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Wednesday, July 11, 2018

Waiting

Waiting is
Part of life
For parents.

From the time of thinking of parenthood
Till they breathe last.

For letting their children open their eyes
For letting them getting up (up in arms at times)
From birth till they attain parenthood
And even after that
Till they remain parents
It's kind of parenting and part of parenthood.

For parents
Waiting is their part of life.

Short or long
Now or then
Time is immaterial.

They say
Only girls leave home after they wear bridal looks.

But the times have changed and
The sense of equity
And that of equality
Has made parents waiting for their sons 
More than their daughters.

Open arms
Open hearts
Open minds
All wait.

Waiting is part of parents' life.

Sunday, July 1, 2018

जाले

कमरे के कोने में
किताबों की अलमारी में
चौके में रखे मसाले के डिब्बों के ऊपर
कुर्सी-मेज़ के इर्द-गिर्द

हर उस जगह
हर उस वस्तु के आसपास
जिसका प्रयोग काफी समय से नहीं किया गया है
या
जो हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों से परे है

हर उस रिश्ते में जिसको हम भूल रहे हैं

लग गए हैं जाले

चलिए
उन जालों को साफ करते हैं।

कमरों में झांकते हैं
कोनों को खंगालते हैं
मसालों का स्वाद लेते हैं
किताबों के पृष्ठों को पलटते हैं
थोड़ा कुर्सी-मेज़ को हिलाते हैं

वस्तुओं का प्रयोग करते हैं
या
जिसकी आवश्यकता नहीं हैं
-जिसको उसकी आवश्यकता है-
उसको देते हैं

रोजमर्रा की गतिविधियों में कुछ प्रयोग करते हैं
रिश्तों को पुनर्जीवित करते हैं
उन्हें संभालते हैं

चलिए
जालों को तलाशते हैं
उनको साफ करते हैं।

Friday, August 1, 2014

मेघालय में बरसात

क्यों हो गई हो तुम
इतनी निर्दयी
तुम्हारे स्पर्श को यह धरती
व 
उसपर रहनेवाले
तरस रहे हैं
सोचो क्या होगा
तुमपर आश्रित जीवों का
लगता है
तुम्हारी संवेदना शक्ति
समाप्ति की ओर अग्रसर है
तुम्हारा शुष्क व्यवहार
सभी को
शुष्क करता जा रहा है
धरती का ताप चड़ाव पर है
आकाश की गड़गडाहट
कुछ आस बंधाती है
परन्तु एक तुम हो कि
अपने प्रण पर अडिग दीखती हो
संभवतः तुम
तुमपर आश्रित जीवों की
परीक्षा ले रही हो
उनके संयम की परीक्षा
भलीभांति यह जानते हुए कि
कोई भी
तुमपर निर्भरता से परे नहीं है

तुम्हारा अडिग व्यवहार
मुझे विचलित कर रहा है

यह वह नगरी है जहाँ
तुम्हारा वास होता था
तुमसे इस नगरी की पहचान थी
इस नगरी में तुम्हारी जान थी
तुम इस नगरी की शान थी

मेरी स्मरण शक्ति
मुझे तुम्हारी
ममताभरी कहानियां याद करने को
कह रही है
पूर्वजों द्वारा तुम्हारा मार्मिक वर्णन
तुम्हारी करुणामयी आँखें
सब कुछ
मेरी स्मृति को चुनौती दे रहा है
तुम क्यों भूल गयी हो
इस नगरी की राह
इस नगर से क्यों तुमको
नहीं रहा प्यार
या
तुम्हारा यह रूप
किसी प्रतिशोध की
अभिव्यक्ति है

इस अप्राकृतिक समय में
तुम भी अप्राकृतिक हो जाओगी
मुझे ज्ञात नहीं था

मेरी सारी प्रार्थनाएं
व्यर्थ लगती हैं मुझे
तुम टस से मस
होने को तैयार नहीं दीखती हो

सोचो एक क्षण
हमारे पारस्परिक संबंधों के बारे में
हमारी पारस्परिक निर्भरता के सन्दर्भ में
मुझे कोई विकल्प नहीं सूझ रहा है अब

हे इंद्र देव!
कुछ कृपा करो

Saturday, June 21, 2014

फूल और मिट्टी

घर में फूल
फूलों में घर 
फूलों की खुशबू 
खुशबू के फूल
फूलों से रिश्ते
रिश्तों से फूल 
रिश्तों सी शाखाये 
शाखाओं से रिश्ते

