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Thursday, December 14, 2017

Death


Freedom as choice
Silence as voice
Ecstasy of life
Essence of existence

Pleasure of pain
Bereft of sorrows

Desire for mukti
Driven for moksha
End of suffering
The ultimate Truth

Enjoy it, 
My name is Death.

==============

Click for Love
 Click for Life
Click for Time

===


Sunday, November 26, 2017

Love

[https://assets1.cdn-mw.com/mw/images/article/art-global-footer-recirc/dictionary-love-1825@1x.jpg]

Mutuality of concern
Mindfulness of understanding 
Celebration of togetherness
Centrality of purpose.

Marriage of trust,
Devoid of all insecurities
Heart and soul in unison
Absence of self
Presence of play 
It's all eternal they say.

Believe me
My name is Love.

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Tuesday, November 14, 2017

Life


[PC: https://www.linkedin.com/pulse/journey-life-lucy-rose/]
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Full of ups and downs
Day after night and night after day
Sun, moon and stars
Fall, Autumn and Spring
Summer, rains and winters

Pain and pleasure
Grief and happiness
Hope and expectations
Trials and tribulations
Failures and successes

Trust me,
my name is Life.
---

Tuesday, October 3, 2017

Time


Stoicism at play
Beyond complacency and calculations
Divinity in domination
Nothingness non-existing
Flow beyond measure
Constant in speed and space
Consistently moving 
Forward or backward nobody knows
Efforts all in action
Results all monitored

Mind it, 
My name is Time.

Tuesday, January 3, 2017

Will to Survive


[picture borrowed from Ms Babita Asthana's Facebook Wall]
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1
==
Life torn into pieces
Flood Full of furies and frames
Nature 
Testing their appetite to survive
Will to survive at any cost
Keeps their eyes occupied
Permutations and combinations
Possibilities and hope
Determination and drive
Scanning their brain waves

Sense of togetherness 
Energising them
Sense of expectation
Forcing them
Sense of existence
Reminding them

Thorns on the way
To better tomorrow
Shall surely lead them
To tackle
Atrocities
Complexities and 
Uncertainties
Shall surely assure them
Survival 

Learning
Living and 
Leading Life.

===========

2
==
Water they say
Gives life
Water they say
Saves life

But we see
Water
Taking lives
Destroying age old
Held beliefs
And
Redefining
Relationship
Between Water and Life.

Wednesday, July 27, 2016

कोई वीरानी सी वीरानी है



[प्रो0 विद्यानंद झा जी द्वारा उनके फेसबुक पेज पर इस चित्र को देखकर मिली प्रेरणा]

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कोई वीरानी सी वीरानी है
उनको अपनी व्यथा सुनानी है 
उड़ गए साथ छोड़ सब फिर भी 
मुझमे बाकी अभी कहानी है 

मौसमों की अजीब आदत है 
बसन्त के बाद शीत आनी है 
सूखना अंत हो नहीं सकता 
कोपलों में अभी भी पानी है 

ऐसी वीरानी भी जरुरी है 
असलियत है नहीं बेमानी है 
अँधेरा-रोशनी रहें मिलजुलकर 
जिन्दगी की यही कहानी है 

मेरा जीवन तो एक मिथ्या है 
सत्य है मृत्यु जोकि आनी है 
भागते दौड़ते रहें हम सब 
पतंग सपनों की जो उड़ानी है 

कोई वीरानी सी वीरानी है 
मुझमे बाकी अभी कहानी है

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Tuesday, December 1, 2015

परिचय

कभी दाड़ी बड़ाता हूँ
कभी दाड़ी कटाता हूँ
कभी मैं कल्पना के
इस समंदर में नहाता हूँ
मेरी जिद क्यों मुझे
हर भाव से संतुष्ट करती है
बस इतना सोचता हूँ
स्वयं से परिचय कराता हूँ
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Thursday, November 12, 2015

बोझ

समाप्त कर लेता हूँ
स्वयं को
और 
ताउम्र
आत्मसमर्पण भाव में
जीवित रहता हूँ,
भूलता जाता हूँ
स्वयं को -
न स्वयं का
न किसी और का.

सहता हूँ पीड़ा
इसीलिए कहता हूँ
आत्मसमर्पण के बाद
मैं कर लेता हूँ 
आत्महत्या
और 
ताउम्र ढोता रहता हूँ
बोझ
एक लाश का.

