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Friday, February 1, 2013

मैं इतना सोच सकता हूँ - 11

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मुझे नवग्रह बताते हैं जो कांटो को सजाते हैं
मगर हम हाथ की रेखायेँ सुकर्मो से जगाते हैं
बहुत से कष्ट सहकर हम कठिन प्रयास करते हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ दुकर्मो से बचाते हैं

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 मेरा विश्वास संशित है मेरा अभ्यास प्रेरित है
मगर क्यों लिपि नियंत्रित हो नहीं आभास किंचित है
मेरा चिंतन तेरी द्रष्टि नहीं संयोग लगते हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ नहीं प्रयास वंचित है

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मैं रिश्ते ढूँढता हूँ शहर में हर दम मशीनों से
सजाकर जो दिखाती है नई दुनिया बगीचों से
मुझे कल-कारख़ाने सब पुराने ही सुहाते हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ यही अनुभव गलीचों से

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Thursday, November 29, 2012

पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन


ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन

चल रहा हूँ आँख मींचे
मान कर आदेश सारे
मौन रहकर कष्ट सहकर
बिन दिशा तन के सहारे
किस दिशा मुड़ना बता निर्देश देगा कौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन

रास्ता जो ले चुका हूँ
पत्थरों संग चल रहा है
संगति सम-गति समय सुध
ज्ञान मेरा छल रहा है
कंकडों सी रेत में जल भेद देगा कौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन

झेल मौसम के थपेड़े
कुल बदन पीड़ित हुआ है
बोझ कन्धों पर लिए
नव लक्ष्य अब जीवित हुआ है
वह चमकता गाँव तुमको कर सकेगा मौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन

केश सब उलझे
हवाएं कर रहीं क्रंदन
थक गया है पथ सुझाए
प्राण प्रेरित मन
दे दिया साधन बता अब साध्य देगा कौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन

अनुभवों की पोटली ले
पथ मुझे अब भा रहा है
अब दिशा का ज्ञान कुछ
स्पष्ट होता जा रहा है
अब दिशाओं का नहीं है युद्ध मैं फिर मौन
ले लिया निर्णय करूँगा खोज होकर मौन
पथ दिया मुझको बता पाथेय देगा कौन

Thursday, August 2, 2012

कोकराझार से

कोकराझार से गाड़ी निकलकर आगे बढती है
मैं अपनी सांस को इक पल रुका महसूस करता हूँ

भरे तालाब आंसूं के भरा सब कुछ हरा अब भी
किसी के घर उजड़ते घाव सब  महसूस करता हूँ

ये बोडो भाई मुस्लिम दोस्त सब हैं तो यहीं के ही
सिआसत के लिए गोली चली महसूस करता हूँ

ये बालक जिनके सर से बाप का हो उठ गया साया
किसी तारीख उनके आँख में खूने'लहू महसूस करता हूँ

मुझे उनकी किताबों में अजब से शब्द दिखते हैं
उजाला हो ये कैसी कल्पना मनहूस करता हूँ

कभी बन्दूक से कोई समस्या हल नहीं होती
मैं अपनी आत्मा में बस यही महसूस करता हूँ

तुम सोचो खुद विचारो बैठ कर ढूँढो निदानों को
यह दिल्ली बेरहम है दोस्त यह महसूस करता हूँ

यहाँ जीवों के मूल्यों का महज सौदा ही होता है
ये पैसे बांटकर देखे मजा महसूस करता हूँ

(I am travelling between Lucknow and Guwahati in 12436 - Rajdhani Express... it is 4:30 PM on 30th July 2012....just crossed Kokrajhar railway station and reached New Bongaigaon..This area was in the limelight in the last few days for ethnic violence and displacement of more than 2.5 lac villagers belonging to bodo tribe and muslims (allegedly from Bangladesh).  The prime minister of India, Dr Man Mohan singh visited the camps two days back and announced Rs 300 crore relief... today P Chidambaram (the home minister of India) and LK Advani are visiting)

Saturday, May 22, 2010

समय का पहिया

समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे,
गति निर्भर करती है,
परिस्थितियों पर,
कई बार
गति प्रदान करने वाले
व्यक्ति पर भी,
परन्तु,
न्यूनतम व अधिकतम,
गति सीमा से परे,
कठिन है जाना.
जैसे लगता है,
रविवार २४ घंटे का नहीं होता,
बल्कि मध्य में या कभी-कभी,
प्रारम्भ में,
याचना करता है
दशमलव के प्रयोग की,
जबकि कई बार कई दिन
२४ घंटे के स्थान पर
४२ घंटे के प्रतीत होते हैं.
क्षण-घंटे-दिन-सप्ताह-माह व वर्ष,
किस प्रकार गुज़र जाते हैं,
ज्ञात होता है,
गुजरने के बाद.
यदि यह अनुभूति,
प्रारंभ में ही हो जाये,
जानिए,
आधी समस्याओं का समाधान.

आयु व समय
एक दूसरे से साक्षात्कार करते हैं
प्रायः
किस समय, कौन किसका
साक्षात्कार कर रहा है,
बता पाना कठिन है,
यदि कोई इसको समझ सके,
या स्पष्ट रूप से जान सके,
जानिये
आधी समस्याओं का समाधान...

स्वयं की आयु का ज्ञान कब होता है?
जब स्वयं द्वारा पानी दिए पेड़ की
टहनियां लहलाहतीं हैं,
फलों का लालच देकर
पास बुलाती हैं,
तब.

एक शिक्षक द्वारा पडाया गया छात्र
आसीन होता है उसके बराबर के
पद पर
तब.

मोहल्ले में पडोसी का बेटा
जो खेलता था कंचे
आँखों सामने,
अब व्यापार में पिता का
हाथ बटाता प्रतीत होता है
तब.

एक नौजवान दिखने वाले
अभिनेता का पुत्र
उसी अभिनेत्री के साथ
अभिनेता के रूप मे प्रदर्शित होता है
जिसके साथ कभी,
उसके पिता प्रदर्शित होते थे
तब.

इमारतों की मंजिलें
बढती दिखतीं हैं
तब.

सड़क की चौडाई
बढती दिखती है
तब.

रामलाल की बेटी गुडिया
जिसे कभी गोदी में खिलाता था
पुत्रवती होती है
तब.

या फिर तब
जब
माता पिता मे खिलखली
का सिलसिला
कम होता दिखाई देता है.

तब - जब
सुई में धागा डालने के लिए
माँ को चश्मे की

आवश्यकता होती है.

तब - जब
पिता को
चाय में चीनी
व सब्जी में नमक
अधिक लगता है.

तब - जब
डाक्टर अंकल से मेल अधिक
दिखता है
परिवार का.

तब - जब
स्वयं की गतिविधियाँ
दोहराई जाती हैं
स्वयं के बच्चों के द्वारा
स्वयं के शिष्यों के द्वारा.

सचमुच
समय का पहिया घूम रहा है
गति सीमा से परे
जो इस गति सीमा को
ठीक ठीक पड़ ले
जानिए
अधिकतर समस्याओं का समाधान...

(२६ सितम्बर, १९९४, शेरुब्त्से कॉलेज, कान्ग्लुंग, त्राशीगांग, भूटान, exam duty: room no 15 - 9:15 to 10 AM)