लकड़ी पर कन्धा
कंधे पर लकड़ी
जड़ों से पेड़
पेड़ों से जड़ 
मट्टी में जड़
जड़ में मिट्टी 
मिट्टी में बीज 
बीज से जड़
जड़ से पौधा 
पौधे से फल-फूल 
पौधे से पेड़
पेड़ से फल-फूल 
पेड़-पौधों से लकड़ी 
लकड़ी से आग
आग से मिट्टी

मिट्टी का मानव
मानव की मिट्टी

फूलों से कीट
कीट से फूल
फूलों से बगिया
बगिया से फूल
फूलों से रंग
रंगों से फूल
फूलों से शूल
शूलों से फूल

पानी में मिट्टी
मिट्टी में पानी
पानी के बादल
बादल से पानी
पानी से मिट्टी

मिट्टी का मानव
मानव की मिट्टी

Saturday, May 24, 2014

प्यार व व्यापार


मुझको उनका पड़ोस भाता है
उनको मेरा पड़ोस भाता है
उनको व्यापार खींच लाता है
मुझको व्यापार ही सताता है
प्यार व्यापार हो नहीं सकता
प्यार दीवार हो नहीं सकता
सोच सकता हूँ बस यही अब मैं
प्यार व्यापार को बढाता है
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Sunday, October 13, 2013

हाथ

हाथ की उँगलियाँ बताती हैं
साथ रहना बहार करता है
इक हथेली है बाँध लेती है 
रक्त गिरकर दरार करता है
हाथ मुट्ठी है हस्त-रेखा है 
ज्ञान मिट्टी है पस्त देखा है
सोच सकता हूँ बस यही अब मैं 
हाथ ताली से वार करता है
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Wednesday, September 4, 2013

रिश्ते

81

सुलगती आग आँखों में 
समझता क्यों नहीं कोई
उलझती डोर रिश्ते की 
समझता क्यों नहीं कोई
उलझने को सुलझते 
देखने मे हर्ष होता है  
बस इतना सोचता हूँ 
यह समझता क्यों नहीं कोई
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80 - ज्ञान 2 
79- समय  
76 - अलंकार
75 - कारक
74 - मोती
73 - क्यों 
72 - रिश्ते 2 
71 - मुस्कराना 
70 - सवेरा 
68, 69 - होली 2013
67 - रिश्ते 
66 - आस 
65 - गन्तव्य
64 - मैं इतना सोच सकता हूँ 15 
63 - मैं इतना सोच सकता हूँ 14 
61, 62 - मैं इतना सोच सकता हूँ 13 
60 - मैं इतना सोच सकता हूँ 12    
57 से 59 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 11
54 से 56 तक  - माँ तुझे सलाम
51 से 53 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 10
48 से 50 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 9 
47 - राजनीति 
44 से 46 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 8 
38 से 43 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 7 
28 से 37 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 6 
25 से 27 तक  - मैं इतना सोच सकता हूँ 5 
24 - नींद 
23 - विविधता 
20 से 22 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 4 
19 - विवाह 
18 - संतुष्टि 
17 - आवाज 
12 से 16 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 3 
7 से 11 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ 2
1 से 6 तक - मैं इतना सोच सकता हूँ  1 

Thursday, April 11, 2013

रिश्ते 2


72

हर गगन चुम्बी इमारत सड़क से 
दूर होती जा रही है
हर किसी रिश्ते में करवट 
क्रूर होती जा रही है
लालसा में घिर निगाहें
छत सितारे चूमती है
सोच सकता हूँ मैं इतना 
समस्या घोर होती जा रही है

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(47 - CLICK HERE)          (48-50 - CLICK HERE)



Thursday, March 21, 2013

रिश्ते


67

मुझे गीता बताती है नहीं कुछ साथ जाता है
मगर फिर क्यों मुझे केवल स्व परिवार भाता है
मेरी पूंजी मेरे रिश्ते तेरे रिश्ते तेरी पूंजी
मैं इतना सोच सकता हूँ तेरा मेरा रुलाता है

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(47 - CLICK HERE)          (48-50 - CLICK HERE)



Friday, February 1, 2013

मैं इतना सोच सकता हूँ - 11

57

मुझे नवग्रह बताते हैं जो कांटो को सजाते हैं
मगर हम हाथ की रेखायेँ सुकर्मो से जगाते हैं
बहुत से कष्ट सहकर हम कठिन प्रयास करते हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ दुकर्मो से बचाते हैं

