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Sunday, March 24, 2019

मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

लक्ष्य कोई भी नहीं था,
पर दिशा थी, दृष्टि थी;
कर्म था, आनंद था,
प्रण था, संतुष्टि थी;
प्रार्थना के स्वर सरल थे,
भाव कटु,
दाखिल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं
जो दौड़ में शामिल न थे।

बोझ कोई भी नहीं,
बस रास्ता था,
साथ था, संकल्प था;
फूल की खुशबू थी,
स्नेह था, रिश्ते थे,
नहीं विकल्प था;
साथ उनका भी मिला,
जो दृष्टि के काबिल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं,
जो दौड़ में शामिल न थे।

जड़ थी, पेड़ था,
शाखाओं से पत्ते,
झड़ रहे थे;
वृक्ष छाया दे रहे थे,
पक्षियों के स्वर,
कहानी गढ़ रहे थे;
बौर था, आंधी थी, बल था,
पर कभी गा़फ़िल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं,
जो दौड़ में शामिल न थे।

जोर भी पुरजोर था, योद्धा थे,
गुणा पर अढ़ रहे थे;
भूल कर प्रारब्ध को,
छल भाव से,
कहानी गढ़ रहे थे;
तीब्र लहरों के थपेड़े थे,
मगर साहिल न थे;
मंज़िलें उनको मिलीं,
जो दौड़ में शामिल न थे।

Wednesday, September 13, 2017

सोच

कान कहते हैं आंख सुनती है
उनकी नज़रों की राह बुनती है
कृत्य पदचिन्ह छोड़ बढ़तेे हैं
उंगलियां छोड़ हाथ लड़ते हैं
उनके पलकों से रेत उड़ती है
और कंधों पे सेज सजती है
रीढ़ का दर्द मुझसे कहता है
'इतना क्यों मुझको यार सहता है'

रात के बाद सुबह होनी है
मुझको यह सोच आज बोनी है

Friday, December 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 10

51

मैं अंधों को दिखाकर रास्ता संतुष्ट होता हूँ
मगर इन स्वस्थ आँखों की व्यथा पर रुष्ट होता हूँ
नहीं उपलब्ध साधन साध्य फिर भी व्योम छूना  है
मैं इतना सोच सकता हूँ नहीं संतुष्ट होता हूँ

52

मैं अक्सर रात को उठ बैठकर सपने सुलाता हूँ
भरी आँखों से सारी स्रष्टि की रचना भुलाता हूँ
मेरी हर थपथपाहट पर वो सपना मुस्कराता है
मैं इतना सोच सकता हूँ मैं अपना कल सजाता हूँ

53

मैं अँधा हो चुका हूँ देखकर अंधी हुई दुनिया
मेरी आंखें भी ढूँढें हैं कोई क्रेता कोई बनिया
नयी सी रौशनी लेकर कोई बालक बुलाता है
मैं इतना सोच सकता हूँ मेरे कंधे तेरी दुनिया


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Wednesday, April 14, 2010

मेरे सपने

मेरे सपने अपने थे, जब हम केवल अपने थे
आज मुझे मालूम हो गया, सपने कितने अपने थे

कितने भी दुःख, कष्ट, सजाएँ, हंस के सब कुछ सह लेंगें हम
जीवन की हर धुंध ओड़कर, अन्धकार मे रह लेंगें हम
नहीं झुकेंगे कभी कहीं हम, ऐसे देखे सपने थे
सपने केवल अपने थे, जब हम केवल अपने थे

हर मुश्किल अच्छी लगती थी, जैसे कोई नया सवेरा
नई किरण की नई रौशनी, नया नया सपना था मेरा
नहीं कभी समझौता खुद से, ऐसे देखे सपने थे
सपने कितने अपने थे, जब हम केवल अपने थे

कोई शूल चुभा जैसे हो, आशाओं का धुंधला पड़ना
कब तक पतझड़ को देखे हम, ऋतुओं से कब तक हो लड़ना
रिश्तो मे इतनी दूरी क्यों, क्यों ये सपने अपने थे
सपने कितने अपने थे, जब हम केवल अपने थे

मेरे सपने अपने थे, सपने कितने अपने थे.

२८ जुलाई १९९९: ५:३० संध्या : कान्ग्लुंग : भूटान

अपेक्षा

नहीं अपेक्षा, नहीं प्रतीक्षा
नहीं नहीं, इक सपना था
मैं अपना था, केवल अपना
और न कोई, अपना था

आंखें प्यासी, चेहरा झुलसा
और ऋतु ने, कहर किया
डर लगता है, उस प्रकाश से
कभी नहीं जो, अपना था

जीवित हूँ, पर मृत से बदतर
दंड मिला, किन कृत्यों का
आशाओं की बगिया मे ही
जीवन मेरा दफना था

मेरे सारे सुख, तुम ले लो
अपने सब दुःख, मुझको दे दो
तुम खुश हो, बस यही अपेक्षा
एक यही, बस सपना था

तेरे आंसूं, मेरी आंखें
दर्द कभी मत तुम सहना
ईश्वर, भाग्य, नहीं कुछ भी सच
मात्र कर्म ही, अपना था... 

(२२ जुलाई १९९९: १०:३० रात्रि: घर संख्या २९, शेरुब्त्से कॉलेज, कान्ग्लुंग: भूटान)

जब जब मैने, आँखें खोलीं

जब जब मैने, आँखें खोलीं
मेरी आँखें, मुझसे बोलीं
मुझ पर तुम विश्वास करो मत
स्वप्नों की तुम आस करो मत
मुझको तुम स्थिर रहने दो
मूकों की भाषा कहने दो
कर्ण प्रिय शब्दों की दुनिया
करवट लेकर आँखें खोलीं

मेरी आँखें, मुझसे बोलीं
जब जब मैने, आँखें खोली

सीधा साधा, गुणा घटाना
क्षण भर को ही, जीवन माना
कंधे झुके, झुके थे मस्तक
नहीं कहीं थी, कोई दस्तक
छुप कर क्यों, वह वार किया था
पहचानो गोली की बोली

मेरी आँखें, मुझसे बोलीं
जब जब मैने, आँखें खोली

उठना, उड़ना, उड़ना, उठना
आसमान पर टिकता घुटना
बिन पंखों के उड़ा जा रहा
हर ऋतु का था, मजा आ रहा
हल्की सी, उसकी आहट ने
पलकों पर की, ठाक-ठिठोली

तब जब मैने, आँखें खोलीं
मेरी आँखें, मुझसे बोलीं

आँखों की भाषा विचित्र है
हर आहट का मानचित्र है
आँखों से वह कह सकते हो
शब्द कोष मे वह सकते हो
बिन अधरों, बिन उच्चारण के
वर्णन उसमे, हर कण कण के
सूखी, गीली या पथरीली
भूरी, धानी, हरी या नीली
आँखों को, आंखे ही समझें
मेरी आंखें, मुझसे बोलीं

जब जब मैने, आंखें खोलीं
मेरी आंखें, मुझसे बोलीं.

(21st April 2005, Shillong : India)