमत,
बाजार के अनुसार,
हर रिश्ते का होता है मूल्य,
हर सामान की होती है कीमत,
जो हम चुकाते हैं,
हम कीमत चुकाते रहे,
और भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे ।

लगने लगा, जब हम चुका सकते हैं कीमत,
तो भागते रहते हैं,
हिरण और चीते, दोनों से तेज,
और यही सब मानकर,
हम भागते रहे, हांफते रहे पर भागते रहे,
बनकर एक बिचौलिये,
प्रकृति व बाजार के बीच,
प्रकृति ने बनाया मानव,
और मानव ने बाजार,
और अपने अहम में, अपने दम्भ में,
यह साधारण सा समीकरण,
भूल बैठे हम,
अपना दौड़ना जारी रहा,
और उस दौड़ में,
उस अज्ञान के बहाव में,
इतना समय ही नहीं मिला,
कि अपने विवेक का कर पाते प्रयोग  ।

हम दौड़ते रहे, भागते रहे,
जीविकोपार्जन के आगे,
हांफते रहे पर भागते रहे ।

जब हमारी दौड़ ने,
सारी सीमाएं कर लीं पार,
और हम करने लगे प्रयास,
भागते-भागते पहुँचने का,
मंगलग्रह पर,
(कृतिम तकनीकों के द्वारा),
समय ने मिलकर प्रकृति के साथ,
बनाई एक योजना और खड़ी की,
कुछ ऐसी परिस्थिति,
समस्त मानव जाति के समक्ष,
कि हम समझ सकें अपनी औकात ।

आज हम सब भाग रहें हैं,
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए,
आज ली जा रही है, हमारी परीक्षा,
शायद प्रकृति ले जाना चाहती है,
हमें वापस अपने घरों की ओर,
स्थूल से सूक्ष्म की ओर,
पत्थर से जमीन की ओर,
मौद्रिक मूल्यों से मानवीय मूल्यों की ओर,
मशीन से मनुष्यता की ओर,
बाजार से घर की ओर,
शहर से गाँव की ओर,
प्रभाव से अभाव की ओर,
अधिक से कम की ओर,
विज्ञान से ज्ञान की ओर,
उपभोग से उपयोग की ओर,
प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर,
आदेश से अनुरोध की ओर,
प्रतिरोध से स्वीकृति की ओर,
रुपयों से रिश्तों की ओर ।

हम क्या साथ लाए थे,
जब आए थे, घर से बाजार,
हम कितना साथ ले जा रहे हैं,
जब जा रहे हैं, बाजार से घर,
एक अनुभवों की पोटली ।

चलो हम सब अब चलते हैं,
प्रयोग से योग की ओर,
जीविका से जीवन की ओर,
बहाव से ठहराव की ओर,
अज्ञान से ज्ञान की ओर,
आसमान से धरती की ओर,
पश्चिम से पूरव की ओर,
कृतिम से प्रकृति की ओर,
कोरोना से करुणा की ओर ।

प्रकृति शायद ले जाना चाहती है,
हमें वापस,
अपने घरों में,
अपने परिवारों व रिश्तों के बीच,
(जिन्हे हम बाजार आते समय घर छोड़ आए थे),
अपने स्वयं के बीच,
स्वनिरीक्षण हेतु ।

हमने क्या किया प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों का,
हमने उसके द्वारा दी गई स्वतंत्रता का,
कितना बनाया मज़ाक,
और हम समझने लगे,
स्वयं को मालिक,
जुट गए संभावनाएं तलाशने की,
कि कैसे हम बना सकें,
मंगल गृह पर अपना घर ।

आज हम सब छिपे हैं,
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए,
अपने घरों में, अपने बिलों में,
सब कुछ होते हुए भी,
क्या है हमारे पास,
हैं तो मात्र कुछ रिश्ते,
आसपास
या फोन की कान्टैक्ट लिस्ट में,
जिन्हे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता ।

हम सबको ढूढ़ने होंगे रास्ते,
जीवन बचाने के,
इस परीक्षा की घड़ी में,
जीविकोपार्जन से कहीं अधिक,
हम दुखी हों या खुश,
हमें बदलने होंगे,
अपने जीने के तरीके,
बाजार के नियमों से परे,
बाजार के अस्तित्व से इतर,
जहां के लिए हम निकले थे,
सामान जुटाने, सौदा खरीदने,
जीविकोपार्जन हेतु ।

