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Saturday, March 7, 2015

दस्तूर

यह क्या दस्तूर दुनिया का
धनी धनवान होते हैं
गरीबी आँख आंसूं पी रहे
शमशान होते हैं
अजब सा द्वन्द रेखाओं में
बंटकर वार करता है
मैं इतना सोचता हूँ
क्यों अगर भगवान् होते हैं
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Thursday, July 19, 2012

पगडण्डी


देखे
सीमा लांघते
द्वितीय व तृतीय द्वार के मध्य

सीमा लांघते
पगडंडिया बनाते
सीना तान
प्रशासनिक कार्यालय के सामने
द्वितीय व तृतीय द्वार के मध्य
सीमा लांघते

क्या इस कार्यालय के भीतर भी
सीमाओं को लांघा  जाता है

क्या वे ही बाहर भी
सीमा लांघते हैं
जो 'भीतरी' अनुभव
रखते हैं
भीतर बैठकर
सीमा लांघने का अनुभव

देखे
सीमा लांघते
पगडंडिया बनाते
या
पगडंडियों पर चलते
सीना तान

अनुभव व अभ्यास
के अनुरूप
अविरुद्ध

उनकी देखा-देखी
अब
उनके अनुभव
का प्रयोग
उनके कौशल
का प्रदर्शन
उनसे मित्रता
का फल
उनसे घनिष्टता
की पूँजी
उनका परामर्श
काम आ रहा है
सीमा लांघने के

अपवाद दीखता है
सीमा का
आदर व पालन
सीमा मे रहना

फिर - आखिर
क्यों होती हैं सीमाएं 
क्यों होते हैं नियम-क़ानून
आखिर
क्यों आवश्यक है
अनुशासन व अनुपालन

प्रभावी प्रशासन के लिए
समानता व न्याय के लिए
भेदभाव-रहित समाज के लिए
सुदृढ़ व्यवस्था के लिए

आखिर
फिर क्यों
लांघी जाती हैं सीमाएं 

द्वितीय व तृतीय द्वार के
होते हुए भी
क्यों एक मध्य द्वार का
जन्म होता है
क्यों बन जाती है
एक और पगडण्डी
एक साफ़-सुथरी सड़क के
होते हुए भी

मैंने देखा है
कई पगडंडियो को
सड़क मे बदलते
तथाकथित
समानता, न्याय व सुशासन
के लिए
उसकी प्रतिरक्षा
के लिए

मैं फिर सोचता हूँ
आखिर क्यों होती हैं सीमाएं 
यह जानते हुए
कि
सीमाएं लांघी जायेंगीं
छोड़ेंगी निशान
बनेगीं पगडंडिया
और फिर
पगडंडिया
एक सड़क का रूप लेंगीं

लांघी हुई सभी सीमाएं 
मान्य हो जायेंगीं
न्यायिक होंगीं
संवैधानिक होंगीं

मैं पूंछता रहूँगा
वही  प्रश्न
आखिर
क्यों होती हैं सीमाएं 

मैं
मूक मैं
देखता रहूँगा
लोगों को
सीमा लांघते
पगडंडिया बनाते
प्रथम-द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पंचम 
द्वार होते हुए भी 
विशेषतः 
द्वितीय व तृतीय द्वार के मध्य
प्रशासनिक कार्यालय
के बाहर
व
भीतर
लगता है 
सीमा होती ही है 
लांघने के लिए

पगडंडिया
रहती हैं पतली
परन्तु 
सड़कें होती जाती हैं 
चौड़ी 
और चौड़ी.

18.7.12 - Shillong  - tomorrow is nehu foundation day.....

(inspired by seeing people crossing the boundary just infront of the administrative building, the footpath is quite visible)

Wednesday, October 12, 2011

मैं इतना सोच सकता हूँ

१.
मैं जितना सोच सकता हूँ, वहीँ तक सिर उठाता हूँ
मगर जब आँख दबती है, सभी कुछ भूल जाता हूँ
तेरा चेहरा मेरा दर्पण, तेरा दर्पण मेरा चेहरा
मैं इतना सोच सकता हूँ, तभी तो सर झुकाता हूँ.
२.
मेरे घर लोग आते हैं, मुझे सर पर चडाते हैं
मगर जब आँख दबती है, मुझे सपने सताते हैं
तेरा कहना मेरा सुनना, तेरा सुनना मेरा कहना
मैं इतना सोच सकता हूँ, मुझे मेरे सताते हैं.
३.
मुझे क्यों क्षोभ होता है, उन्हे क्यों लोभ होता है
मगर संयम, नियम, संशय लघु प्रयोग होता है
तेरी बातें मेरी आंखें, तेरी आंखें मेरी बातें 
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं संयोग होता है.
४.
मेरा हर रोम शोभित है, तेरी हर सांस संशित है
मगर वो कृत्य और वो वाण, शब्दशः सुरक्षित है
तेरा कहना मेरा सुनना, तेरा हँसना मेरा सहना 
मैं इतना सोच सकता हूँ, सभी उस ओर संचित है.
५.
मेरी क्यों द्रष्टि विकसित है, मुझे अब बोध होता है
अगर सबका सही हो भूत, कभी ना क्रोध होता है
मेरा कहना, मेरा जगना, मेरा सपना, मेरा अपना
मैं इतना सोच सकता हूँ, जहाँ प्रबोध होता है. 
६.
मुझे हर जीत का कारण, नया प्रतीत होता है
मगर जब हार होती है, नहीं कोई मीत होता है
मेरी श्रद्धा, मेरा आश्रय, मेरी करुणा, मेरा आशय
मैं इतना सोच सकता हूँ, मधुर संगीत होता है.

5-6 oct 2011, navmi/dashmi, shillong