58

 मेरा विश्वास संशित है मेरा अभ्यास प्रेरित है
मगर क्यों लिपि नियंत्रित हो नहीं आभास किंचित है
मेरा चिंतन तेरी द्रष्टि नहीं संयोग लगते हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ नहीं प्रयास वंचित है

59

मैं रिश्ते ढूँढता हूँ शहर में हर दम मशीनों से
सजाकर जो दिखाती है नई दुनिया बगीचों से
मुझे कल-कारख़ाने सब पुराने ही सुहाते हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ यही अनुभव गलीचों से

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Monday, August 6, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 6

28

मैं दिन भर गीत गाता हूँ, सरल हो गुनगुनाता हूँ
मगर भीतर रही पीड़ा को, मैं सबसे छिपाता हूँ
तेरी आंखें, तेरा पड़ना, तेरा सुनना, तेरा लड़ना
मैं इतना सोच सकता हूँ, मैं गीतों में सुनाता हूँ

29

मैं जब दाड़ी बढाता हूँ, उमर आगे सरकती है
मगर दृढ़ शक्ति मंजिल की, कई ढंग से परखती है
मेरा संकल्प सच्चा है, मेरा सन्दर्भ अच्छा है
मैं इतना सोच सकता हूँ, समय के साथ चलती है.

30

मैं जब भी पत्र लिखता हूँ, समय माध्यम बताता है
मगर स्याही, कलम, कागज, सभी अपवाद पाता है
नहीं दूरी, नहीं धेला, नहीं टिकटें, नहीं थैला
मैं इतना सोच सकता हूँ, समय उंगली चलाता है

31

मेरा दर्शन निराला है, इसी ने तो संभाला है
नहीं तो हम सभी बन्दर, सभी का अपना पाला है
सकल उत्पाद का दर्शन, अजब उत्पात करता है
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं वह चलने वाला है॰

32

सभी उत्पात का कारण, मुझे बाज़ार दिखता है
जहाँ सम्बन्ध बिकते हैं, जहाँ व्यवहार बिकता है
अजब पैसा, गजब मंदी, अजब मंडी, बहुत गंदी
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं संस्कार बिकता है.

33

मुझे क्यों शर्म आती है, वो अर्थों को छिपाती है
यहाँ हर द्रष्टि केवल अर्थ में, आधार पाती है
विविध राही, विविध रास्ता, विविध पुस्तक, विविध चर्चा
मैं इतना सोच सकता हूँ, मुझे क्यों शर्म आती है

34

मुझे गाँधी सिखाते हैं, अहिंसा वार करती है
सभी मतभेद, संघर्षों से नैया पार करती है
सरल चिंतन, सजग चिंतन, सरल जीवन, सफल जीवन
मैं इतना सोच सकता हूँ, कि हिंसा आँख भरती है

35

मेरे कानों में फोड़ा है, मैं कुछ भी सुन नहीं सकता
मैं, 'मैं', मे डूब कर, लेकिन किसी का हो नहीं सकता
अजब यह प्रेम 'मैं' से, मैं सभी कुछ जानता हूँ सुन
मैं इतना सोच सकता हूँ, मैं 'मैं' से रह नहीं सकता

36

मुझे क्यों ज्ञान भाता है, उन्हे लक्ष्मी सुहाती है
मेरी माँ शारदा, मुझको बहुलता से बचाती है
मेरी लक्ष्मी, मेरी माता, तेरे अनुबंध, मेरे सम्बन्ध
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही विद्या जताती है

37

मुझे छाया सताती है, वो कछुए से मिलाती है
अगर विश्राम हो थककर, नई ऊर्जा सजाती है
कभी चलना, कभी थकना, कभी रुकना, नहीं थमना
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही जीवन बताती है


4.7.12 - Shillong


i.     मैं इतना सोच सकता हूँ -  (1-6 CLICK HERE)

ii.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 2 (7-11 CLICK HERE)

iii.   मैं इतना सोच सकता हूँ - 3 (12-16 CLICK HERE)

iv.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (17 CLICK HERE)

v.    मैं इतना सोच सकता हूँ -   (18 CLICK HERE)

vi.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (19 CLICK HERE)

vii.  मैं इतना सोच सकता हूँ -  4 (20-22 CLICK HERE)

viii. मैं इतना सोच सकता हूँ -   (23 CLICK HERE)

ix.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (24 CLICK HERE)

x.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 5 (25-27 CLICK HERE)