Tuesday, March 24, 2020

कविता और कहानी - 1

आजकल कविता भुलाकर मैं कहानी लिख रहा हूँ
भूलकर बचपन बुढ़ापा मैं जवानी लिख रहा हूँ
शब्द लय से हट गए हैं गद्यमय लेखन हुआ है
कुछ नहीं संकोच सीधी सी रवानी लिख रहा हूँ

क्यों विरोधाभास अब अभिव्यक्त हो बस हंस रहा है
क्यों भला मस्तिष्क मेरा नई विधा में फंस रहा है
किस विनय को कर्ण मैं दूँ कारकों को साथ मानूं
ज्ञान से मेरे परे हो ध्यान चपलक धंस रहा है

कलम रुककर कह रही है क्यों नहीं विश्राम करते
कुल स्याही जम गई है उम्र भर अविराम बहते
पृष्ठ पीड़ा से व्यथित हो लड़ रहे हैं उंगलियों से
प्रेरणा की घनिष्ठता का पृष्ठ ही परिणाम सहते

क्यों अधूरी छोड़कर कविता, विधा का रूप बदला
क्यों अधूरा साथ देकर यों हवा का रुख बदला
कल्पना के स्वर स्वतः ही स्वप्न बन कर घूमते हैं
क्यों भला संदर्भ वंचित साथ संचित रूप बदला

कुल विषय विस्तार वर्णन बंधनों से मुक्त होकर
सृजन शक्ति सुगम आशय सुलभता से युक्त होकर
जंगलों में झाड़ियों से झूझती है कलम मेरी
उस सुबह की है प्रतिक्षा अड़चनों से मुक्त होकर

Monday, October 1, 2018

Reprise

After umpteen efforts 
to reconcile and reboot 
the (in)human system, 
with an expectation 
of better tomorrow 
and to set the things right 
with the 'may be' biased 
and believed reality, 
my altered ego began to burst 
and crumble 
before silly arguments 
and the future 
instead of getting better 
started to worsen. 

Rebooting at times 
doesn't help treat viruses. 
Positive efforts at times 
boomerang 
and culminate into 
unexpected outcomes.
 
Reprising doesn't help 
when uprising alarms 
and poorly designed dogmas 
get into 
renditioning panagyric hymes.

All the crumblings connive 
and portray palpable perfidy, 
ill intentioned effervescence, 
and inchoately sounding tunes 
for the dumb ears 
and for them
who had invested the fortune 
for poorly priced return.

Self-satisfying reprise, 
of the self, 
for the self, 
by the self.

Wednesday, September 12, 2018

Remise for Premise


I went agog
seeing burgeoning fear
and stupid defenses
in the eyes
that were ready
for every kind of senseless causation.

Why one has to find
fretless fault for framing finicky friends?
Why the hell
the whole world seem
to conspire against odds
to finks foolishly?

All my legends
went in vain
and the vanity once again
cried, dry and dense
in frozen tears.

All the wildness
stood standstill
with sombre yet sublime sensibility. 

God save them
for what they intend
with intent of gaining and getting
to loose, for what
subtlety they put efforts
for the end,
missing on inordinate means,
for dreams that are unseen
through open eyes,
missing on achievable vision,
for being like pagan,
seizing sympathy serendipitously.

Wednesday, July 11, 2018

Waiting

Waiting is
Part of life
For parents.

From the time of thinking of parenthood
Till they breathe last.

For letting their children open their eyes
For letting them getting up (up in arms at times)
From birth till they attain parenthood
And even after that
Till they remain parents
It's kind of parenting and part of parenthood.

For parents
Waiting is their part of life.

Short or long
Now or then
Time is immaterial.

They say
Only girls leave home after they wear bridal looks.

But the times have changed and
The sense of equity
And that of equality
Has made parents waiting for their sons 
More than their daughters.

Open arms
Open hearts
Open minds
All wait.

Waiting is part of parents' life.

Thursday, May 24, 2018

प्रतिशोध

क्यों भला प्रतिशोध की ज्वाला लिए तुम जी रहे हो
क्यों दिखाकर द्वेष-भेष घूँट विष का पी रहे हो
नम्रता का भाव लेकर जय विजय नेतृत्व देखो
क्षम्य कृत्यों का लिए क्यों बोझ तुम अब जी रहे हो 

भूल जाओ भूत की भाषा विषय सब सांझ आई
उम्र कोई भी भले हो सुबह सबकी बार आई
घास झुककर चीड़ के सम्मुख खड़ी लहलहा रही है
और धरती पर पड़ी लकड़ी व्यथा पर मुस्कराई

---

Sunday, November 26, 2017

Love

[https://assets1.cdn-mw.com/mw/images/article/art-global-footer-recirc/dictionary-love-1825@1x.jpg]

Mutuality of concern
Mindfulness of understanding 
Celebration of togetherness
Centrality of purpose.

