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Thursday, December 14, 2017

Death


Freedom as choice
Silence as voice
Ecstasy of life
Essence of existence

Pleasure of pain
Bereft of sorrows

Desire for mukti
Driven for moksha
End of suffering
The ultimate Truth

Enjoy it, 
My name is Death.

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Click for Love
 Click for Life
Click for Time

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Wednesday, July 27, 2016

कोई वीरानी सी वीरानी है



[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]

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कोई वीरानी सी वीरानी है
उनको अपनी व्यथा सुनानी है 
उड़ गए साथ छोड़ सब फिर भी 
मुझमे बाकी अभी कहानी है 

मौसमों की अजीब आदत है 
बसन्त के बाद शीत आनी है 
सूखना अंत हो नहीं सकता 
कोपलों में अभी भी पानी है 

ऐसी वीरानी भी जरुरी है 
असलियत है नहीं बेमानी है 
अँधेरा-रोशनी रहें मिलजुलकर 
जिन्दगी की यही कहानी है 

मेरा जीवन तो एक मिथ्या है 
सत्य है मृत्यु जोकि आनी है 
भागते दौड़ते रहें हम सब 
पतंग सपनों की जो उड़ानी है 

कोई वीरानी सी वीरानी है 
मुझमे बाकी अभी कहानी है

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Saturday, January 18, 2014

समय

नमक तेल मसाले
डीज़ल पेट्रोल गैस
आलू प्याज़ टमाटर
लकड़ी कोयला कपड़ा
सभी हो रहे हैं महंगे
और
सस्ते हो रहे हैं
सम्बन्ध
व
मौत के कारण

सस्ती हो गयी है
मौत
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Thursday, July 18, 2013

आदमी और मौत 2

आदमी और मौत 1 से आगे … 

मौत सबकी है आपकी भी है 
क्यों भला लड़ के लोग जीते हैं
जिंदगी प्यार की कहानी है
इसको बुनते हैं आओ सीते हैं

मैंने सपने भी कुछ सजाये हैं
उनको बाटूँगा आप हंस देंगे 
आपकी उस हंसी के कारण से
स्वप्न बिखरेंगे प्राण भर देंगे


आप हँसते रहेंगे जीवन भर
मौत आएगी लौट जाएगी
आप उसको गले लगायेंगे
हाँथ झटकेगी मुस्कराएगी

आप रोकर उसे पुकारेंगे
उसको अब कुछ हंसी तो आएगी
उसकी स्मृति उबाल पर होगी 
अट्टहासों से तुम्हे सताएगी 

उसके हंसने में आप रोओगे
और तड़पोगे छटपटाओगे
तुम्हे अनुनय-विनय थकाएगी
भूत की पुस्तकें मंगाओगे

पृष्ट दर पृष्ट उड़ रहे होंगे
सभी स्म्रतिचिंह पाओगे
शीत वायु उष्ण ज्वर देगी 
दर्पणों को सभी मंगाओगे 

ह्रदय के शूक्ष्मतम तिकोने में
कर्म और काण्ड याद आयेंगे
आत्मबल साथ छोड़ता होगा
'अहम्' विदाई  गीत गायेंगे

मौत दर्पण को  हाथ में लेकर
तुमको तुम से मिला रही होगी
और दुनिया तुम्हारी आंखें देख
अपने आंसू बहा रही होगी

आप से तुम पर आ गया हूँ मैं
तुम से तू हो तो कुछ नहीं कहना
एक बालक पुकारता माँ को
तुम से तू पर रही सही है ना

इसलिए कहता हूँ औरों पे छोड़ दो हँसना
वरना रोओगे तुम मौत भी ना आएगी
करवटें छीन रात बिस्तर पर
तुमको हर पल बहुत सताएगी  


मेरे सन्दर्भ सोच कर देखो
तुमको सब कुछ समझ में आएगा
एक दर्पण रखो हमेशा साथ
तुमको अंतःकरण सिखाएगा   

दोष औरों पे लगा ना पाओगे
रोष करना भी सुधर जायेगा 
मौत फिर हंसके तुमसे बोलेगी
प्राण मिथ्या अधर पे आयेगा 

तुम्हारी राह देख रो लेगी 
पास आएगी सार बोलेगी 
साधना सत्य की सजगता से 
साथ जाएगी पाट खोलेगी 

अपने जीवन को इस तरह ढालो 
प्रेम से देखो प्रेम से बोलो
प्रेम सिखलाओ अपने मित्रों को
प्रेम की चाबी से ताले खोलो 

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Thursday, July 11, 2013

आदमी और मौत 1

आदमी मौत से जब प्यार करने लगता है
मौत हंस देती है संवाद छोड़ देती है
अनुभवों के विशाल संचय से 
खोज कर लेती है बस याद जोड़ देती है 

दोष औरों में देख सकते हो 
कितने शीशों को तोड़ सकते हो  
आदमी 'मै' में जी नहीं सकता 
कितने औरों को जोड़ सकते हो 

रोष क्यों उनपे आप करते हैं 
उनको जीना है यार जीने दो
आप कांटो की सेज पर सोओ
उनको फूलों के हार लेने दो 
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Monday, May 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 3

१२.
मेरे सब मित्र अच्छे हैं, मुझे मंजिल दिखाते हैं
मगर फिर क्यों वही मुझसे, सही रस्ता छिपाते हैं
मेरी मंजिल, तिरा निर्णय, तिरा संशय, मेरा रस्ता
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं मंजिल वो पाते हैं.
१३.
मेरे सब बाल पकते हैं, वो बालों को रंगाते हैं
मगर क्यों उम्र को हम, सब प्रकारों से छिपाते हैं
तेरा रुकना, मेरा चलना, तेरा चलना, मेरा रुकना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं हम सोच पाते हैं.
१४.
मुझे आकाश के तारे, चमक कर क्यों बुलाते हैं
अगर उस व्योम मे इतने, मधुर स्वर गुनगुनाते हैं
तेरी आशा, मेरी मंशा, मेरे अपने, मेरी सीमा
मैं इतना सोच सकता हूँ, कि वे क्यों झिलमिलाते हैं.
१५.
मुझे रोना नहीं आता, उन्हे हंसना रुलाता है
मगर निष्प्राण जीवन का, यही चेहरा दिखाता है
तेरी भाषा, तेरे आंसू, तेरी क्रिया, तेरी बोली
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं कुछ साथ जाता है.
१६.
मुझे क्यों नींद आती है, उन्हें क्यों स्वप्न आते हैं
अगर हो कर्म सब अच्छे, निरर्थक अर्थ पाते हैं
मेरी निद्रा, तेरे सपने, मेरी आंखें, तेरी रचना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं अपने बताते हैं.

7 oct 2011, shillong

Saturday, April 10, 2010

NEW LIFE

Dying,
with an expectation of
New life.

Life,
not a sign of death.
Without its fear and fancy.
Imagining
Life after Death.
Hoping it, to be better
than the present one.

Depending on better tomorrow.
Tomorrow –
always better than today.
Today –
Always better than yesterday.
Past –
Present –
And Future.
When
Death would be Past,
And the Life
Present,
I would wake up,
for that
Fresh beginning of Life.

Life,
which would be unperishable,
but not be so revealing.
Life,
which would be undramatic,
but not be so relieving.
Life, which would be uncrowdy,
but not be so lonely,
So disturbing.


(2nd Dec 1998 – 2:40pm
Exam duty in MPH with Ganguli)