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Sunday, June 1, 2014

अर्थ

व्यर्थ है
सचमुच व्यर्थ है
अर्थ
अर्थ से होता है
अनर्थ
और
जब हम ढूँढते हैं
संबंधों का अर्थ
तो अर्थ ही है
जो व्यर्थ लगता है
जब अर्थ के लिए
हम सब छोड़ते हैं घर
फिर कुछ नहीं बचता
अर्थ के सिवाय
और
फिर भी हम सब
ढूँढते रहते हैं अर्थ
शब्दों के...

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उपरोक्त पंक्तियों को लिखने की प्रेरणा प्रो माधवेन्द्र पाण्डेय जी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (10 मई 2014) के दिन फेसबुक वाल पर प्रकाशित निम्न पंक्तियाँ पड़ने पर हुई

कितनी दूर आ गया कि,
माँ के चेहरे की लकीरें भी ठीक से याद नहीं,
कैसे कहूँ ...हैप्पी मदर्स डे |

सुबह बात करते समय 
बेतरह खाँस रही थी माँ,
कैसे कहूँ सब ठीक है,
तेज धूप और फनफनाती लू में
चिलक रही है माँ की आँखें
तब इतनी शीतलता का क्या होगा
यहाँ शिलाँग में,
जब चलने फिरने में इतनी दिक्कत,
आने जाने में इतनी पीड़ा 
तो व्यर्थ है सब घोड़ागाड़ी,
कार,बंगला ...सब व्यर्थ है |

Thursday, February 14, 2013

मैं इतना सोच सकता हूँ - 13

61

मैं सुनना चाहता हूँ गीत मंगल और सुमंगल के
है जीवित हो चुकी आशा बृहद विस्तार जंगल के
मेरे विश्वास में कोई कमी होगी तो क्यों होगी
मैं इतना सोच सकता हूँ सधे संवाद जंगल के

62

मैं पड़ना चाहता हूँ पुस्तकें स्नेह वंदन की
सरल हो व्याकरण उपयोग तम गंध चंदन की
मगर क्यों द्वेष भरती पुस्तकें बाज़ार होती हैं
मैं इतना सोच सकता हूँ लगी क्यों आस बस धन की

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Monday, August 6, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 6

28

मैं दिन भर गीत गाता हूँ, सरल हो गुनगुनाता हूँ
मगर भीतर रही पीड़ा को, मैं सबसे छिपाता हूँ
तेरी आंखें, तेरा पड़ना, तेरा सुनना, तेरा लड़ना
मैं इतना सोच सकता हूँ, मैं गीतों में सुनाता हूँ

29

मैं जब दाड़ी बढाता हूँ, उमर आगे सरकती है
मगर दृढ़ शक्ति मंजिल की, कई ढंग से परखती है
मेरा संकल्प सच्चा है, मेरा सन्दर्भ अच्छा है
मैं इतना सोच सकता हूँ, समय के साथ चलती है.

30

मैं जब भी पत्र लिखता हूँ, समय माध्यम बताता है
मगर स्याही, कलम, कागज, सभी अपवाद पाता है
नहीं दूरी, नहीं धेला, नहीं टिकटें, नहीं थैला
मैं इतना सोच सकता हूँ, समय उंगली चलाता है

31

मेरा दर्शन निराला है, इसी ने तो संभाला है
नहीं तो हम सभी बन्दर, सभी का अपना पाला है
सकल उत्पाद का दर्शन, अजब उत्पात करता है
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं वह चलने वाला है॰

32

सभी उत्पात का कारण, मुझे बाज़ार दिखता है
जहाँ सम्बन्ध बिकते हैं, जहाँ व्यवहार बिकता है
अजब पैसा, गजब मंदी, अजब मंडी, बहुत गंदी
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं संस्कार बिकता है.

33

मुझे क्यों शर्म आती है, वो अर्थों को छिपाती है
यहाँ हर द्रष्टि केवल अर्थ में, आधार पाती है
विविध राही, विविध रास्ता, विविध पुस्तक, विविध चर्चा
मैं इतना सोच सकता हूँ, मुझे क्यों शर्म आती है

34

मुझे गाँधी सिखाते हैं, अहिंसा वार करती है
सभी मतभेद, संघर्षों से नैया पार करती है
सरल चिंतन, सजग चिंतन, सरल जीवन, सफल जीवन
मैं इतना सोच सकता हूँ, कि हिंसा आँख भरती है

35

मेरे कानों में फोड़ा है, मैं कुछ भी सुन नहीं सकता
मैं, 'मैं', मे डूब कर, लेकिन किसी का हो नहीं सकता
अजब यह प्रेम 'मैं' से, मैं सभी कुछ जानता हूँ सुन
मैं इतना सोच सकता हूँ, मैं 'मैं' से रह नहीं सकता

