Showing posts with label Light. Show all posts
Showing posts with label Light. Show all posts

Sunday, March 31, 2013

सवेरा


70
वे जहाँ तक देखते हैं 
बस अँधेरा दीखता है
पर मुझे फिर भी सुखद 
कोमल सवेरा दीखता है
रात रोशन दिन दिवाली 
दीप आशा फूल माली
सोच सकता हूँ मैं इतना 
क्यों कृषक हल खींचता है 


-------------------------


Thursday, November 1, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ

48

वो मस्जिद तोड़ देते हैं ये मंदिर तोड़ देते हैं
ये नेता वोट की खातिर गणित सब  जोड़ लेते हैं
वही सब सुर वही सरगम वही है गीत  वही संगीत
मैं इतना सोच सकता हूँ नया सब कोढ देते हैं

49

वो कुप्पी को जलाता था जब भी रात होती थी
सुना है लालटेनों की भी अक्सर बात होती थी
वो अब रोशन करे है जिंदगी सबकी उजाले से
मैं इतना सोच सकता हूँ बस कलम दावात होती थी

50

मैं जब बीमार पड़ता हूँ मुझे कुछ क्रोध लगता है
नहीं लाये नहीं जाये इसी का शोध लगता है
जतन अच्छे करम अच्छे अरे समझो मेरे बच्चे
मैं इतना सोच सकता हूँ यही सब बोध लगता है

==============================
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ (राजनीति ) (47 - CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ - 8  (44-46 - CLICK HERE) 
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ - 7  (38-43 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ  - 6 (28-37 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ  - 5 (25-27 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ -      (24 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ -      (23 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ -  4 (20-22 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ -     (19 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ -    (18 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ -     (17 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ - 3 (12-16 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ -  2 (7-11 CLICK HERE)
  •   मैं इतना सोच सकता हूँ  - 1  (1-6 CLICK HERE)

Tuesday, August 28, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 7

38

मुझे हर हार में अपनी, सुहानी आस दिखती है
मगर जब जीत होती है, पुरानी प्यास बुझती है
मेरा गिरना, तेरा उठना, तेरा गिरना, मेरा उठना
मैं इतना सोच सकता हूँ, हार से जीत झुकती है।

10.7.12 - Shillong 9 pm

39

मुझे सब कष्ट प्यारे हैं, वो जीने के सहारे हैं, 
मगर फिर भी ख़ुशी के पल, ठहाकों में गुजारे हैं,
मेरा हँसना, मेरा रोना, मेरे आंसूं, मेरा हँसना,
मैं इतना सोच सकता हूँ, सभी आंसूं हमारे हैं।

11.7.12 - Shillong 11 pm

40
मेरा प्रकाश से लड़ना, अँधेरे जान लेते हैं
मगर क्यों पूर्णिमा को पूज, अमावस मान लेते हैं,
कभी तो जल दिए सा रौशनी कर सोच उनकी भी,
मैं इतना सोच सकता हूँ, सुमन खिल प्राण देते हैं।

12.7.12 - 8:30 AM , Shillong

41

मेरे अपने मुझे मेरी छिपी क्षमता दिखाते हैं,
कपिल सन्दर्भ देकर कोष का दर्शन बताते हैं,
मेरी क्षमता, मेरी सीमा, मेरी नीति, मेरी नियति,
मैं इतना सोच सकता हूँ, वो फिर भी तिलमिलाते हैं।

12.7.12 - 9 AM , Shillong

42

मुझे प्रकृति बुलाती है, हरी दुनिया दिखाती है,
मगर हर दाल पेड़ों की व्यथा पर मुस्कराती है
हरी डालें भरी डालें कटी डालें फटी आंखें
मैं इतना सोच सकता हूँ, मुझे जड़ से हिलाती हैं

12.7.12 - 9:30 AM , Shillong

43

मुझे बकवास का दर्शन बड़ा संजीव दिखता है
मगर हर शब्द अपने में मुझे गांडीव दिखता  है
जहाँ तक कल्पना पहुंचे मेरा एहसास पहुंचेगा
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं निर्जीव दिखता  है

12.7.12 - 9:40 AM , Shillong

==========

i.     मैं इतना सोच सकता हूँ -  (1-6 CLICK HERE)

ii.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 2 (7-11 CLICK HERE)

iii.   मैं इतना सोच सकता हूँ - 3 (12-16 CLICK HERE)

iv.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (17 CLICK HERE)

v.    मैं इतना सोच सकता हूँ -   (18 CLICK HERE)

vi.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (19 CLICK HERE)

vii.  मैं इतना सोच सकता हूँ -  4 (20-22 CLICK HERE)

viii. मैं इतना सोच सकता हूँ -   (23 CLICK HERE)

ix.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (24 CLICK HERE)

x.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 5 (25-27 CLICK HERE)

xi.   मैं इतना सोच सकता हूँ - 6 (28-37 CLICK HERE)