Marriage of trust,
Devoid of all insecurities
Heart and soul in unison
Absence of self
Presence of play 
It's all eternal they say.

Believe me
My name is Love.

=======

Tuesday, November 14, 2017

Life


[PC: https://www.linkedin.com/pulse/journey-life-lucy-rose/]
---

Full of ups and downs
Day after night and night after day
Sun, moon and stars
Fall, Autumn and Spring
Summer, rains and winters

Pain and pleasure
Grief and happiness
Hope and expectations
Trials and tribulations
Failures and successes

Trust me,
my name is Life.
---

Tuesday, October 3, 2017

Time


Stoicism at play
Beyond complacency and calculations
Divinity in domination
Nothingness non-existing
Flow beyond measure
Constant in speed and space
Consistently moving 
Forward or backward nobody knows
Efforts all in action
Results all monitored

Mind it, 
My name is Time.

Saturday, May 13, 2017

हमारे पूर्वज


हमने बनाया घर 

जंगलों में
उनके घर मे घुसकर
आक्रमण से
अपने सुंदर भविष्य हेतु

आज जब 
वे, हमारे पूर्वज माने जाने वाले
अपने घर मे प्रवेश 
करने का कर रहे हैं प्रयास
तो निषेधाज्ञा लगाई जा रही है

पहिया चल रहा है
खेल जारी है
अभी कई अध्याय लिखे जाने हैं

हम उनके घर में हैं
या
वे हमारे घर मे

We All Travel

We are all travellers
We all travel 
Distances, places and spaces

We travel through 
Air, river and road

We all travel through
Experiences, expectations and expansions

We travel through 
Outsmarting others 
and 
at times get outsmarted

We travel through 
output and outcomes


Students travel through learning
Workers travel through work
Leaders travel through leading

Health enthusiasts travel through treadmill
Covering invisible distance

We are all travelers 
And we all need shadow
However shallow our interests be

Shadow We Need

Scenic, picturesque and serene
Coconut trees, grazing cattle

Well orchestrated dividers
Black top roads absorbing the sun
Presence of vernacular all around

Shadow we need
However shallow our interests be.

-

Pale, parsimonious and pampered
Ponds, plains and peels

Reassuring oneness 
Mosques, temples and churches

Shadow we need
However shallow our interests be

--

Bricks, bridges and beliefs
Sun, salt and sundry

Serving one taste
North, east and south

Shadow we need 
However shallow our interests be

---

Mango laden trees
Plantains in bloom

Smiling watermelons as if enjoying 
the sleep in the sun
Glassy constructions 
telling tales of modernity

Shadow we need
However shallow our interests be

----

Beaches, breaches and beacons
Sand, saplings and sundae

Free from French
Fermenting flavors

Shadow we need 
However shallow our interests be

Tuesday, January 3, 2017

Will to Survive


[picture borrowed from Ms Babita Asthana's Facebook Wall]
============
1
==
Life torn into pieces
Flood Full of furies and frames
Nature 
Testing their appetite to survive
Will to survive at any cost
Keeps their eyes occupied
Permutations and combinations
Possibilities and hope
Determination and drive
Scanning their brain waves

Sense of togetherness 
Energising them
Sense of expectation
Forcing them
Sense of existence
Reminding them

Thorns on the way
To better tomorrow
Shall surely lead them
To tackle
Atrocities
Complexities and 
Uncertainties
Shall surely assure them
Survival 

Learning
Living and 
Leading Life.

===========

2
==
Water they say
Gives life
Water they say
Saves life

But we see
Water
Taking lives
Destroying age old
Held beliefs
And
Redefining
Relationship
Between Water and Life.

Sunday, September 11, 2016

आ जाओ


[चित्र प्रो0 विद्यानंद झा जी की फेसबुक वाल से साभार]

सब छोड़ देते हैं साथ
अपने भी

फिर भी 
लोगों की नज़र 
पड़ ही जाती है

पराये-अपने के भेद से परे

कितनी ख़ूबसूरत थी 
ये दुनिया 
जब तुम्हारा साथ था

हम दोनों कितनो का 
सहारा थे
बरसात में
कड़ी धूप में

अब क्या है 
मेरा अस्तित्व 
तुम्हारे बिना

और तुम्हारा 
मेरे बिना

तुम अब 
उड़ रही होगी 
बिना किसी की
मुट्ठी में बंधे 

आ जाओ

 मैं कष्ट में हूँ
तुम्हारे साथ न होने पर
मुझे ठोकरें पड़ रही हैं
हाथ से सीधे पैरों में आ गिरी हूँ
मुझे अब
ज्ञात हो रहा है
तुम्हारे साथ का महत्व


