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Thursday, March 7, 2013

गन्तव्य


65

एक वो हैं और एक हूँ मैं एक पथ है और एक वाहन है
एक होना अनेक होना है क्योंकि उपलब्ध आज साधन है
दूरियाँ बढ रहीं हैं नदियों सी सबका गन्तव्य एक होकर भी
सोच सकता हूँ बस यही अब मैं डूबकर ही शरीर पावन है
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