[धन्यवाद सुनील जी ... आपके द्वारा फेसबुक पर लिखी पंक्तियों ने मुझे बाध्य किया इन पंक्तियों को लिखने के लिए]

Thursday, July 16, 2015

जीवन सार

यह जीवन सार है मेरा
यही संसार है मेरा
यही प्रारब्ध है मेरा
यही विस्तार है मेरा
मेरा दर्शन मेरी शक्ति
मेरा आशय मेरा साहस
मैं इतना सोच सकता हूँ
यही संचार है मेरा

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Thursday, January 15, 2015

प्लेटफार्म

ऊँची उड़ानों के स्वप्नों के साथ
सब चढ़ जाते हैं
विमानों में
रेलगाड़ियों में
या बसों पर
प्लेटफार्म
सारे प्लेटफार्म
मूक बने
हर रोज़
हर पल
निहारते रहते हैं
दौड़ भाग में लगी
इन मानव मशीनों को
सारा पाथेय प्रबंधन
ये मूक प्लेटफार्म करते हैं
परन्तु ऊंची उड़ानों पर जा रहे राही
प्रायः उनको अपनी स्मृति में
संजोते ही नहीं
और
स्थिर प्लेटफार्म निहारता रहता है
भीड़ को...

Thursday, July 17, 2014

पहिये

हम अब थक चुके हैं
पंचर हो या न हो
हमे रुकना ही पड़ेगा
बिना मुकाम पर पहुंचे


या फिर
देश
व
संस्थान की तरह
चलते रहेंगे
जुगाड़ से
राम भरोसे
भोले शंकर की कृपा से
जुगाड़ से जोड़े हुए
पंचरों के सहारे
फिर चाहे तपी धूप हो
या
वर्फ से दूधिया सड़क
हमारा काम चलना ही तो है
यही सब सिखाया गया है हमको
चरैवेति-चरैवेति


और तुम
जो मालिक समान
लदे हुए हो हम पर
बिना किये लिहाज
हमारी उम्र का
हमारे कद का
(कद जो कभी हमारा अपना न हो सका)


मानो
हमारी वेदना को जानो
हम अब थक चुके है
हमे चाहिए विराम
यदि पूर्ण नहीं
तो कम से कम
अर्धविराम


कोई नहीं जानता है मुकाम
तुम फिर क्यों चला रहे हो हमे
तुम क्यों नहीं देख पा रहे हो
रिस्ता लहू
तुम संभवतः
जानकार भी अंजान बनने का
कर रहे हो ढोंग


हम पहिये
देखना चाहते हैं तुमको
बनते हुए पहिये
और करना चाहते हैं
तुम पर सवारी
तुमको जताना चाहते हैं
मुकाम पर पहुंचने के लिए
कभी न कभी
हम सभी को बनना पड़ता है
पहिया
और हम इस पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं
कि रौंदते रहेंगे पहियों को
बिना किसी डर के
उनके पंचर होने की
लेशमात्र भी आशंका के परे
इसीलिए कभी नहीं पहुँचते हैं
अपने मुकाम पर
जीवन भर चलते रहने के बाद भी


समझो हमारी पीड़ा
हम अब थक चुके हैं
पंचर हो या न हो
हमे रुकना ही पड़ेगा
बिना मुकाम पर पहुंचे


(प्रो० एस के मिश्र द्वारा निम्न कविता मिली___ उसके उत्तर में उपरोक्त पंक्तियाँ भेजी)


पहिये


हम टायर लगे पहिये हैं
जो अपने फेंफड़ों में दम रोके
जेठ की धूप में
तवे सी जलती ऊबड़ खाबड सड़कों पर दौडते
गाड़ी को सर पर लिए
चार गधों को
जिसे सवारी कह्ते हैं
मुक़ाम के क़रीब तक ले जाने के लिए ही
जी रहे हैँ ।


नहीं जानते, कब, कहाँ और किस वज़ह से
हम में से एक
पंक्चर हो जाएगा,
दम तोड़ देगा
बीच सड़क पर
वहां
जहाँ से सवारियों के मुक़ाम
बहुत, बहुत दूर हों
और
पंक्चर बनाने वाले की दूकान
ढूंढे न मिलती हो ।


प्रभु, ऐसा न होने देना
शंकर, तेरा सहारा
बुरे का हो मुँह काला
फ़िर मिलेंगे ।
-------------
सुधाँशु

Wednesday, May 14, 2014

ताश के पत्ते

ये सारे ताश के पत्ते
अजब जीवन बताते हैं
ये काले लाल फूलों में
बंटी दुनिया दिखाते हैं
कोई राजा कोई इक्का
कोई जोकर कोई छक्का
बस इतना सोच सकता हूँ
ये गिरकर ही जिताते हैं
===================

