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Thursday, June 14, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 4

20
मेरा संसार उज्जवल है, मुझे घरवार का बल है,
सकल संसार मेरा घर, मेरा विश्वास निर्मल है,
मेरा दर्शन, मेरा बचपन, मेरा जीवन, मेरा उपवन,   
मैं इतना सोच सकता हूँ, यही सब साथ प्रतिपल है। 

21
मुझे संघर्ष करने का, जहाँ से भाव आता है,
उसी के मूल से,  शक्ति भरा प्रभाव आता है
मेरा हर क्रत्य अच्छा हो, मेरा आशय भी सच्चा हो
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं अलगाव आता है।

22
मुझे नेतृत्व का कौशल,  मेरे अपने सिखाते हैं
मगर हर क्रत्य को मेरे, वो पलड़ों में बिठाते हैं
मेरा सुनना, मेरा सहना, मेरा कहना, मेरा करना,
मैं इतना सोच सकता हूँ, मेरा जीवन सजाते हैं.

5 May 2012, Shillong

Monday, May 7, 2012

मैं इतना सोच सकता हूँ - 3

१२.
मेरे सब मित्र अच्छे हैं, मुझे मंजिल दिखाते हैं
मगर फिर क्यों वही मुझसे, सही रस्ता छिपाते हैं
मेरी मंजिल, तिरा निर्णय, तिरा संशय, मेरा रस्ता
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं मंजिल वो पाते हैं.
१३.
मेरे सब बाल पकते हैं, वो बालों को रंगाते हैं
मगर क्यों उम्र को हम, सब प्रकारों से छिपाते हैं
तेरा रुकना, मेरा चलना, तेरा चलना, मेरा रुकना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं हम सोच पाते हैं.
१४.
मुझे आकाश के तारे, चमक कर क्यों बुलाते हैं
अगर उस व्योम मे इतने, मधुर स्वर गुनगुनाते हैं
तेरी आशा, मेरी मंशा, मेरे अपने, मेरी सीमा
मैं इतना सोच सकता हूँ, कि वे क्यों झिलमिलाते हैं.
१५.
मुझे रोना नहीं आता, उन्हे हंसना रुलाता है
मगर निष्प्राण जीवन का, यही चेहरा दिखाता है
तेरी भाषा, तेरे आंसू, तेरी क्रिया, तेरी बोली
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं कुछ साथ जाता है.
१६.
मुझे क्यों नींद आती है, उन्हें क्यों स्वप्न आते हैं
अगर हो कर्म सब अच्छे, निरर्थक अर्थ पाते हैं
मेरी निद्रा, तेरे सपने, मेरी आंखें, तेरी रचना
मैं इतना सोच सकता हूँ, नहीं अपने बताते हैं.

7 oct 2011, shillong