Thursday, October 6, 2011

जीवन दर्शन


मेरी पीड़ा, मेरे आंसू, मेरा जीवन, मेरा अनुभव
नया है तू, नए हैं शब्द, नए कपडे, नए करतब
नयी काया, नया चश्मा, नयी वाणी, नया सपना
नयी उपमा, नई भाषा, नई संज्ञा, नया जपना

सभी सन्दर्भ अच्छे हैं, सभी सम्बन्ध सुद्रढ़ हैं
मेरा तेरा, तेरा मेरा, यही संताप की जड़ हैं 
वही हम सब, वही गीता, न कुछ लाये, न कुछ जाये
सफल जीवन हमारा हो, समझ यह सूत्र आ जाये

Friday, August 20, 2010

पेड़ व समीकरण

पेड़,
जमीन पर उगता है पेड़
जमीन के अन्दर होती है उसकी जड़
और
जड़ पर निर्भर करता है
पेड़ का अस्तित्व.

पेड़,
पेड़ पर होती है शाखाएं
शाखाओं पर होती हैं पत्तियां
                होते हैं फूल, फल और कांटे.

पेड़ पर होती है शाखाएं
शाखाओं पर होते हैं सम्बन्ध
संबंधों से बनते हैं समीकरण
और समय पर, मौसम पर
                निर्भर करते हैं समीकरण.

पेड़ से आती है लकड़ी
और लकड़ी से बनती है कुर्सी
कुर्सी से बनते हैं सम्बन्ध

संबंधों से बनते हैं समीकरण
और समय पर, मौसम पर
                निर्भर करते हैं समीकरण.

पेड़ शांत रहता है
कभी बोलता है,
बडबडाता है,
दहाड़ता है.
पेड़ घूमता है,
नाचता है,
गाता है,
संगीत सजाता है.
पेड़ चलता है,
दौड़ता है,
समय के साथ -
जड़ के साथ - 
बिना किये कोई समझौता.

पेड़ पर रहते हैं,
कीडे, मकोडे व पक्षी.
पेड़ पर होते हैं,
आश्रित 
जीव - मनुष्य, जानवर, 
कीडे, मकोडे व पक्षी,
कुर्सी पर भी.

सम्बन्ध, समीकरण व संयोग,
समय, काल व परिस्थिति, 
पेड़ को जड़ से अलग करते हैं.
पेड़ शांत रहता है
सब कुछ सहता है.

समय, काल और परिस्थिति,
जड़, पेड़ और कुर्सी,
सम्बन्ध, समीकरण और संयोग,
अपना-अपना कहना कहते हैं,
सब कुछ सहते हैं,
पेड़, 
जड़ से अलग होकर भी.

(15 July, 2008, Shillong, 10:55 AM-12:20 Noon)

Sunday, May 16, 2010

काश! मेरा ह्रदय होता आप सा

काश! मेरा ह्रदय होता आप सा

सांझ मेरी गूंजती अटखेलियों में
रात भी होती नई नववेलियों में
स्वप्न कर देते तभी कुछ चिन्ह अंकित
सुबह को खेलता मैं बहेलियों में
दिन प्रति, प्रति-दिन करूँ परिहास सा
काश! मेरा ह्रदय होता आप सा

जब कभी मेरा करें स्पर्श वो
मैने सोचा, वो नहीं, वो, वो, नहीं वो
याद किस-किस की करूँ मस्तिष्ट में
कोई आता कोई जाता शाम को
मेरा हर इक मोड़ करता हादसा
काश! मेरा ह्रदय होता आप सा

मैने सोचा भाव कुछ बढने लगें हैं
क्या कहूं अब शब्द भी लड़ने लगे हैं
माँ बहन मे अब कोई अंतर नहीं है
देह व्यापारों के पर लगने लगे हैं
हर नया महबूब करता स्वांग सा
काश! मेरा ह्रदय होता आप सा

आपका क्या है कोई मिल जाएगा
पर ना अब कोई मेरे घर आएगा
मेरे माथे पर लगी है मोहर जो
उसको कोई आपसा सहलाएगा
सहन करने का मुझे अभ्यास सा
काश! मेरा ह्रदय होता आप सा

(२ मार्च १९८८, तिलक कालोनी, सुभाष नगर, बरेली, उत्तरप्रदेश)