मेरी कविताएं
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Monday, June 25, 2012
विविधता
23
मुझे कंकड़ बताते हैं, विविधता माध्य होती है,
सभी रंगों मे सलग्न होकर, साध्य होती है,
विविध आदत, विविध मापक, विविध रोना, विविध बोना,
मैं इतना सोच सकता हूँ, बहुत आराध्य होती है।
Saturday, December 17, 2011
पत्थर और मैं
आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर
सड़क के बीच
देखकर बहता पानी
अप्राकृतिक
वर्षा देखकर
पानी के टेंकों से
देखते
सीमा लांघते
सुनते
साक्षात झूठ
देखते
मूल्यों का होते
सौदा
मूर्त व मौन
रूप से
देखते-पड़ते
वो सब कुछ
जिसपर प्रतिक्रिया
आवश्यक है
अपेक्षित
प्रतिक्रिया
पर लगाते
हुए विराम
उपस्थिति
अनुपस्थिति
के अंतर के ज्ञान
से परे
मैं पत्थर
बनना नहीं चाहता
या फिर
सोचता हूँ
बनूँ ऐसा पत्थर
जिसके पास अपने आपको
फेंकने की हो
शक्ति
मुझे ज्ञात है
पत्थर से ही बनते हैं
भवन
पत्थर के
इधर-उधर
होने से होता है
विभाजन
पत्थर में होते हैं
प्राण
और प्रायः
लोग मानते हैं
पत्थर में होते हैं
भगवान
लेकिन फिर भी
स्वभावतः
मैं पत्थर बनना
नहीं चाहता
फिर
आखिर क्यों
बनता जा रहा हूँ मैं
पत्थर
मुझे डर है
न बन जाये
ये मेरी
आदत
निवेदन
रोको
मुझे
पत्थर बनने से.
(11:10 pm, 10 Dec 2011, Shillong)
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