Thursday, March 6, 2014

ज़रूरी है

वसीम बरेलवी जी ने एक गजल लिखी थी जिसकी दो पंक्तियाँ इस प्रकार थी:

उसूलों पे जब आंच आए तो टकराना ज़रूरी है
जो ज़िंदा हो तो ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है 

इन पंक्तियों को कुछ दिन पहले शैलेश लोढ़ा जी ने एक कार्यक्रम मे सुनाया। तत्पश्चात संजय श्रोत्रिय ने फेसबुक पर, इन्हे अपनी वाल पर टांग दिया। पड़कर अच्छा लगा। मैं कलकत्ता से शिलांग आ रहा था... सो उसी बीच सोचा कितना कुछ है जो ज़रूरी है, सो निम्न पंक्तियों का जन्म हुआ।

1

हर जिन्दा दिल को दिल का हाल बतलाना ज़रूरी है
वो जो मुर्दों से सोये चैन से उन्हे चेताना ज़रूरी है
मैं आँखें खोलकर सोया वो जगकर आँख मीचे है
बस इतना सोचता हूँ क्यों नज़र आना ज़रूरी है

2

अगर कमजोर रिश्ते हों तो घबराना ज़रूरी है
दिखाई दे गलत रस्ता तो हट जाना ज़रूरी है
तु अपनी आँख केवल लक्ष्य पर रख मस्त होकर जी
बस इतना सोचता हूँ अब इक ठिकाना जरुरी है

3

नदी को पार करना है तो तैरना आना ज़रूरी है
जमी से उड़ रहे लोगो को यह बतलाना ज़रूरी है
वो चिड़िया खाके चावल उड़ गई मुझसे कहा इतना
जो हठ में जी रहे उनको यह समझाना जरुरी है

4

संभल कर चलना है तो पेट मे खाना ज़रूरी है
चलें जब तीब्र गति से तो कभी रुक जाना ज़रूरी है
वह घोड़ा अस्तबल से हिनहिना कर कह रहा इतना
अगर हो चैन से सोना तो घर आना ज़रूरी है

5 

लिखी कविता को मित्रों तक पहुँचाना ज़रूरी है
किताबी ज्ञान अच्छा है हाँ माना ज़रूरी है
मगर क्या पुस्तकें ही ज़िन्दगी को राह देती हैं
सजग जीवन को जीवट तत्व से मिलवाना ज़रूरी है


Saturday, January 18, 2014

समय

नमक तेल मसाले
डीज़ल पेट्रोल गैस
आलू प्याज़ टमाटर
लकड़ी कोयला कपड़ा
सभी हो रहे हैं महंगे
और
सस्ते हो रहे हैं
सम्बन्ध
व
मौत के कारण

सस्ती हो गयी है
मौत
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Thursday, January 16, 2014

मंजिल

हर नयी मंजिल मुझे 
शुरुआत लगती है 
बीत जाने पर 
सुबह सी रात लगती है
मन्त्र चलना फिर संभलना 
यदि अटकना फिर संभलना
सोंचता हूँ अब 
सुलभ यह बात लगती है 

(Every new achieved aim looks like a new beginning as every passed night gives a fresh morning. So be effortful and alert and if you face obstacles try overcoming them. This is what I think is a better way to lead life.)
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Thursday, September 12, 2013

दौड़

सूरज की
प्रथम किरण के साथ ही
हो जाती है प्रारंभ
दौड़,
चाहे आप चीता हों
अथवा हिरन।

चीता दौड़ता है
इस आशय से
कि उसको
मरना पड़ेगा भूखा
यदि नहीं मिला
उसको उसका शिकार
उसको दौड़ना ही पड़ेगा,
दौड़ते रहना पड़ेगा
अन्यथा मार देगी उसको
भूख।

और हिरन
दौड़ता है
इस आशय से
कि यदि नहीं दौड़ा वह
तो बन जायेगा शिकार
पीछे आ रहे चीते का
मार देगी उसको
चीते की भूख।

चीता या हिरन
सूरज की
प्रथम किरण के साथ ही
हो जाती है प्रारंभ
दौड़।

हम सबको दौड़ना पड़ता है
दौड़ना पड़ेगा
दौड़ना चाहिए
अपनी भूख मिटाने के लिए
और
इसलिए भी
कि कहीं हम
किसी दूसरे की भूख का
शिकार न हो जाएँ,