36

मुझे क्यों ज्ञान भाता है, उन्हे लक्ष्मी सुहाती है
मेरी माँ शारदा, मुझको बहुलता से बचाती है
मेरी लक्ष्मी, मेरी माता, तेरे अनुबंध, मेरे सम्बन्ध
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही विद्या जताती है

37

मुझे छाया सताती है, वो कछुए से मिलाती है
अगर विश्राम हो थककर, नई ऊर्जा सजाती है
कभी चलना, कभी थकना, कभी रुकना, नहीं थमना
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही जीवन बताती है


4.7.12 - Shillong


i.     मैं इतना सोच सकता हूँ -  (1-6 CLICK HERE)

ii.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 2 (7-11 CLICK HERE)

iii.   मैं इतना सोच सकता हूँ - 3 (12-16 CLICK HERE)

iv.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (17 CLICK HERE)

v.    मैं इतना सोच सकता हूँ -   (18 CLICK HERE)

vi.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (19 CLICK HERE)

vii.  मैं इतना सोच सकता हूँ -  4 (20-22 CLICK HERE)

viii. मैं इतना सोच सकता हूँ -   (23 CLICK HERE)

ix.   मैं इतना सोच सकता हूँ -   (24 CLICK HERE)

x.    मैं इतना सोच सकता हूँ - 5 (25-27 CLICK HERE)

Thursday, August 2, 2012

कोकराझार से

कोकराझार से गाड़ी निकलकर आगे बढती है
मैं अपनी सांस को इक पल रुका महसूस करता हूँ

भरे तालाब आंसूं के भरा सब कुछ हरा अब भी
किसी के घर उजड़ते घाव सब  महसूस करता हूँ

ये बोडो भाई मुस्लिम दोस्त सब हैं तो यहीं के ही
सिआसत के लिए गोली चली महसूस करता हूँ

ये बालक जिनके सर से बाप का हो उठ गया साया
किसी तारीख उनके आँख में खूने'लहू महसूस करता हूँ

मुझे उनकी किताबों में अजब से शब्द दिखते हैं
उजाला हो ये कैसी कल्पना मनहूस करता हूँ

कभी बन्दूक से कोई समस्या हल नहीं होती
मैं अपनी आत्मा में बस यही महसूस करता हूँ

तुम सोचो खुद विचारो बैठ कर ढूँढो निदानों को
यह दिल्ली बेरहम है दोस्त यह महसूस करता हूँ

यहाँ जीवों के मूल्यों का महज सौदा ही होता है
ये पैसे बांटकर देखे मजा महसूस करता हूँ

(I am travelling between Lucknow and Guwahati in 12436 - Rajdhani Express... it is 4:30 PM on 30th July 2012....just crossed Kokrajhar railway station and reached New Bongaigaon..This area was in the limelight in the last few days for ethnic violence and displacement of more than 2.5 lac villagers belonging to bodo tribe and muslims (allegedly from Bangladesh).  The prime minister of India, Dr Man Mohan singh visited the camps two days back and announced Rs 300 crore relief... today P Chidambaram (the home minister of India) and LK Advani are visiting)

Wednesday, January 11, 2012

मकान की तलाश

मैं ढूँढ रहा था
एक मकान
राजधानी समीप
इस पथरीले जंगल में


मैं ढूँढ रहा था
गीली मिटटी
कुछ कण रेता
कुछ फूल, पत्ते और पेड़
सूरज और धूप
चंदा और चांदनी
चहचहाती चिड़ियाँ
नीला आकाश

मुझे मिले
कुछ अदद जानवर
दलालों के रूप में
पक्का सीमेंट
अटूट रिश्तों सा
पैसे से
पैसे के रिश्ते
रिश्तों के पैसे
फूल सी भाषा
काँटों सा व्यवहार

मुझे मिला
धुंधलीला आकाश
मिली
कीचड
प्लास्टिक के पत्ते
चमचमाते सिक्के
इस
राजधानी समीप
पथरीले जंगल में
इस
सब्जी बाज़ार में
जहाँ
आलू, मकान और माल
मे कोई अंतर नहीं है

मुझे ज्ञात हुआ
उतना घातक नहीं होता
मकान का बाज़ार मे होना
जितना घातक होता है
बाज़ार का मकान में होना


इस पथरीले जंगल मे
कुछ मकानों मे घर है
कुछ मे मात्र बाज़ार


इस
जंगल के जानवर
कर रहे हैं
इन मकानों की सुरक्षा
बेहतर बाज़ार की
प्रतीक्षा में

व्यापार
रोज़गार, व
बाज़ार
सब कुछ इस
पथरीले जंगल मे है

मेरी तलाश जारी रहेगी
जारी रहेगा
मोल-भाव, नाप-तोल, लेन-देन
जानवरों के साथ
कब बाज़ार देगा
मुझे एक मकान
और कब
मैं बनाऊंगा
उस मकान को
घर.

7 Jan 2012, Intercity express, delhi to bareilly, 9 pm