Sunday, September 25, 2011

कल्पना का सूरज



Uday Prakash :
Waiting alone for the sun to appear from far beyond the clouds and mountains : Internal Exile in the Doomed Topograhy of the Language

कब निकलेगा 
कल्पना का सूरज
कब बादलों पर 
तीब्र प्रहार कर 
निकलेंगी किरनें 
और भींचती हुई 
ह्रदय को 
विवश कर देंगी
थामने को
कलम 
फिर क्या  
आंखे बोलती जायेंगी
हाथ शब्दों को उतारेंगे 
कल्पनाओं के आकाश से 
संभालकर  
अक्षरों को बांधेंगे
कुम्हार की तरह  
और
फिर तैयार होगी
एक स्मरणीय 
प्रतिमा
स्फुटित होगी
कल्पनाओं की भाषा

मुझे प्रतीक्षा है
कब
सूरज उदय होकर
देगा प्रकाश
निराशा के बादल
छंट जायेंगे
आशा
सूरज
उदय
प्रकाश.
कच्ची अमिया 
कब पकेगी...

(3:40 pm, 25 Sept 2011, Shillong)

Saturday, January 22, 2011

तीन रुबाइयां

चश्म आँखों ने सफ़र को देखा
मेरी माँ ने हर कहर को देखा
हर फलसफे से प्यार बढकर है
उनकी आँखों ने इस ज़हर को देखा
---
सड़क पर भागते शव को देखा
धुंद मे टिमटिमा पहर देखा
दौडते-भागते कटी हर शब्
रुकते-थकते ये मंज़र देखा
---
भावना आँख से छलकती है
प्यास से रोशनी चमकती है
मेरी बेटी के प्रश्न जैसे हों
उनमे अच्छी सुबह सी दिखती है

(21st Jan 2011, 6:30 AM, travelling from Guwahati to Shillong in Taxi)

Thursday, November 4, 2010

कांग्लुंग मे दिवाली

कांग्लुंग कॉलेज मे, आई दिवाली
प्रथम बार हमको लगा, रंग, रूप, जाली
रंग, रूप, जाली, याद आई थी घर की
ऐसा लगा, जैसे हो, यही मजबूरी हर की

हर सुख, हर स्थान पर, नहीं कभी संभव
स्वर्ग बने धरती, अगर हो जाये संभव
हो जाये संभव, प्रकाश घर-घर मे जागे
दिवाली सन्देश मे, यही कहे, भागे

भारतीय आकाश में, शोर रहे इस रात
शांति कर रही शोर है, कान्ग्लुंग की बात
कान्ग्लुंग की बात, रात मे होती वाह-वाह, दाद
खील, बताशे, खिलौने, हमे लगे अपवाद

सुबह हुई देखा सुना बीती दिवाली,
प्रथम वार हमको लगा रंग रूप जाली...

(27 Sept 1994 - Exam duty, room no 26, Sherubtse College, Kanglung, Bhutan)

Monday, May 17, 2010

साहस

मुझको मालूम है
तुम्हारी आदत,
मैं जानता हूँ,
या
समझ सकता हूँ,
कब, कहाँ, क्यों, क्या होगा,
कौन करेगा,
परन्तु,
मौन हूँ,
क्यों,

पता नहीं.

मैं कुछ नहीं जानता,
उन्हें इन्तजार नहीं है,
सुबह का,
उन्हें प्यास है,
पानी की नहीं,
किसी और की.

वर्तमान में,
सच यह है,
कि
मैं कुछ नहीं जानता,
मुझे मालूम भी नहीं है
कुछ,
क्योंकि सत्य,
सत्य है,
एक कटु सत्य,
जिसे स्वीकारना
परे है,
स्वयं सत्य से,
सब जानते हैं,
सभी को मालूम भी है,
सत्य क्या है,
परन्तु,
साहस सब मे नहीं है,
है  - परन्तु कुछ में.


सत्य,
पीछे है,
काले शीशे कि उस दीवार के,
जिसमे,
इधर से उधर का,
देखा जा सकता है,
उधर रौशनी होने पर,
इधर रौशनी होने पर,
देखा जा सकता है,
उधर से इधर का.

निष्कर्ष,
सत्य को चाहिए,
अभिव्यक्ति,
और
अभिव्यक्ति को चाहिए,
रौशनी - प्रकाश,
और उस हेतु चाहिए,
साहस
जिसकी तलाश है...

(३१ अगस्त १९९१, १०:३५ सुबह, हर्मन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल)