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Thursday, October 4, 2012

मूंछें

छोटे-छोटे
बालकों को
अच्छी लगती हैं
मूंछें
अच्छा  लगता है
खेलना
दाड़ी बनाने के
सामान से

जैसे-जैसे
बड़ते हैं वे
उनकी अपनी
आती हैं
मूंछे

और फिर
धीरे-धीरे
उनकी मूंछें
होती जाती हैं
छोटी
और छोटी

और नौकरी
मे आने के बाद
प्रोन्नत
हो जाने के बाद
धीरे-धीरे
गुम  होती जाती हैं
मूंछें

समय के साथ
परिस्थितियों के साथ
कैसे समायोजित
हो जाती हैं
मूंछें

मूक
विचारता हूँ मैं
प्रयास करता हूँ
समझने का
कारण
इस समायोजन का

विवशता
अभिलाषाएं
व
आकांक्षाएं

काश
ऐसा न होता

बालकों की तरह
अच्छी लगती रहतीं
मूंछें
अच्छा  लगता रहता
खेलना
दाड़ी बनाने के
सामान से

बालकों को
अच्छी
लगती रहती हैं
मूंछें।

(20 जुलाई 2012, 7 PM, in train at Samastipur)