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Thursday, November 1, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ

48

वो मस्जिद तोड़ देते हैं ये मंदिर तोड़ देते हैं
ये नेता वोट की खातिर गणित सब  जोड़ लेते हैं
वही सब सुर वही सरगम वही है गीत  वही संगीत
मैं इतना सोच सकता हूँ नया सब कोढ देते हैं

49

वो कुप्पी को जलाता था जब भी रात होती थी
सुना है लालटेनों की भी अक्सर बात होती थी
वो अब रोशन करे है जिंदगी सबकी उजाले से
मैं इतना सोच सकता हूँ बस कलम दावात होती थी

50

मैं जब बीमार पड़ता हूँ मुझे कुछ क्रोध लगता है
नहीं लाये नहीं जाये इसी का शोध लगता है
जतन अच्छे करम अच्छे अरे समझो मेरे बच्चे
मैं इतना सोच सकता हूँ यही सब बोध लगता है

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Thursday, October 18, 2012

राजनीति

47

मैं कुर्ता पहनता हूँ पर सियासत भर नहीं होती
कदम सीधे जुबां सीधी शराफ़त कम नहीं होती
ये कैसी राजनीति है जो बस कुर्सी बचाती है
मैं इतना सोच सकता हूँ खिलाफ़त कम नहीं होती
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Saturday, September 15, 2012

काला धन

रात को पाकर एकांत
सात वर्षीय बालक
कोने में ले गया
रुपयों से भरा थैला

साथ लेना
चाहता था वह
काला पत्थर - कोयला
आतुर हो
किए अथक असफल प्रयास
पर नहीं मिला उसे
एक टुकड़ा कोयले का
उसे याद आया
'कोयला तो अभी भी खदानों में ही है'

भागकर गया
निकाला काला रंग
अपने कलर बॉक्स से
और आ बैठा
उसी कोने में

रंग दिए
सारे नोट
काले रंग से

आज सुबह
उसने सुन लिया था
पिता को
फ़ोन पर
करते बातें ...

Poetic Punches

Red Light Was on
They Say
Power Had Gone

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Tempered Roads
They say
Path Tempered
Affirming
Path Breakers

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Delaying Delivery
Pain On The High
Save Saviors Save
Let It Not Die

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Seamless Consistency
Homologous Urgency

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Rain Drops
Droplets Brawl
Tendrils Call
Pain Drops

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High Are Stakes
Non-regrettable Mistakes
Cranky Takes

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Soulmates
Polity - Business - Mafia
Coalgates

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Electricity Failure
Irregular Water Supply
Powerful Grievances
Powerless Appliances
Can We Really Call It
Power Crisis

---

Have You Seen Transformers
Not the ones which got Burst
But the ones Which are
Busy Transforming...


---

Monday, August 13, 2012

कब होगा सांप्रदायिक तनाव

देखकर
अपनी
सिलने दी ब्लाउज
पहने
पड़ोसन को
महिला खीज रही है

प्रतीक्षा कर रही है
आखिर कब होगा
फिर से
सांप्रदायिक तनाव

इस बार
तैयार रहूंगी मैं
अपने पति-परिवार के साथ
लूटने को
दर्जी  की दुकान

उधर
दर्जी
देखकर महंगाई
बाजार-भाव
देखकर
रेडीमेड कपड़ों के
बाज़ार का प्रभाव 
खीज रहा है

प्रतीक्षा कर रहा है
आखिर कब होगा
फिर से
सांप्रदायिक तनाव

योजना बना रहा है
स्वयं रखने की
दुकान मे पेट्रोल
मानो
कह रहा हो
जला दो इसे
राख कर दो
सुना है
इस बार
सरकार देगी
अच्छा मुआवज़ा


मोहल्ले भर की
शादियों मे बजाने वाले
ब्रास-बैंड का मालिक
जिसने मोहल्ले भर की
खुशियों में
देखीं अपनी खुशियाँ
जिसने सभी की
खुशियों में
लगाये हों चार चाँद
जिसकी
गाड़ी व घर में
लगा दी गई थी आग
पिछली बार

