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Wednesday, January 15, 2020

दिल्ली की ठण्ड

धूप व्योम से झांक रही है
जीना अब बदहाल हो गया 
कैसा सबका हाल हो गया
दिल्ली नैनीताल हो गया 

कैसे यह मौसम निकलेगा 
किनके सपनों को निगलेगा 
कंधा ही अब ढाल हो गया 
जीना अब बदहाल हो गया 
दिल्ली शिमला माल हो गया 

बर्फ़ जम गयी बिस्तर पर अब 
कम्बल रह गए अस्तर भर अब 
मफलर अब रूमाल हो गया 
दिल्ली शिमला माल हो गया 
दिल्ली नैनीताल हो गया 



ठंड खिंच गई सिकुड़ गए हम
धुँध सड़क पर अन्धकार सम
दिल्ली भर फुआल हो गया 
जीना अब बदहाल हो गया 
दिल्ली शिमला माल हो गया 
दिल्ली नैनीताल हो गया 

बस वसंत का इंतज़ार है 
शिशिर विदा की अब बयार है 
चैत शुरू का काल हो गया 
वर्णन माया-जाल हो गया 

दिल्ली शिमला माल हो गया 
दिल्ली नैनीताल हो गया

=====

Saturday, April 6, 2019

मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे - पार्ट 2

24 मार्च 2019 को मैंने इसी शीर्षक से एक कविता पोस्ट की थी, एक मित्र ने अपनी टिप्पणी में यह तीन पंक्तियाँ प्रेषित कीं :  
तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

उपरोक्त पंक्तियों को आगे बढ़ाते हुए एक नई कविता की रचना हो गई -

तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

नव किरण का तेज अपने में दिशा का ज्ञान ले
दे रहा था रोशनी सम्बन्ध कुछ शामिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

कुछ किताबी ज्ञान साझा कर सफलता के शिखर
पा कहां पाया कोई जब तक अथक काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

ढल रहा था सूर्य अपनी रोशनी को बांटकर
आंधियों के हौसले अवरोध के काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

यदि कदम को लडख़ड़ाने से बचा पाओ तो तुम
पा गए सब कुछ सकल जो स्वप्न में हासिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे


[31 मार्च 2019, अजमेर दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस 7:30 शाम]

Thursday, April 4, 2019

मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे - पार्ट 2

24 मार्च 2019 को मैंने इसी शीर्षक से एक कविता पोस्ट की थी, एक मित्र ने अपनी टिप्पणी में यह तीन पंक्तियाँ प्रेषित कीं :
तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

उपरोक्त पंक्तियों को आगे बढ़ाते हुए एक नई कविता की रचना हो गई -

तृप्त सरिता बह रही थी जल तरंगों को लिए
दर किनारा कर किनारे दूर तक साहिल पे थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

नव किरण का तेज अपने में दिशा का ज्ञान ले
दे रहा था रोशनी सम्बन्ध कुछ शामिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

कुछ किताबी ज्ञान साझा कर सफलता के शिखर
पा कहां पाया कोई जब तक अथक काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

ढल रहा था सूर्य अपनी रोशनी को बांटकर
आंधियों के हौसले अवरोध के काबिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

यदि कदम को लडख़ड़ाने से बचा पाओ तो तुम
पा गए सब कुछ सकल जो स्वप्न में हासिल न थे
मंज़िलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे


[31 मार्च 2019, अजमेर दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस 7:30 शाम]




Sunday, March 24, 2019

कुर्सी और मेज

मेज पर रखे व पड़े
बिस्कुट, गिलास और प्रस्ताव
सोफे व कुर्सी के मध्य

कुर्सी व सोफे पर रखे थे 
सम्बन्ध
प्रगाढ़, फलीभूत, निवेशित
कुर्सी के सम्बन्ध सचमुच
अजीब होते हैं
आशाओं व अपेक्षाओं से भरे
क्षमताओं व समीक्षाओं से परे

मेज की व्यथा दर्शनीय थी
उसके कान पक चुके थे
सुनसुन कर
प्रस्तावों पर चर्चा
वाद, प्रतिवाद
कुर्सी से सोफे तक
(कुछ महत्वपूर्ण से दिखने वाले
व्यक्तियों की
चहलकदमी के मध्य)

बाज़ार व समाज
उतार व चढ़ाव
व्यापार व व्यवहार
अर्थ व समर्थ
ग्राहक व कर्मचारी
प्रबंधक व निवेशक
सब कुछ इन मेजों के
दिमाग का वजन
बड़ा रहा था

कुर्सी पर बैठा व्यक्ति
अपने निवेश पर
प्रत्याय की अपेक्षा में
प्रश्नों के उत्तर दे रहा था,
अपने विवेकानुसार,
अपनी क्षमतानुसार

सोफे पर बैठे व्यक्ति
प्रस्तावों का मूल्यांकन कर रहे थे,
प्रस्तावों से अधिक
कुर्सी का
आंकलन व मूल्यांकन हो रहा था
क्योंकि वहां सम्बन्ध बैठे थे

सम्बन्धों के कान
सम्बन्धों की आंखों की भाषा
सुन रहे थे
सम्बन्धों के चर्म के संकेतों को
सम्बन्धों की नाक
सूंघ रही थी