चाहे हम
स्वयं दौड़ें
अथवा
दौड़ाये जाएँ।

Thursday, July 18, 2013

आदमी और मौत 2

आदमी और मौत 1 से आगे … 

मौत सबकी है आपकी भी है 
क्यों भला लड़ के लोग जीते हैं
जिंदगी प्यार की कहानी है
इसको बुनते हैं आओ सीते हैं

मैंने सपने भी कुछ सजाये हैं
उनको बाटूँगा आप हंस देंगे 
आपकी उस हंसी के कारण से
स्वप्न बिखरेंगे प्राण भर देंगे


आप हँसते रहेंगे जीवन भर
मौत आएगी लौट जाएगी
आप उसको गले लगायेंगे
हाँथ झटकेगी मुस्कराएगी

आप रोकर उसे पुकारेंगे
उसको अब कुछ हंसी तो आएगी
उसकी स्मृति उबाल पर होगी 
अट्टहासों से तुम्हे सताएगी 

उसके हंसने में आप रोओगे
और तड़पोगे छटपटाओगे
तुम्हे अनुनय-विनय थकाएगी
भूत की पुस्तकें मंगाओगे

पृष्ट दर पृष्ट उड़ रहे होंगे
सभी स्म्रतिचिंह पाओगे
शीत वायु उष्ण ज्वर देगी 
दर्पणों को सभी मंगाओगे 

ह्रदय के शूक्ष्मतम तिकोने में
कर्म और काण्ड याद आयेंगे
आत्मबल साथ छोड़ता होगा
'अहम्' विदाई  गीत गायेंगे

मौत दर्पण को  हाथ में लेकर
तुमको तुम से मिला रही होगी
और दुनिया तुम्हारी आंखें देख
अपने आंसू बहा रही होगी

आप से तुम पर आ गया हूँ मैं
तुम से तू हो तो कुछ नहीं कहना
एक बालक पुकारता माँ को
तुम से तू पर रही सही है ना

इसलिए कहता हूँ औरों पे छोड़ दो हँसना
वरना रोओगे तुम मौत भी ना आएगी
करवटें छीन रात बिस्तर पर
तुमको हर पल बहुत सताएगी  


मेरे सन्दर्भ सोच कर देखो
तुमको सब कुछ समझ में आएगा
एक दर्पण रखो हमेशा साथ
तुमको अंतःकरण सिखाएगा   

दोष औरों पे लगा ना पाओगे
रोष करना भी सुधर जायेगा 
मौत फिर हंसके तुमसे बोलेगी
प्राण मिथ्या अधर पे आयेगा 

तुम्हारी राह देख रो लेगी 
पास आएगी सार बोलेगी 
साधना सत्य की सजगता से 
साथ जाएगी पाट खोलेगी 

अपने जीवन को इस तरह ढालो 
प्रेम से देखो प्रेम से बोलो
प्रेम सिखलाओ अपने मित्रों को
प्रेम की चाबी से ताले खोलो 

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Thursday, July 11, 2013

आदमी और मौत 1

आदमी मौत से जब प्यार करने लगता है
मौत हंस देती है संवाद छोड़ देती है
अनुभवों के विशाल संचय से 
खोज कर लेती है बस याद जोड़ देती है 

दोष औरों में देख सकते हो 
कितने शीशों को तोड़ सकते हो  
आदमी 'मै' में जी नहीं सकता 
कितने औरों को जोड़ सकते हो 

रोष क्यों उनपे आप करते हैं 
उनको जीना है यार जीने दो
आप कांटो की सेज पर सोओ
उनको फूलों के हार लेने दो 
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Thursday, April 25, 2013

मोती


74

मैं चलना चाहता हूँ 
इस धरा पर शूल में बंधकर
जो उस कल को सुधारे 
सीप बन संघर्ष जीवन भर  
मैं इस गहरे समंदर मे 
कोई मोती तो पाउंगा
मैं इतना सोच सकता हूँ 
नदी में प्यार की बहकर

====================

Friday, April 5, 2013

मुस्कराना


71

मुस्कराना बहुत ज़रूरी है 
वरना सब कुछ उदास ही तो है
दूर खुद से कभी न जाओ तुम 
ज़िंदगी नाम आस ही तो है
वक्त रहता कहाँ है हरदम एक 
उठ के गिरना है गिरके उठना है
सोचता हूँ मैं बस इतना अब 
नदी के नाम प्यास भी तो है 
---------
4 april 2013/ 8 30 am

(शैली अग्रवाल की फ़ेस बूक प्रविष्टि 
'तनहा... खुद से दूर.. सोच के मुस्कुरा देती हूँ..
कि अब उदासी का साथ सही.. 
उम्र भर तो रहेगा..!!' 
के उत्तर मे)
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