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Sunday, June 1, 2014

अर्थ

व्यर्थ है
सचमुच व्यर्थ है
अर्थ
अर्थ से होता है
अनर्थ
और
जब हम ढूँढते हैं
संबंधों का अर्थ
तो अर्थ ही है
जो व्यर्थ लगता है
जब अर्थ के लिए
हम सब छोड़ते हैं घर
फिर कुछ नहीं बचता
अर्थ के सिवाय
और
फिर भी हम सब
ढूँढते रहते हैं अर्थ
शब्दों के...

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उपरोक्त पंक्तियों को लिखने की प्रेरणा प्रो माधवेन्द्र पाण्डेय जी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (10 मई 2014) के दिन फेसबुक वाल पर प्रकाशित निम्न पंक्तियाँ पड़ने पर हुई

कितनी दूर आ गया कि,
माँ के चेहरे की लकीरें भी ठीक से याद नहीं,
कैसे कहूँ ...हैप्पी मदर्स डे |

सुबह बात करते समय 
बेतरह खाँस रही थी माँ,
कैसे कहूँ सब ठीक है,
तेज धूप और फनफनाती लू में
चिलक रही है माँ की आँखें
तब इतनी शीतलता का क्या होगा
यहाँ शिलाँग में,
जब चलने फिरने में इतनी दिक्कत,
आने जाने में इतनी पीड़ा 
तो व्यर्थ है सब घोड़ागाड़ी,
कार,बंगला ...सब व्यर्थ है |

Tuesday, May 29, 2012

संतुष्टि

१८.
मेरा बस अर्थ इतना है, सकल उत्पाद झूठा है
अगर धन भूख सच्ची है, मेरा इतिहास झूठा है
सभी हों खुश, सभी सम्रद्ध, तभी सम्पूर्ण संतुष्टि
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं उल्हास झूठा है.
22 Nov 11, shillong 10 AM

Wednesday, May 19, 2010

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा,
कबतक, किसकी और क्यों,
कब, कहाँ, कौन,
हटाएगा
लगा प्रश्नचिन्ह
भविष्य के समक्ष.
कब तक लादना होगा
इस शरीर का भार,
स्वयं के कन्धों पर.

कुछ समय के लिए
बनेगीं बैसाखियाँ,
सहारे का पर्याय,
या फिर
सचमुच, क्या यह सत्य है
कि जीवन काटा जा सकता है,
काठ की बनी
बैसाखियों के सहारे.

कुछ समय के लिए
वर्तमान में किये गए कृत्य,
बैसाखियों को भी सहारा दे सकते हैं,
यदि कहीं द्रश्तिपात हो
अनुकूलता का
द्रष्टिकोण -
अनुकूल अथवा प्रतिकूल
भूत का अनुभव,
सिद्ध हो सकते हैं,
कुछ सहायक,
साफ़ करने मे,
भविष्य पर लगा प्रश्नचिंह.
परन्तु शायद
प्रतीक्षा ही
जीवन का अर्थ नहीं है...
(२८ मई, १९९३, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)

शब्द या अर्थ

शब्द, वही हैं
मात्र अर्थ बदल रहे हैं
या
अर्थ वही हैं
लेकिन शब्द बदल रहे हैं
लेकिन बदल अवश्य रहे हैं
शब्द या अर्थ...
(२६ अगस्त, १९९२, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)