और बेचारी मेज़
आंख, कान, नाक,
जिव्या व त्वचा
सभी के आत्मीय साक्षात्कारों को
पढ़ रही थी
अपनी कहानी गढ़ रही थी
अपनी कविता रच रही थी
अपने गीतों को संगीत दे रही थी
उसे पता था
कुर्सी ही उसका साथ देगी
जिससे वह अकेले में
अपनी वेदना
अपनी कहानी,
कविता, गीत व संगीत
साझा करेगी

कुछ समय बाद
जब मेज व कुर्सी
अकेले में होंगे
उनके सिवाय
जब कोई नहीं होगा आसपास
जब वे दोनों (सिर्फ दोनों),
कमरे में बंद होंगे
और चावी खो जाएगी
तो वे आपस में
अपने अपने अनुभव
साझा करेंगे
बातें करेंगे

हम सब उनकी बातों का
विषय होंगे
हिस्सा होंगे

क्या होगा
उनका आंकलन
कुर्सियों व सोफे पर बैठे व्यक्तियों का

कुर्सी व मेज़ के मूल्य
शायद
उतने बाज़ारू न हों
जितने 
उनपर विराजमान व्यक्तियोँ के होते हैं

मुझे विश्वास है कि
उनके आंकलन में अवसरवादिता का
कोई स्थान नहीं होगा
मुझे विश्वास है कि
उनकी संवेदनशीलता
मनुष्यों की तुलना में बहुत अधिक होगी
उनका भावनाबोध
अधिक बेहतर होगा

जीव मनुष्य
निर्जीव लकड़ी

जीवित
मृत
पुनर्जीवित
सम्बन्ध

अवसर
निवेश
पुनर्निवेश
प्रत्याय


(भावी शोध विद्यार्थियों के साक्षात्कार के दौरान हुए अनुभवों पर आधारित - ४ अक्टूबर २०१८, वाणिज्य विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली )

Wednesday, December 18, 2013

वासना

(१६ दिसंबर २०१२ की रात भारत की राजधानी दिल्ली में एक अमानवीय, अशोभनीय व ह्रदयविदारक दुर्घटना हुई जिसने संभवतः प्रत्येक भारतीय के मस्तिष्ट को झकझोर दिया. बीते वर्ष के अंतिम दो सप्ताहों में दिल्ली की सड़कों पर एक आन्दोलन ने जन्म लिया, समाचार पत्रों व टीवी चैनलों पर चर्चाओं व परिचर्चाओं ने एक ऐसा वातावरण बनाया जिसकी परिणति एक सख्त क़ानून बनकर हुई. मैंने उन्ही दिनों यह कविता लिखी थी, अब आप सभी के साथ साझा कर रहा हूँ.)

वासना बस वास करती 
सड़क लतपथ सांस भरती
इस जगह से उस जगह तक 
इस बदन से उस बदन तक 
वाहनों की आस भरती
सड़क लतपथ सांस भरती 
वासना बस वास करती

ज्योति बोली आँख खोलो 
कुल ह्रदय के पाट खोलो 
इस जखम से उस जखम तक 
उस वतन से इस वतन तक 
मानसिकता को टटोलो 
कुल ह्रदय के पाट खोलो
ज्योति बोली आँख खोलो 

नीति झूठी न्याय झूठा 
सकल कागज़ ज्ञान झूठा 
इस कलम से उस कलम तक 
इस नियम से उस नियम तक 
व्यक्तिमुख विज्ञान झूठा 
सकल कागज़ ज्ञान झूठा
नियति झूठी न्याय झूठा 

कौन झूठा कौन सच्चा 
मौन रूठा मौन सच्चा 
इस विनय से उस विनय तक 
इस विजय से उस विजय तक 
बदन झूठा प्राण सच्चा 
मौन रूठा मौन सच्चा
कौन झूठा कौन सच्चा 

कौन जीते कौन हारे 
आँख भीगी मौन हारे 
इस शहर से उस शहर तक 
इस ह्रदय से उस ह्रदय तक 
जीत किसकी कौन हारे 
आँख भीगी मौन हारे
कौन जीते कौन हारे 

मौत जीती शर्म हारी 
दामिनी यम दीप प्यारी 
इस सफ़र से उस सफ़र तक 
इस सड़क से उस सड़क तक 
कान रोये आँख भारी 
दामिनी यम दीप प्यारी
मौत जीती शर्म हारी 

यत्न सच्चा युक्ति सच्ची 
बदन झूठा म्रत्यु सच्ची 
इस करम से उस करम तक 
इस जनम से उस जनम तक 
सच समर्थित सूक्ति सच्ची 
बदन झूठा म्रत्यु सच्ची
यत्न सच्चा युक्ति सच्ची 

ह्रदय अच्छा जतन अच्छा 
कुल बदन कुल मनन अच्छा 
इस विषय से उस विषय तक 
इस सतह से उस सतह तक 
संघ सच संकल्प सच्चा
कुल बदन कुल मनन अच्छा
ह्रदय अच्छा जतन सच्चा 

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