आ जाओ 
चलो 
फिर से हम खा लेते है 
कसमें साथ मरने-जीने की

आ जाओ


मेरी वेदना पर
कुछ तो तरस खाओ

आ जाओ

====================

Wednesday, July 27, 2016

कोई वीरानी सी वीरानी है



[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]

=====================
कोई वीरानी सी वीरानी है
उनको अपनी व्यथा सुनानी है 
उड़ गए साथ छोड़ सब फिर भी 
मुझमे बाकी अभी कहानी है 

मौसमों की अजीब आदत है 
बसन्त के बाद शीत आनी है 
सूखना अंत हो नहीं सकता 
कोपलों में अभी भी पानी है 

ऐसी वीरानी भी जरुरी है 
असलियत है नहीं बेमानी है 
अँधेरा-रोशनी रहें मिलजुलकर 
जिन्दगी की यही कहानी है 

मेरा जीवन तो एक मिथ्या है 
सत्य है मृत्यु जोकि आनी है 
भागते दौड़ते रहें हम सब 
पतंग सपनों की जो उड़ानी है 

कोई वीरानी सी वीरानी है 
मुझमे बाकी अभी कहानी है

--------

Tuesday, April 26, 2016

तीस्ता

तीस्ता के सहारे
चले जा रहे हैं,
दायें-बाहें, ऊँचे-नीचे,
पहाड़ों पर।

















तीस्ता नहीं छोड़ती है साथ,
अपनी गति, गन्तव्य व गहनता को
पोटली में बांधे
समय, काल व परिस्थिति के साथ
करते समझौता,
मानव छेड़खानी से जूझते,
बांधों से टकराते,
अपना रास्ता स्वयं बनाते,
तीस्ता चली जा रही है।

पत्थरों के साथ लुड़कती,
देश-देशान्तर की
परिकल्पना के विरुद्ध,
तीस्ता चली जा रही है।

कटाव, रिसाव, व झुकाव से
जन्म लेते विकास की गति को
अपने कन्धों पर ढोते
तीस्ता चली जा रही है।

सड़क के चौड़ा होने से
अवरुद्ध अवश्य होती है
उसकी गति,
परंतु
अपने सेवा भाव में सराबोर
उसका व्यक्तित्व
सब कुछ सहने को
तैयार दीखता है,
परंतु कब तक।

कब तक,
आखिर कब तक
हम अपने हितों के लिए
उसकी गति को
अवरुद्ध करते रहेंगे,
बनाते रहेंगे
बाँध व सड़कें,
चकाचौंध करने वाली
रोशनी के लिए।













कब तक,
आखिर कब तक
अल्पकालिक रोशनी के लिए 
संजोते रहेंगे
दीर्घकालिक अँधेरे को।
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[सिलीगुड़ी से गंगटोक के रास्ते पर तीस्ता के भिन्न रूपों को देख कर निकली यह पंक्तियाँ, 26 अप्रैल 2016, Mayfair hotel n resort, Gangtok, 6:50 pm, room #523]

Saturday, April 2, 2016

फूल


[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]
=================
देखो
ध्यान से देखो
किस प्रकार तुमने 
टुकड़े कर दिए
हमारे परिवार के

हमारी शोभा हमारे अलग रहने में भी है 

हममे 
अभी भी सुगंध का वास है
अभी भी 
हम सक्षम हैं 
तुम्हारा ध्यानाकर्षण करने में 

तुमने 
हमारा त्याग तो किया
परंतु भूल गए 
कि हमारा जीवन 
त्याग से ही प्रारम्भ होता है
हम अपने लिए कभी नहीं जीते 
समर्पण ही तो हमारा जीवन है 

हम मंदिर की शोभा का कारण भी हैं
और 
अंतिम यात्रा में तुम्हारे सहयात्री भी

देखो
हमको 
इन चार कन्धों पर 
जा रहे निर्जीव पथिक के ऊपर 
समर्पित किया गया 
हम अपनी यात्रा को विराम नहीं देना चाहते थे  
सो हमने ज़मीन पर रहना 
बेहतर समझा

सड़क पर हमें 
कुचले जाने का भय तो है
परंतु अपने परिवार से 
जुड़ने का अवसर भी तो 
यहीं है

हम कब तक 
  रह सकते हैं दूर काँटों से

 ==================