प्रतीक्षा कर रहा है
आखिर कब होगा
सांप्रदायिक तनाव
तैयार है
इस बार
लगवाने को आग
अपने घर व गाड़ी में
उसे भी भनक है
दर्जी की तरह
इस बार
अच्छी होगी
मुआवज़े की रकम
अभी निबटा है
निकाय चुनाव
और तैयारी है
लोकसभा चुनाव की

बीमा  कंपनी का एजेंट
जो प्रायः
समझाता था
बीमा के
फ़ायदे

क़ायदे
कौन पूछता है उसे
सब-कुछ
शांतिपूर्ण होने से
आखिर उसको भी
करना है पूरा
अपना लक्ष्य (टार्गेट)
बचाने को अपनी
बाजारू साख
खीज रहा है वह

प्रतीक्षा कर रहा है
आखिर कब होगा
सांप्रदायिक तनाव

उधर
सोई हुई लाठियां
आपस मे
बतिया रही हैं
बाँट रहीं हैं
अपने-अपने
पुराने अनुभव
पिछली बार के
इतरा  रहीं हैं
अपने-अपने
निशानों पर
धर्मभेद से परे
रक्तभेद से परे
सोई हुई लाठियां

प्रतीक्षा कर रहीं हैं
आखिर कब होगा
सांप्रदायिक तनाव

रोज़ कमाई  करने वाला
मजदूर
होता है त्रस्त
सांप्रदायिक तनाव के दौरान

उसके घर का चूल्हा
जलता है
कितनो के घर बनाने से
वो
मस्जिद मे
ईंट रखता है
मंदिर में
पत्थर लगाता  है
वो
बनाता है रास्ता
सभी के चलने के लिए
धर्म जाति व पंथ से परे
उसे मालूम ही नहीं होता
कौन चलेगा इस सड़क पर
कौन भागेगा
लेकर
लाठियां तलवार व  बन्दूक
इस सड़क पर

रोज कमाई  करने वाला
मजदूर
हमेशा
कामना करता है
शांति की
सांप्रदायिक  सदभाव की

बाकी शेष सब
किसी ना  किसी रूप में
प्रतीक्षा कर रहे हैं
आखिर कब होगा
सांप्रदायिक तनाव

पिछले दंगों के दौरान
घर मे आनंदित
सरकारी अधिकारी व कर्मचारी
अपने परिवार के साथ
समय बिताते व्यवसायी

पिछले दंगों के उपरान्त
प्रोन्नत हुआ
पत्रकार
प्रोन्नत हुए
पुलिस अधिकारी व कर्मचारी
जीते हुए नेता
सभी
प्रतीक्षा कर रहे हैं
आखिर
कब होगा सांप्रदायिक तनाव

छोड़कर
केवल उस रोज कमाई करने वाले
मजदूर के
जो सोचता है
(दंगों के दौरान)
आखिर
कब बंद होगा दंगा
और
कब जलेगा
उसके घर का चूल्हा।

(25 जुलाई 2012, 3:15 PM  - बरेली - during curfew)

Thursday, November 24, 2011

चांटा

महंगाई का
भ्रष्टाचार का
भेदभाव का
अवसरवादिता का
झूठ का
वादों का

गलत इरादों का
चांटा
अब तक मारा है
सत्ताधारियों ने
आम आदमी पर

अब
जब आम आदमी
गया है बिदक
और
जीवित है
उसकी संवेदना,
आज
उसका संतोष
संयम,
धैर्य,
सहनशीलता,
तितिक्षा,
वात्सल्य,
सब
उसको कर रहे हैं
बाध्य
उस हाथ को
उठाने पर
जिसकी एक उंगली
ने सत्ताधारियों
को चुना हो.

क्यों
इस चांटे
की अधिक
चर्चा है
उस चांटे से

मेरी कल्पना से
परे है
इसकी सोच...


[24 Nov 2011, Shillong, 10:10 PM]
Today one person (Harvinder Singh, a sikh youth) slapped Sharad Pawar, Minister of Agriculture, Govt of India.  I am little skeptical about what must have prompted him to think of taking such a step.  There have been few cases of this nature before, when people have been throwing chappals/shoes on the powerful people.  It is the outburst of common man against the ruler/powerful.  Where are we heading???