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Saturday, May 29, 2010

आशय

उनके चुप से नहीं समझना
                वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
                बस्ते खोल नहीं सकते हैं

मेरे चुप से नहीं समझना
                मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
                होठों को खोल नहीं सकता हूँ

इक महिला की खातिर तुमने
सारे नियम तार कर दिए

                इक सदस्य के कह देने से
                छै पर तुमने वार कर दिए

उडिया और गुडिया की सरगम
हम सब झेल नहीं सकते हैं
वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
बस्ते खोल नहीं सकते हैं

उनके चुप से नहीं समझना
                वे कुछ बोल नहीं सकते हैं
                बस्ते खोल नहीं सकते हैं

तेरे कन्धों की पीड़ा को
मेरा चश्मा देख रहा है
                तेरे सम्बोधन का आशय
                सबकी आंखें खोल रहा है

चश्मे से वो दिल तक पहुंचे
ऐसा बोल नहीं सकता हूँ
मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
होठों को खोल नहीं सकता हूँ

मेरे चुप से नहीं समझना
                 मैं कुछ बोल नहीं सकता हूँ
                 होठों को खोल नहीं सकता हूँ

Wednesday, May 19, 2010

संघर्ष

ख़ामोशी
मुझे अब घ्रणा हो गई है
इस शब्द से
जीवन पर्यंत
साथ निभाने के पश्चात्
नियंत्रण -
सीमा के साथ मना रहा है
रंगरेलियां
कब तक सहा जा सकता है
अन्याय
करना ही पड़ेगा संघर्ष

और
लांघना होगा सीमा को
और लाना होगा 
नियंत्रण से छीनकर,
ईश्वर - भाग्य - योग्यता,
कब तक बिताएंगे जीवन
इन असहाह शब्दों के सहारे
नहीं, कोई नहीं
प्राप्त कर पायेगा
कुछ भी
भाग्य से अधिक
नहीं, कभी नहीं
किसी को प्राप्त होगा
कुछ भी
समय से पहले,
शब्दकोष
साक्षात्कार कराता है
एक नए शब्द से
संतुष्टि,
सपने - कल्पनाएँ
यदि करनी हैं साकार
तो
भाग्य - समय - संतुष्टि
और ईश्वर
इन सबसे करना ही होगा
समझौता,
क्या यह सत्य नहीं है
कि लगा दी गयी आग
गगनचुम्भी इमारतों
को मनाने वाले
मजदूर की झोपड़ी में,
या फिर
क्या कुछ नहीं कहतीं
पुलिस चौकी में बिखरी पड़ीं,

टूटी चूड़ियाँ,
बताओ
क्या यह सत्य नहीं है
कि बेरोजगार सतीश ने
स्वयं को कर दिया
अग्नि के हवाले
या फिर
क्या यह भी सत्य नहीं है
कि
हरिया को पिलाकर शराब
करवाया गया वो काम
जो आता अपराध की संज्ञा में,
यदि स्वयं किया जाता,
अरे - मौन क्यों हो
मेरे प्रश्नों का उत्तर दो
मालूम है भली-भांति,
जब होगा एकांत,
तो किसी क्षण
एकदम शांत
तुम विचार करोगे.
यह सत्य नहीं है
कि अरबों रूपया खर्च किया गया
गरीबों कि झोपडी बनाने में,
तुम संभवतः
डूबते जाओगे
सागर कि गहराइयों में
और प्रयत्न करोगे
किसी सीपी को ढूँढने का
तुम सोचोगे
यह भी सत्य नहीं है
कि क़ानून उसकी रक्षा करता है
जो रक्षा करते हैं
क़ानून की.

अब करनी ही पड़ेगी
लड़ाई,
शांति से,
ख़ामोशी से,
क्योंकि
संघर्ष जीवन का पर्याय है

(11th February, 1992, 10:30 AM, Hermann Gmeiner School, Bhimtal, Nainital, UP, Uttranchal)

परिणति

शोर बहुत है
घर घर चर्चा है
शायद
कहीं कुछ हो गया है
या फिर
किसी का कुछ खो गया है
तलाश जारी है मगर......

आमने- सामने खडें है
दोनों प्रतिध्वंदी
उनको नहीं मालूम
कहाँ क्या हुआ
किसने किया
क्यों हुआ
कैसे हुआ
किसकी दुआ
किसकी बद्द्दुआ
आखिर ऐसा तो
कुछ नहीं हुआ.

किसी को
फलता-फूलता देखा नहीं जा सकता
यदि जा सकता है देखा
तो फिर कटी निगाह से
जो दिखाई ना दे
कहीं से
प्रायः जैसा होता है.

कौन कहता है कि
कहीं कुछ हुआ है.

प्रयास कर रहे हैं
दूर रहें
समाचार पत्र पर डाले निगाह
और समझें
कहाँ क्या हुआ.
शोर क्यों है
कारण क्या है.

आग हर घर मे
क्यों है
इसकी लपटें
कहीं बर्बाद ना कर दें
मेरा आशियाना
कृपया मात्र इतना बतलाना
अब मुझे किधर चाहिए जाना
पश्चिम या पूरब
दक्षिण या उत्तर
असमंजस
आप रहेंगे निरुत्तर
यदि ना हो सका प्रयास
चुप रहने का
फिर लांघ जायेगा सीमा
उसका 'मैं' दिखायेगा
अपनी औकात
किसी की समझ में नहीं आएगी
कोई बात
क्योंकि देखा यह गया है
कि शोर की
परिणति होती है
शांति से
सन्नाटे से
धीरे...

(२३ नवम्बर, १९९१, १०:३० सुबह, हर्मंन माइनर स्कूल, भीमताल, नैनीताल, उत्तरप्रदेश - उत्तरांचल)