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Tuesday, January 8, 2013

माचिस

हाथ में लेकर
माचिस
घूम रहे हैं
व्यस्त है
नुक्कड़ों पर
चौराहों पर
कैंटीन में
सभा में
हाथ में लेकर
माचिस

आजकल
रोजाना की
बरसात ने
कर दिया है
गीला
इन
माचिसों को

जब कभी
देखता हूँ
लोगों को
सेंकते धूप
एक साथ
समूह मे
मुझे लगता है
अब
माचिस का
गीलापन
कम हो रहा है
अपने
प्राकृतिक रूप में
आ रही है
माचिस

कौन नहीं जानता
माचिस का काम
होता है क्या

Thursday, November 1, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ

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वो मस्जिद तोड़ देते हैं ये मंदिर तोड़ देते हैं
ये नेता वोट की खातिर गणित सब  जोड़ लेते हैं
वही सब सुर वही सरगम वही है गीत  वही संगीत
मैं इतना सोच सकता हूँ नया सब कोढ देते हैं

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वो कुप्पी को जलाता था जब भी रात होती थी
सुना है लालटेनों की भी अक्सर बात होती थी
वो अब रोशन करे है जिंदगी सबकी उजाले से
मैं इतना सोच सकता हूँ बस कलम दावात होती थी

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मैं जब बीमार पड़ता हूँ मुझे कुछ क्रोध लगता है
नहीं लाये नहीं जाये इसी का शोध लगता है
जतन अच्छे करम अच्छे अरे समझो मेरे बच्चे
मैं इतना सोच सकता हूँ यही सब बोध लगता है

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